इज्तिबा रिज़वी
ग़ज़ल 33
नज़्म 4
अशआर 52
अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न
हम को ख़िज़ाँ ने तुम को सँवारा बहार ने
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ज़बाँ से दिल का फ़साना अदा किया न गया
ये तर्जुमाँ तो बनी थी मगर बना न गया
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हज़ार आरज़ू हो तुम यक़ीं हो तुम गुमाँ हो तुम
क़फ़स-नसीब रूह की उमीद-ए-आशियाँ हो तुम
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मिरे साज़-ए-नफ़स की ख़ामुशी पर रूह कहती है
न आई मुझ को नींद और सो गया अफ़्साना-ख़्वाँ मेरा
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फ़ित्ने जगा के दहर में आग लगा के शहर में
जा के अलग खड़े हुए कहने लगे कि हम नहीं
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