Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

यकसू भी लग रहा हूँ बिखरने के बावजूद

ज़फ़र इक़बाल

यकसू भी लग रहा हूँ बिखरने के बावजूद

ज़फ़र इक़बाल

MORE BYज़फ़र इक़बाल

    यकसू भी लग रहा हूँ बिखरने के बावजूद

    पूरी तरह मरा नहीं मरने के बावजूद

    इक धूप सी तनी हुई बादल के आर-पार

    इक प्यास है रुकी हुई झरने के बावजूद

    उस को भी याद करने की फ़ुर्सत थी मुझे

    मसरूफ़ था मैं कुछ भी करने के बावजूद

    पहला भी दूसरा ही किनारा हो जिस तरह

    हालत वही है पार उतरने के बावजूद

    अपनी तरफ़ ही रुख़ था वहाँ वारदात का

    इल्ज़ाम उस के नाम पे धरने के बावजूद

    हैराँ हूँ मुझ में इतनी ये हिम्मत कहाँ से आई

    कर ही गया हूँ काम जो डरने के बावजूद

    होना पड़ा होते हुए भी मुझे यहाँ

    कुछ याद रह गया हूँ बिसरने के बावजूद

    जैसा भी ये सफ़र हो ज़रा ग़ौर कीजिए

    कैसा रवाँ-दवाँ हूँ ठहरने के बावजूद

    निकला नहीं है कोई नतीजा यहाँ 'ज़फ़र'

    करने के बावजूद भरने के बावजूद

    Suggested Book
    Ghazal Ka Shor book cover

    Ghazal Ka Shor

    Author: Zafar Iqbal
    Publication: Rekhta Publications (2023)
    Buy This Book

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए