मर्सिया-ए-मिर्ज़ा-ग़ालिब
मर्सिया-ए-मिर्ज़ा-ग़ालिब
क्या कहूँ हाल-ए-दर्द-ए-पिन्हानी
वक़्त कोताह ओ क़िस्सा तूलानी
'ऐश-ए-दुनिया से हो गया दिल सर्द
देख कर रंग-ए-'आलम-ए-फ़ानी
कुछ नहीं जुज़ तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल
गोशा-ए-फ़क़्र बज़्म-ए-सुल्तानी
है सरासर फ़रेब-ए-वहम-ओ-गुमाँ
ताज-ए-फ़ग़्फ़ूर ओ तख़्त-ए-ख़ाक़ानी
बे-हक़ीक़त है शक्ल-ए-मौज-ए-सराब
जाम-ए-जमशेद राह-ए-रैहानी
लफ़्ज़-ए-मुहमल है नुत्क़-ए-आ'राबी
हर्फ़-ए-बातिल है 'अक़्ल-ए-यूनानी
एक धोका है लहन-ए-दाऊदी
इक तमाशा है हुस्न-ए-कन'आनी
न करूँ तिश्नगी में तर लब-ए-ख़ुश्क
चश्मा-ए-ख़िज़्र का हो गर पानी
लूँ न इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले
गर मिले ख़ातम-ए-सुलेमानी
बहर-ए-हस्ती ब-जुज़ सराब नहीं
चश्मा-ए-ज़िंदगी में आब नहीं
जिस से दुनिया ने आश्नाई की
उस से आख़िर को कज-अदाई की
तुझ पे फूले कोई 'अबस ऐ 'उम्र
तू ने की जिस से बेवफ़ाई की
है ज़माना वफ़ा से बेगाना
हाँ क़सम मुझ को आश्नाई की
ये वो बे-मेहर है कि है इस की
सुल्ह में चाशनी लड़ाई की
है यहाँ हज़्ज़-ए-वस्ल से महरूम
जिस को ताक़त न हो जुदाई की
है यहाँ हिफ़्ज़-ए-वज़' से मायूस
जिस को 'आदत न हो गदाई की
ख़ंदा-ए-गुल से बे-बक़ा-तर है
शान हो जिस में दिल-रुबाई की
जिंस-ए-कासिद से नारवा-तर है
ख़ूबियाँ जिस में हों ख़ुदाई की
बात बिगड़ी रही-सही अफ़सोस
आज ख़ाक़ानी ओ सनाई की
रश्क-ए-'उर्फ़ी ओ फ़ख़्र-ए-तालिब मुर्द
असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब मुर्द
बुलबुल-ए-हिन्द मर गया हैहात
जिस की थी बात बात में इक बात
नुक्ता-दाँ नुक्ता-संज नुक्ता-शनास
पाक-दिल पाक-ज़ात पाक-सिफ़ात
शैख़ और बज़ला-संज शोख़-मिज़ाज
रिंद और मरजा'-ए-किराम ओ सिक़ात
लाख मज़मून और उस का एक ढिढोल
सौ तकल्लुफ़ और उस की सीधी बात
दिल में चुभता था वो अगर ब-मसल
दिन को कहता दिन और रात को रात
हो गया नक़्श दिल पे जो लिक्खा
क़लम उस का था और उस की दवात
थीं तो दिल्ली में उस की बातें थीं
ले चलें अब वतन को क्या सौग़ात
उस के मरने से मर गई दिल्ली
ख़्वाजा नौशा था और शहर बरात
याँ अगर बज़्म थी तो उस की बज़्म
याँ अगर ज़ात थी तो उस की ज़ात
एक रौशन दिमाग़ था न रहा
शहर में इक चराग़ था न रहा
दिल को बातें जब उस की याद आएँ
किस की बातों से दिल को बहलाएँ
किस को जा कर सुनाएँ शे'र-ओ-ग़ज़ल
किस से दाद-ए-सुख़नवरी पाएँ
मर्सिया उस का लिखते हैं अहबाब
किस से इस्लाह लें किधर जाएँ
पस्त-मज़मूँ है नौहा-ए-उस्ताद
किस तरह आसमाँ पे पहुँचाएँ
लोग कुछ पूछने को आए हैं
अहल-ए-मय्यत जनाज़ा ठहराएँ
लाएँगे फिर कहाँ से 'ग़ालिब' को
सू-ए-मदफ़न अभी न ले जाएँ
इस को अगलों पे क्यों न दें तरजीह
अहल-ए-इंसाफ़ ग़ौर फ़रमाएँ
क़ुदसी ओ साइब ओ असीर ओ कलीम
लोग जो चाहें उन को ठहराएँ
हम ने सब का कलाम देखा है
है अदब शर्त मुँह न खुलवाएँ
ग़ालिब-ए-नुक्ता-दाँ से क्या निस्बत
ख़ाक को आसमाँ से क्या निस्बत
नस्र हुस्न ओ जमाल की सूरत
नज़्म ग़ुंज ओ दलाल की सूरत
तहनियत इक नशात की तस्वीर
ता'ज़ियत इक मलाल की सूरत
क़ाल उस का वो आइना जिस में
नज़र आती थी हाल की सूरत
उस की तौजीह से पकडती थी
शक्ल-ए-इम्काँ मुहाल की सूरत
उस की तावील से बदलती थी
रंग-ए-हिज्राँ विसाल की सूरत
लुत्फ़ आग़ाज़ से दिखाता था
सुख़न उस का मआ'ल की सूरत
चश्म-ए-दौराँ से आज छुपती है
अनवरी ओ कमाल की सूरत
लौह-ए-इम्काँ से आज मिटती है
'इल्म ओ फ़ज़्ल ओ कमाल की सूरत
देख लो आज फिर न देखोगे
'ग़ालिब'-ए-बे-मिसाल की सूरत
अब न दुनिया में आएँगे ये लोग
कहीं ढूँडे न पाएँगे ये लोग
शहर में जो है सोगवार है आज
अपना बेगाना अश्क-बार है आज
नाज़िश-ए-ख़ल्क़ का महल न रहा
रिहलत-ए-फ़ख़्र-ए-रोज़गार है आज
था ज़माने में एक रंगीं तब'
रुख़्सत-ए-मौसम-ए-बहार है आज
बार-ए-अहबाब जो उठाता था
दोश-ए-अहबाब पर सवार है आज
थी हर इक बात नेश्तर जिस की
उस की चुप से जिगर फ़िगार है आज
दिल में मुद्दत से थी ख़लिश जिस की
वही बरछी जिगर के पार है आज
दिल-ए-मुज़्तर को कौन दे तस्कीं
मातम-ए-यार-ए-ग़म-गुसार है आज
तल्ख़ी-ए-ग़म कही नहीं जाती
जान-ए-शीरीं भी नागवार है आज
किस को लाते हैं बह्र-ए-दफ़्न कि क़ब्र
हमा-तन चश्म-ए-इन्तिज़ार है आज
ग़म से भरता नहीं दिल-ए-नाशाद
किस से ख़ाली हुआ जहानाबाद
नक़्द-ए-मा'नी का गंज-दाँ न रहा
ख़्वान-ए-मज़मूँ का मेज़बाँ न रहा
साथ उस के गई बहार-ए-सुख़न
अब कुछ अँदेशा-ए-ख़िज़ाँ न रहा
हुआ इक एक कारवाँ-सालार
कोई सालार-ए-कारवाँ न रहा
रौनक़-ए-हुस्न था बयाँ उस का
गर्म बाज़ार-ए-गुल-रुख़ाँ न रहा
'इश्क़ का नाम उस से रौशन था
क़ैस-ओ-फ़रहाद का निशाँ न रहा
हो चुकीं हुस्न-ओ-'इश्क़ की बातें
गुल-ओ-बुलबुल का तर्जुमाँ न रहा
अहल-ए-हिन्द अब करेंगे किस पर नाज़
रश्क-ए-शीराज़ ओ इसफ़हाँ न रहा
ज़िंदा क्यूँकर रहेगा नाम-ए-मुलूक
बादशाहों का मद्ह-ख़्वाँ न रहा
कोई वैसा नज़र नहीं आता
वो ज़मीं और वो आसमाँ न रहा
उठ गया था जो माया-दार-ए-सुख़न
किस को ठहराएँ अब मदार-ए-सुख़न
क्या है जिस में वो मर्द-ए-कार न था
इक ज़माना कि साज़गार न था
शा'इरी का किया हक़ उस ने अदा
पर कोई उस का हक़-गुज़ार न था
बे-सिला मद्ह ओ शे'र बे-तहसीन
सुख़न उस का किसी पे बार न था
नज़्र-ए-साइल थी जान तक लेकिन
दर-ख़ुर-ए-हिम्मत इक़्तिदार न था
मुल्क-ओ-दौलत से बहरा-वर न हुआ
जान देने पे इख़्तियार न था
ख़ाकसारों से ख़ाकसारी थी
सर-बलन्दों से इंकिसार न था
लब पे अहबाब से भी था न गिला
दिल में आ'दा से भी ग़ुबार न था
बे-रियाई थी ज़ोह्द के बदले
ज़ुहद उस का अगर शि'आर न था
ऐसे पैदा कहाँ हैं मस्त-ओ-ख़राब
हम ने माना कि होश्यार न था
मज़हर-ए-शान-ए-हुस्न-ए-फ़ितरत था
मा'नी-ए-लफ़्ज़-ए-आदमिय्यत था
कुछ नहीं फ़र्क़ बाग़-ओ-ज़िंदाँ में
आज बुलबुल नहीं गुलिस्ताँ में
शहर सारा बना है बैत-ए-हुज़्न
एक यूसुफ़ नहीं जो कन'आँ में
मुल्क यकसर हुआ है बे-आईन
इक फ़लातूँ नहीं जो यूनाँ में
ख़त्म थी इक ज़बाँ पे शीरीनी
ढूँडते क्या हो सेब-ओ-रूम्माँ में
हस्र थी इक बयाँ में रंगीनी
क्या धरा है 'अक़ीक़ ओ मर्जां में
लब-ए-जादू-बयाँ हुआ ख़ामोश
गोश-ए-गुल वा है क्यों गुलिस्ताँ में
गोश-ए-मा'नी-शिनौ हुआ बे-कार
मुर्ग़ क्यों ना'रा-ज़न है बुस्ताँ में
वो गया बज़्म जिस से रौशन थी
शम' जलती है क्यों शबिस्ताँ में
न रहा जिस से था फ़रोग़-ए-नज़र
सुर्मा बनता है क्यों सफ़ाहाँ में
माह-ए-कामिल में आ गई ज़ुल्मत
आब-ए-हैवाँ पे छा गई ज़ुल्मत
हिन्द में नाम पाएगा अब कौन
सिक्का अपना बिठाएगा अब कौन
हम ने जानी है उस से क़द्र-ए-सल्फ़
उन पर ईमान लाएगा अब कौन
उस ने सब को भुला दिया दिल से
उस को दिल से भुलाएगा अब कौन
थी किसी की न जिस में गुंजाइश
वो जगह दिल में पाएगा अब कौन
उस से मिलने को याँ हम आते थे
जा के दिल्ली से आएगा अब कौन
मर गया क़द्र-दान-ए-फ़ह्म-ए-सुख़न
शे'र हम को सुनाएगा अब कौन
मर गया तिश्ना-ए-मज़ाक़-ए-कलाम
हम को घर से बुलाएगा अब कौन
था बिसात-ए-सुख़न में शातिर एक
हम को चालें बताएगा अब कौन
शे'र में ना-तमाम है 'हाली'
ग़ज़ल उस की बनाएगा अब कौन
कम लना फ़ीही मिम बुका-ओ-'अवील
व 'इताबुन म'अज़्ज़मानि-तवील
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