अज़ीज़ फ़ैसल
नज़्म 1
अशआर 20
वो साड़ी ज्यूलरी के तहाइफ़ पे थी ब-ज़िद
हम सौ रूपे की शाल से आगे नहीं गए
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है कामयाबी-ए-मर्दां में हाथ औरत का
मगर तू एक ही औरत पे इंहिसार न कर
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मैं एक बोरी में लाया हूँ भर के मूँग-फली
किसी के साथ दिसम्बर की रात काटनी है
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वो अफ़तारी से पहले चखते चखते
खुजूरें और पकौड़े खा चुका है
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वो तीस साल से है फ़क़त बीस साल की
चेहरे पे आ चुकी है बुज़ुर्गी जमाल की
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