नवाब सैफ अली सय्याफ़
अशआर 7
ख़ुदारा इक निगाह-ए-नाज़ ही से देख लो हम को
गरेबाँ फाड़ने को आज हम तय्यार बैठे हैं
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आ जाएँ वक़्त-ए-नज़अ' तो मैं उन को देख लूँ
अरमान कोई दिल में अब इस के सिवा नहीं
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मिलना कैसा कि याद भी न किया
मेरे नालों का कुछ असर न हुआ
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जुनून-ए-मोहब्बत ने ये दिन दिखाया
कि दुनिया में रुस्वा हुआ चाहता हूँ
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मेरे नालों की जो आवाज़ पहुँच जाती है
घर से बाहर निकल आते हैं परेशाँ हो कर
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