aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1853 - 1934 | ख़ैराबाद, भारत
शराब पर शायरी के लिए प्रसिध्द , जब कि कहा जाता है कि उन्हों ने शराब को कभी हाथ नहीं लगाया।
ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते
क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते
मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो
मुट्ठी में उन की दे दे कोई दिल निकाल के
बच जाए जवानी में जो दुनिया की हवा से
होता है फ़रिश्ता कोई इंसाँ नहीं होता
दिल-जलों से दिल-लगी अच्छी नहीं
रोने वालों से हँसी अच्छी नहीं
देखिएगा सँभल कर आईना
सामना आज है मुक़ाबिल का
Intikhab-e-Kulliyat-e-Riyaz Khairabadi
1982
Intikhab-e-Riyaz Khairabadi
1983
इंतिख़ाब-ए-रियाज़ ख़ैराबादी
1959
Kalam-e-Riyaz
कलाम-ए-रियाज़ ख़ैराआबादी
1960
Maikhana-e-Riyaz
क़ुल्क़ुल-ए-मीना
1998
Riyaz Khairabadi
1964
आलम-ए-हू में कुछ आवाज़ सी आ जाती है चुपके चुपके कोई कहता है फ़साना दिल का
ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते
मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो मुट्ठी में उन की दे दे कोई दिल निकाल के
ऐसी ही इंतिज़ार में लज़्ज़त अगर न हो तो दो घड़ी फ़िराक़ में अपनी बसर न हो
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