शाग़िल उसमानी
अशआर 5
का'बा में कलीसा में उसे ढूँड के आख़िर
हद ये है कि आ पहुँचे हैं अब कू-ए-बुताँ तक
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नूर-ए-सहर-ओ-रंग-ए-सहर पर नहीं मौक़ूफ़
दुश्मन है शब-ए-वस्ल में आवाज़-ए-अज़ाँ तक
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वा'दा तो वफ़ा हो कि न हो ये है शिकायत
लब से कभी निकली नहीं तस्कीन को हाँ तक
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होने को सहर आई है ख़ामोश हो ऐ शम्अ
तू सोज़िश-ए-परवाना पे रोएगी कहाँ तक
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साक़ी का करम देख कि इक आन में 'शाग़िल'
पहुँचा ही दिया बारगह-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक
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