सलीम सिद्दीक़ी
अशआर 5
दुश्मन से ऐसे कौन भला जीत पाएगा
जो दोस्ती के भेस में छुप कर दग़ा करे
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न तो रंज-ओ-ग़म से ही रब्त है न ही आश्ना-ए-ख़ुशी हूँ मैं
मिरी ज़िंदगी भी अजीब है इसे मंज़िलों का पता नहीं
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मुल्क की गलियाँ लहू पीने की आदी हो न जाएँ
ये तअ'स्सुब ज़ह्र का ज़ेहनों में भरना छोड़ दे
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एक दिन तो दिल को भी तरजीह दे कर देख लूँ
अक़्ल से कह दो कि मुझ को आज तन्हा छोड़ दे
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गलियों गलियों शहरों शहरों किस ने आग लगाई है
बुग़्ज़-ओ-नफ़रत का दुनिया को किस ने ये माहौल दिया
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