फ़ैज़ झंझानवी
अशआर 9
आओ ग़म-ए-पुर्सिश क्या मैं शिकवे से बाज़ आया
तुम चार क़दम पीछे क्यों हो सफ़-ए-महशर से
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आओ ग़म-ए-पुर्सिश क्या मैं शिकवे से बाज़ आया
तुम चार क़दम पीछे क्यों हो सफ़-ए-महशर से
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ले कर अंगड़ाई उठी जब निगह-ए-हुस्न-ए-तलब
ज़र्रे ज़र्रे में उन्हें अंजुमन-आरा देखा
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सर-ए-जमशेद को ख़िश्त-ए-ख़ुम-ए-सहबा से टकरा दें
गदा-ए-मय-कदा भी किस क़दर मग़रूर होते हैं
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मातम न क्यों करूँ दिल-ए-साहिल-नसीब का
इस बहर-ए-ज़िंदगी में तलातुम हयात है
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