शायरी की महानता का अस्ली फ़ैसला वक़्त करता है, और बीसवीं सदी में अल्लामा इक़बाल के बाद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ वह अकेले शायर हैं जिनकी लोकप्रियता और अहमियत को हर स्तर पर माना गया है। तरक़्क़ी-पसंद (प्रगतिशील) आंदोलन से जुड़े होने के बा-वुजूद, फ़ैज़ का अनोखापन सिर्फ़ उनके विषयों में नहीं छिपा था। सामाजिक न्याय, साम्राज्यवाद का विरोध, और अवाम के दुख-दर्द की तर्जुमानी तो उस दौर के दूसरे तरक़्क़ी-पसंद शायरों के यहाँ भी मौजूद थी, लेकिन जो चीज़ फ़ैज़ को उनके समकालीनों से अलग करती है, वह उनका अनोखा 'मानियाती निज़ाम' (अर्थ-तंत्र) और अंदाज़-ए-बयाँ की ख़ासियत है।
किसी भी बड़े शायर की तरह फ़ैज़ ने कोई नई शब्दावली ईजाद नहीं की, बल्कि उन्होंने ग़ालिब और इक़बाल के डिक्शन (शब्द-चयन) का विस्तार किया। उनकी तमाम शब्दावली फ़ारसी और उर्दू की क्लासिकी शेरी रिवायत (काव्य-परंपरा) से ली गई है। हालाँकि, उनका कमाल यह है कि उन्होंने इन सदियों पुराने शब्दों, वाक्यांशों और अभिव्यक्ति के ढाँचों को उनके पारंपरिक मानी से हटाकर एक बिल्कुल नए अर्थ-तंत्र के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने पुराने शब्दों को एक नए स्वाद, अहसास और अर्थ की शान से भर दिया।
इस बात की बेहतरीन मिसाल उनकी नज़्म 'मुलाक़ात' में देखी जा सकती है। इस नज़्म की बुनियाद रात और सुबह के पारंपरिक विचारों पर है, जहाँ रात ज़ुल्म और ज़्यादती का रूपक (इस्तियारा) है और सुबह जीत की निशानी। लेकिन फ़ैज़ का कमाल उनका अंदाज़-ए-बयाँ है:
ये रात उस दर्द का शजर है
जो मुझसे, तुझसे अज़ीम-तर है
अज़ीम-तर है कि इसकी शाख़ों
में लाख मशअल-ब-कफ़ सितारों
के कारवाँ, घिर के खो गए हैं
यहाँ 'रात', 'दर्द' और 'शजर' पुराने शब्द हैं, लेकिन रात को 'दर्द का शजर' कहना एक बहुत ही नायाब और अछूता रूपक है। सितारों के कारवाँ का खो जाना और चाँद का अपना नूर रो जाना, दर्द के अहसास को एक वैश्विक (आफ़ाक़ी) और सामाजिक स्तर पर ले जाता है। यह सिर्फ़ एक निजी तजुर्बा नहीं रहता बल्कि पूरी इंसानियत की पीड़ा का रूपक बन जाता है।
इसी तरह फ़ैज़ ने ग़ज़ल की विधा (सिन्फ़) में भी कमाल दिखाया। उनकी ग़ज़लों में 'रविश' (रास्ता), 'बहार', 'दिल के दाग़', 'हिजरान-ए-यार' (महबूब से जुदाई), 'तौक़-ओ-दार' (फाँसी का फंदा और बेड़ी) और 'क़फ़स' (पिंजरा) जैसे शब्द रूमानी शायरी से हटकर एक अलग सामाजिक और राजनीतिक अर्थ-तंत्र बनाते हैं।
रविश-रविश है वही इंतिज़ार का मौसम
नहीं है कोई भी मौसम बहार का मौसम
यही जुनूँ का, यही तौक़-ओ-दार का मौसम
यही है जब्र, यही इख़्तियार का मौसम
यहाँ 'तौक़-ओ-दार' के संदर्भ से 'जुनूँ' अब देशभक्ति और साम्राज्यवाद के विरोध की तर्जुमानी करता है। फ़ैज़ का यह अर्थ-तंत्र साबित करता है कि वह सिर्फ़ नारे-बाज़ शायर नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने रचनात्मक जादू से क्लासिकी रिवायत को एक नया चोला पहनाया, जिसने उर्दू शायरी को एक नई दिशा और ताज़गी बख़्शी।
