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वो तेग़-ए-नाज़ कि गुल-रंग है लहू की तरह

शायर लखनवी

वो तेग़-ए-नाज़ कि गुल-रंग है लहू की तरह

शायर लखनवी

MORE BYशायर लखनवी

    वो तेग़-ए-नाज़ कि गुल-रंग है लहू की तरह

    'अज़ीज़ है मुझे अपनी रग-ए-गुलू की तरह

    तही हैं रिंद सर-ए-मय-कदा सुबू की तरह

    चराग़ कौन जिलाए मिरे लहू की तरह

    चमन नय जब कभी दीवार बन के रोका है

    गुज़र गया हों मैं इक मौज-ए-रंग-ओ-बू की तरह

    सिखा रहे हैं वो आदाब-ए-मय-कशी हम को

    जू मय-कदे में छलकते रहे सुबू की तरह

    बहार में भी नहीं कोई शाख़-ए-गुल महफ़ूज़

    चमन का हसन है मुफ़्लिस की आबरू की तरह

    तिरे विसाल की ख़ुशबू तिरे फ़िराक़ का रंग

    मरी हयात है इक शहर-ए-रंग-ओ-बू की तरह

    सुकूत पर भी वो शायद बिठाएँगे पहरे

    सुकूत भी तो है इक जुर्म-ए-गुफ़्तुगू की तरह

    हमें भी देख कि हम ज़िंदगी के सहरा में

    खिले हुए हैं किसी ज़ख़्म-ए-आरज़ू की तरह

    जो तू मिले तो मुलाक़ात अपने आप से हो

    तिरी तलाश में हूँ अपनी जुस्तुजू की तरह

    गुज़र रहा हूँ अब उन मंज़िलों से ऐ 'शा'इर'

    है आरज़ू भी जहाँ तर्क-ए-आरज़ू की तरह

    खिंची है जब किसी बातिल की तेग़ ऐ 'शा'इर'

    चमक उठी है सदाक़त मिरे लहू की तरह

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