बलवान सिंह आज़र
ग़ज़ल 13
अशआर 11
पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए
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हार जाएगी यक़ीनन तीरगी
गर मुसलसल रौशनी ज़िंदा रही
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हवा के दोश पर लगता है उड़ने
जो पत्ता टूट जाता है शजर से
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ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र
कोई थक-हार गया है मुझ में
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कोई मंज़िल कभी नहीं आई
रास्ते में था रास्ते में हूँ
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