फ़ारूक़ शफ़क़
ग़ज़ल 20
अशआर 11
दिन किसी तरह से कट जाएगा सड़कों पे 'शफ़क़'
शाम फिर आएगी हम शाम से घबराएँगे
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होने वाला था इक हादसा रह गया
कल का सब से बड़ा वाक़िआ रह गया
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अपनी लग़्ज़िश को तो इल्ज़ाम न देगा कोई
लोग थक-हार के मुजरिम हमें ठहराएँगे
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सामने झील है झील में आसमाँ
आसमाँ में ये उड़ता हुआ कौन है
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शहर में जीना है चलना दो-रुख़ी तलवार पर
आदमी किस से बचे किस की तरफ़-दारी करे
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