तअशशुक़ लखनवी
ग़ज़ल 13
अशआर 28
मैं बाग़ में हूँ तालिब-ए-दीदार किसी का
गुल पर है नज़र ध्यान में रुख़्सार किसी का
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हम किस को दिखाते शब-ए-फ़ुर्क़त की उदासी
सब ख़्वाब में थे रात को बेदार हमीं थे
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वो खड़े कहते हैं मेरी लाश पर
हम तो सुनते थे कि नींद आती नहीं
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जिस तरफ़ बैठते थे वस्ल में आप
उसी पहलू में दर्द रहता है
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कभी तो शहीदों की क़ब्रों पे आओ
ये सब घर तुम्हारे बसाए हुए हैं
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