संदीप गुप्ते
ग़ज़ल 9
अशआर 12
दुल्हन की मेहंदी जैसी है उर्दू ज़बाँ की शक्ल
ख़ुशबू बिखेरता है इबारत का हर्फ़ हर्फ़
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मैं तुम्हारे शहर की तहज़ीब से वाक़िफ़ न था
पत्थरों से की नहीं थी गुफ़्तुगू पहले कभी
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हमें क़ुबूल नहीं छोटा मुँह बड़ी बातें
मिसाल बनते हैं और फिर मिसाल देते हैं
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ग़ज़ल में जब तलक एहसास की शिद्दत न हो शामिल
फ़क़त अल्फ़ाज़ की कारीगरी महसूस होती है
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कोई भी शख़्स दुनिया में तुम्हें छोटा नज़र न आए
तुम अपने सोचने का दायरा इतना बड़ा कर लो
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