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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है

शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं

ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी

आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं

कश्ती-ए-दिल की इलाही बहर-ए-हस्ती में हो ख़ैर

नाख़ुदा मिलते हैं लेकिन बा-ख़ुदा मिलता नहीं

ग़ाफ़िलों को क्या सुनाऊँ दास्तान-ए-इश्क़-ए-यार

सुनने वाले मिलते हैं दर्द-आश्ना मिलता नहीं

ज़िंदगानी का मज़ा मिलता था जिन की बज़्म में

उन की क़ब्रों का भी अब मुझ को पता मिलता नहीं

सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा

क्या तअ'ज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं

पुख़्ता तबओं पर हवादिस का नहीं होता असर

कोहसारों में निशान-ए-नक़्श-ए-पा मिलता नहीं

शैख़-साहिब बरहमन से लाख बरतें दोस्ती

बे-भजन गाए तो मंदिर से टिका मिलता नहीं

जिस पे दिल आया है वो शीरीं-अदा मिलता नहीं

ज़िंदगी है तल्ख़ जीने का मज़ा मिलता नहीं

लोग कहते हैं कि बद-नामी से बचना चाहिए

कह दो बे उस के जवानी का मज़ा मिलता नहीं

अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल

मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं

चल बसे वो दिन कि यारों से भरी थी अंजुमन

हाए अफ़्सोस आज सूरत-आश्ना मिलता नहीं

मंज़िल-ए-इशक़-ओ-तवक्कुल मंज़िल-ए-एज़ाज़ है

शाह सब बस्ते हैं याँ कोई गदा मिलता नहीं

बार तकलीफों का मुझ पर बार-ए-एहसाँ से है सहल

शुक्र की जा है अगर हाजत-रवा मिलता नहीं

चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या

बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ मह-लक़ा मिलता नहीं

मा'नी-ए-दिल का करे इज़हार 'अकबर' किस तरह

लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं

स्रोत :
  • पुस्तक : kulliyat-e-akbar allahabadi (पृष्ठ 41)

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