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अज़ीज़ नबील

1976 | क़तर

क़तर में रहनेवाले प्रसिद्ध शायर

क़तर में रहनेवाले प्रसिद्ध शायर

अज़ीज़ नबील

ग़ज़ल 35

अशआर 92

फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग

राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी

सारे सपने बाँध रखे हैं गठरी में

ये गठरी भी औरों में बट जाएगी

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बहका तो बहुत बहका सँभला तो वली ठहरा

इस चाक-गरेबाँ का हर रंग निराला था

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वो एक राज़! जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं

उस एक राज़ से पर्दा उठा दिया गया है

एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की

टाँग दीजे ऊँचे मीनारों के बीच

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पुस्तकें 14

वीडियो 24

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

अज़ीज़ नबील

कोई फ़रियाद मुझे तोड़ के सन से निकली

अज़ीज़ नबील

ख़ामुशी टूटेगी आवाज़ का पत्थर भी तो हो

अज़ीज़ नबील

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

अज़ीज़ नबील

बे-सबब ही कभी आवाज़ लगाओ तो सही

अज़ीज़ नबील

बे-सबब ही कभी आवाज़ लगाओ तो सही

अज़ीज़ नबील

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

अज़ीज़ नबील

ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे

अज़ीज़ नबील

ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे

अज़ीज़ नबील

वक़्त के बे-ढब रस्तों पर और उल्टी सीधी चाल में ख़ुश

अज़ीज़ नबील

ऑडियो 4

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

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