कौन जाने किस तरफ़ से पहला पत्थर आएगा
कौन जाने किस तरफ़ से पहला पत्थर आएगा
शाम के ढलते ही जब पागल गदागर आएगा
ज़र्द चेहरा देख कर उस का बुरा मत मानना
चाँद अब तारीक राहों से गुज़र कर आएगा
प्यार के रस्ते हमेशा की तरह पुर-पेच हैं
जो भी उन राहों से आया ज़ख़्म खा कर आएगा
घर के आँगन में न तारीकी के तू मेले लगा
रौशनी के शहर से हो कर सितम-गर आएगा
अध-खिली कलियाँ बिछा दूँ हर गली हर मोड़ पर
कौन जाने आज किस रस्ते से वो घर आएगा
अपनी बारी के हैं 'अर्शी' लोग कितने मुंतज़िर
ज़र्फ़ बदलेंगे तो जब हाथों में साग़र आएगा
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.