कृष्ण अदीब
ग़ज़ल 8
अशआर 3
धीमा धीमा दर्द सुहाना हम को अच्छा लगता था
दुखते जी को और दुखाना हम को अच्छा लगता था
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शो-केस में रक्खा हुआ औरत का जो बुत है
गूँगा ही सही फिर भी दिल-आवेज़ बहुत है
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पुश्त पर क़ातिल का ख़ंजर सामने अंधा कुआँ
बच के जाऊँ किस तरफ़ अब रास्ता कोई नहीं
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चित्र शायरी 1
जब भी आती है तिरी याद कभी शाम के बअ'द और बढ़ जाती है अफ़्सुर्दा-दिली शाम के बअ'द अब इरादों पे भरोसा है न तौबा पे यक़ीं मुझ को ले जाए कहाँ तिश्ना-लबी शाम के बअ'द यूँ तो हर लम्हा तिरी याद का बोझल गुज़रा दिल को महसूस हुई तेरी कमी शाम के बअ'द यूँ तो कुछ शाम से पहले भी उदासी थी 'अदीब' अब तो कुछ और बढ़ी दिल की लगी शाम के बअ'द