अठारहवीं सदी में उत्तरी हिंदुस्तान के अदबी (साहित्यिक) माहौल में एक बड़ा बदलाव सामने आया। ब्रज भाषा और अवधी, जो उस वक़्त तक अदबी इज़हार (अभिव्यक्ति) का बड़ा ज़रिया थीं, उनकी जगह 'रेख़्ता' (खड़ी बोली पर आधारित उर्दू) ने ले ली। ब्रज और अवधी का असर जुग़राफ़ियाई (भौगोलिक) और मज़हबी लिहाज़ से महदूद (सीमित) हो चुका था, जबकि नए उभरते हुए समाजी और इक़्तेसादी (आर्थिक) तक़ाज़ों (ज़रूरतों) को एक ऐसी ज़बान की ज़रूरत थी जो बड़े क़ौमी (राष्ट्रीय) दायरे में काम आ सके। रेख़्ता की मक़बूलियत (लोकप्रियता) के साथ ही ग़ज़ल में ऐसी अलामतों (प्रतीकों) का चलन हुआ जिन पर देहाती ज़िंदगी के बजाए 'मदनियत' (शहरी जीवन) का गहरा रंग हावी था।
अहद-ए-वुस्ता (मध्य युग) में शहर का तसव्वुर (ख़याल) आज के सनअती (औद्योगिक) शहरों जैसा नहीं था। उस दौर में शहर आमतौर पर बादशाही लश्कर या मनसब-दारों (शाही पदाधिकारियों) के ठहरने की जगहों के आस-पास आबाद होते थे। लश्कर की ज़रूरतें पूरी करने के लिए व्यापारी, कारीगर, दस्तकार और पेशेवर लोग वहाँ जमा हो जाते, और धीरे-धीरे ये अस्करी (सैन्य) केंद्र एक बा-क़ायदा शहरी और तिजारती (व्यापारिक) तहज़ीब में ढल जाते। अकबर-ए-आज़म के दौर के बाद इस अमल में तेज़ी आई और एक नया मदनी (शहरी) कल्चर उभरा। मीर तक़ी मीर की शायरी इसी उभरती हुई मदनियत और शहरी-तहज़ीब की सबसे बड़ी और मुस्तनद (प्रामाणिक) आवाज़ बनकर सामने आई।
मीर के पहले दीवान का मुताला' (अध्ययन) किया जाए तो अंदाज़ा होता है कि उन्होंने जिन अलामतों (प्रतीकों) का कसरत (बहुतायत) से इस्तेमाल किया है, उनका तअल्लुक़ (संबंध) सीधे तौर पर शहर और उसके इदारों (संस्थानों) से है। मसलन शीरा-ख़ाना (शराबख़ाना), साक़ी, ज़ंजीर, ज़िंदाँ (जेल), अदालत, जौहरी, दैर (मंदिर), मस्जिद, और बाज़ार। लेकिन मीर के यहाँ सबसे ज़्यादा सराहत (स्पष्टता) 'चमन' और उससे जुड़ी चीज़ों (सब्ज़ा, लाला, नर्गिस, गुल, ग़ुंचा) से होती है। दिलचस्प बात ये है कि मीर ने चमन की जो तस्वीरें खींची हैं, वो किसी अपने आप उगे जंगल या बे-तरतीब फ़ितरत की नहीं हैं, बल्कि वो मुग़ल तर्ज़-ए-तामीर (वास्तुकला) के लाज़िमी (ज़रूरी) हिस्से 'पाईं बाग़' की तस्वीरें हैं। इस पाईं बाग़ की नफ़ासत (सुंदरता) पर इंसानी तहज़ीब, काविश (प्रयास) और इर्तक़ा (विकास) की मोहर लगी है।
मीर ने 'गुल' (फूल) की अलामत (प्रतीक) को इतनी वुसअत (विस्तार) दी कि इसके पर्दे में नए तारीखी (ऐतिहासिक) और तहज़ीबी ज़िंदगी के कई रुख़ समो दिए। उनके यहाँ 'गुल' कभी महबूब के मानों में आता है, कभी ये पूरी दुनिया का इस्तिआरा (रूपक) बन जाता है, कभी इंसान के दिल की तर्जुमानी (नुमाइंदगी) करता है, और कभी मसर्रत (ख़ुशी) या इनाम को ज़ाहिर करता है। मीर के नीचे दिए गए अश'आर (शेर) इस बात की गवाही देते हैं कि उन्होंने एक ही अलामत को कितने अलग-अलग तहज़ीबी और जज़्बाती (भावनात्मक) सियाक़-ओ-सबाक़ (संदर्भ) में बरता है:
सहर पा-ए-गुल बे-ख़ुदी हम को आई
कि उस सुस्त-पैमाँ में बू थी कसू की
ये ऐश-गह नहीं है याँ रंग और कुछ है
हर गुल है इस चमन में साग़र भरा लहू का
हम वे हैं जिन के ख़ूँ से तेरी राह सब है गुल
मत कर ख़राब हम को तू औरों में सान कर
पहले शेर में 'गुल' महबूब की अलामत (प्रतीक) है जिसकी ख़ुशबू शायर को बे-ख़ुद (अपने होश से बेगाना) कर देती है। दूसरे शेर में 'गुल' इंसानी दिल या इंसान के ख़ून का इस्तिआरा (रूपक) है जो इश्क़ की राह में क़ुर्बान हो रहा है। जबकि तीसरे शेर में 'गुल' का मतलब रास्ता आरास्ता करना (सजाना) या सुर्ख़-रू (कामयाब) होना है।
मीर के यहाँ मदनियत (शहरी जीवन) का ये अक्स (झलक) गुल और गुलज़ार के हर तज़किरे (ज़िक्र) में मिलता है, जो साबित करता है कि ग़ज़ल की अलामतें महज़ (सिर्फ़) रिवायती (पारंपरिक) नहीं बल्कि अपने दौर की तहज़ीबी नफ़ासतों (सुंदरताओं) और समाजी तब्दीलियों (बदलावों) का ज़िंदा दस्तावेज़ी सुबूत हैं।
