मोहम्मद ज़ुबैर रूही इलाहाबादी
अशआर 2
तिरी याद में थी वो बे-ख़ुदी कि न फ़िक्र-ए-नामा-बरी रही
मिरी वो निगारिश-ए-शौक़ भी कहीं ताक़ ही पे धरी रही
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गई फ़स्ल-ए-गुल तो न गुल रहे न गुलों की जामा-दरी रही
न वो रंग-ओ-बू की फ़ज़ा रही न चमन की जल्वागरी रही
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