पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल 37
अशआर 26
सिक्का अपना नहीं जमता है तुम्हारे दिल पर
नक़्श अग़्यार के किस तौर से जम जाते हैं
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रुबाई 7
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