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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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सादिक़ बाजवा

अशआर 2

साक़िया मुहर-ब-लब कर के सिला क्या पाया

हश्र कुछ और ख़मोशी ने बपा रक्खा है

उम्र गुज़री है मगर ख़ुद से जुदा कर न सके

भूलने वाले तिरी याद में क्या रक्खा है

 

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