बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल 52
अशआर 64
'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में इंसान की कसौटी बुद्धि नहीं, बल्कि आचरण और ईश्वर-चेतना है। सुख में ईश्वर की याद कृतज्ञता और विनम्रता दिखाती है, और गुस्से में ईश्वर का डर संयम और न्याय बनाए रखता है। जो दोनों हालात में यह भूल जाए, उसकी समझ व्यर्थ और उसका चरित्र कमज़ोर हो जाता है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ कवि अपनी “हसरतों” को जैसे व्यक्ति मानकर उनसे बात करता है, मानो वे दिल में रहने आ गई हों। दिल पहले से दुख और घावों के निशानों से भरा है, इसलिए नई इच्छाओं को रखने की गुंजाइश नहीं बची। भाव यह है कि पीड़ा ने मन को इतना भर दिया है कि अब चाहत भी बोझ लगने लगी है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रेम की एकतरफ़गी साफ दिखती है: प्रिय व्यक्ति को याद करने की फुरसत ही नहीं, जबकि प्रेमी का मन पूरी तरह उसी में डूबा है। “याद” और “भूलना” मन की लगन और प्राथमिकता के रूपक हैं—एक ओर उदासीनता, दूसरी ओर खुद को मिटा देने वाली निष्ठा। इसी असमानता से पीड़ा पैदा होती है।
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में “दो गज़ ज़मीन” जीवन के बाद मिलने वाली सबसे छोटी जगह, यानी कब्र की जगह, का प्रतीक है। “प्रेमिका का मुहल्ला” अपनापन, पास होने और स्वीकार होने का संकेत बन जाता है। भाव यह है कि वक्ता अंतिम समय में भी अपने प्रिय के पास रहना चाहता है, लेकिन भाग्य उसे उस नज़दीकी से भी वंचित कर देता है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में आत्म-चिंतन की बात है। अपनी ही स्थिति से अनजान व्यक्ति अक्सर दूसरों की कमियाँ खोजता और उनके गुण गिनता रहता है। लेकिन जैसे ही वह अपनी कमज़ोरियों को देखता है, उसके भीतर विनम्रता आती है और निर्णय करने की कठोरता घट जाती है। तब उसकी दृष्टि अधिक करुण और समझदार हो जाती है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
पुस्तकें 74
चित्र शायरी 15
कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए
कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए