नीलमा नाहीद दुर्रानी
ग़ज़ल 20
नज़्म 6
अशआर 6
औरत अपना आप बचाए तब भी मुजरिम होती है
औरत अपना आप गँवाए तब भी मुजरिम होती है
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कोई तो आए ख़िज़ाँ में पत्ते उगाने वाला
गुलों की ख़ुशबू को क़ैद करना कोई तो सीखे
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- ग़ज़ल देखिए
शबनम तुम्हारे सहन में रोई तमाम रात
लेकिन हर एक फूल का चेहरा निखर गया
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मैं ने सूरज चाँद सितारे तेरे नाम लिखे हैं
जग में जितने फूल हैं सारे तेरे नाम लिखे हैं
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हम अपने आप में गुम जा रहे थे
किसी गुफ़्तार ने चौंका दिया था
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