Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

उर्दू रस्म-उल-ख़त की इस्लाह

सय्यद सिब्ते हसन


Translated By: Rekhta Editor

सय्यद सिब्ते हसन

उर्दू रस्म-उल-ख़त की इस्लाह

सय्यद सिब्ते हसन

MORE BYसय्यद सिब्ते हसन

    उर्दू रस्म-उल-ख़त का सुधार

    सिब्ते हसन साहब का यह लेख दैनिक 'इमरोज़' ने दो किश्तों में अपने 6 और 7 जून 1955 ई. के अंकों में प्रकाशित किया (संपादक)।

    जनाब डॉक्टर मौलवी अब्दुल हक़ साहब का एक लेख उर्दू के रस्म-उल-ख़त (लिपि) के बारे में अख़बार 'इमरोज़' दिनांक 30 मई में नज़र से गुज़रा। इस लेख में मोहतरम मौलवी साहब ने मियां अफ़ज़ल हुसैन साहब, वाइस चांसलर पंजाब यूनिवर्सिटी, के इस सुझाव का विरोध किया है कि उर्दू के प्रचलित रस्म-उल-ख़त को छोड़कर रोमन रस्म-उल-ख़त अपनाया जाए। मोहतरम मौलवी साहब का दावा है कि उर्दू रस्म-उल-ख़त लिपि के इतिहास में आख़िरी विकसित रूप है। यह रस्म-उल-ख़त रोमन रस्म-उल-ख़त से ज़्यादा विकसित और सभ्य है। और जो हज़रात हमें इसे छोड़कर रोमन अक्षर अपनाने का मशवरा देते हैं, वे मानो हमें तरक़्क़ी से निकालकर पतन की तरफ़ ले जाना चाहते हैं और तहज़ीब (सभ्यता) से पीछे हटाकर बर्बरता की तरफ़ ले जाने की प्रेरणा देते हैं।

    मौलवी साहब क़िबला ने शुरुआत में लेखन कला का संक्षिप्त इतिहास बयान किया है और इससे यह नतीजा निकाला है कि लिखाई के विकास में इंसान का रुझान संक्षेप की तरफ़ रहा है और उसने हमेशा यह कोशिश की है कि अपने ख्यालात, जज़्बात और तजुर्बात को लिखाई के ज़रिए दूसरों तक पहुँचाने के लिए जो चिह्न इस्तेमाल किए जाएँ, वे संक्षिप्त हों और जगह कम लें। उनके ख़याल में रोमन रस्म-उल-ख़त संक्षेप में लिखने की एक ख़ास मंज़िल पर पहुँच कर रुक गया। चुनांचे रोमन रस्म-उल-ख़त में (हाथ से लिखते वक़्त) अक्षरों को एक दूसरे से मिलाया तो जाता है, लेकिन इस तरह कि अक्षर अपनी पूरी शक्ल बरक़रार रखते हैं। हमने इस पर संतोष नहीं किया। हमने संक्षेप की प्रक्रिया को और बढ़ाया... हमने इन संक्षिप्त चिह्नों यानी अक्षरों को और संक्षिप्त किया और उनके जोड़ से लफ़्ज़ बनाए।

    मौलवी साहब की राय में रोमन रस्म-उल-ख़त निहायत दोषपूर्ण और नाकाफ़ी है क्योंकि,

    (1) रोमन वर्णमाला के अक्षरों से हमारी तमाम आवाज़ें अदा नहीं होतीं।

    (2) रोमन वर्णमाला बेक़ायदा (नियमहीन) है।

    (3) रोमन वर्णमाला में संयुक्त अक्षरों से कई बार एक आवाज़ का काम लिया जाता है, जो कि एक ख़राबी है।

    उर्दू रस्म-उल-ख़त के हक़ में मौलवी साहब ने संक्षेप में लिखने के अलावा यह दलील भी दी है कि इसके अलावा रस्म-उल-ख़त ज़बान का हिस्सा हो जाता है। वह सिर्फ़ ध्वन्यात्मक चिह्नों पर आधारित नहीं होता, बल्कि इससे वाक्यों की तरतीब और सजावट में भी मदद मिलती है। हमारा यह रस्म-उल-ख़त शुरुआत से, जब उर्दू ज़बान वजूद में आई, इसके साथ है।

    आख़िर में मौलाना ने कहा है कि उर्दू रस्म-उल-ख़त की जगह रोमन रस्म-उल-ख़त लागू करने से हमारा वही हश्र होगा जो तुर्कों का हुआ। हमारी आने वाली नस्लें अरबी, फ़ारसी और उर्दू के महान खज़ाने से महरूम हो जाएँगी (वंचित रह जाएँगी)।

    उर्दू रस्म-उल-ख़त में तब्दीली और सुधार का मसला नया नहीं है और ही रोमन रस्म-उल-ख़त के प्रस्ताव के पहले प्रस्तावक मियां अफ़ज़ल हुसैन हैं। हक़ीक़त यह है कि ये बातें इससे पहले भी कई बार उठ चुकी हैं। एक ज़माने में ख़ुद 'अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू' ने रस्म-उल-ख़त के सुधार की तरफ़ तवज्जो दी थी और कुछ प्रस्ताव भी मंज़ूर किए थे। उनमें से कुछ प्रस्ताव तो ऐसे थे कि हमारी संक्षेप में लिखने की कला, जिसे हम उर्दू की ख़ास पहचान समझते हैं, ख़तरे में पड़ जाती और अरबी के कुछ समान ध्वनि वाले अक्षरों का इस्तेमाल ख़त्म हो जाता। मगर इस पर मैं आगे चलकर तफ़सील से चर्चा करूँगा। इसी तरह रोमन रस्म-उल-ख़त के समर्थन में भी अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है।

    इंजील (बाइबल) और ईसाइयों की दूसरी मज़हबी किताबें मुद्दत से रोमन रस्म-उल-ख़त में छपती हैं। अंग्रेज़ों के ज़माने में फ़ौजियों को हिंदुस्तानी ज़बान रोमन रस्म-उल-ख़त में पढ़ाई जाती थी। 1879 ई. में लाहौर से एक मासिक पत्रिका रोमन उर्दू जर्नल निकला करती थी और उसके मुखपृष्ठ पर यह वाक्य लिखा होता था: पूर्वी भाषाओं की लिखाई रोमन अक्षरों में प्रचलित करने के लिए। (रिसाला 'अदबी दुनिया', अक्टूबर 1937) रोमन रस्म-उल-ख़त का समर्थन सिर्फ़ पश्चिम के समर्थकों की तरफ़ से नहीं हुआ है, बल्कि 'अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू' के सरकारी मुखपत्र रिसाला 'उर्दू' में भी रोमन रस्म-उल-ख़त के पक्ष में लिखा जा चुका है। चुनांचे रिसाला 'उर्दू' जनवरी 1944 ई. में मौलवी हयातुल्लाह अंसारी फ़िरंगी महली का एक संक्षिप्त लेख रोमन रस्म-उल-ख़त के बारे में छपा था। मौलवी हयातुल्लाह अंसारी साहब फ़रमाते हैं,

    रोमन रस्म-उल-ख़त से एक तरह का फ़ायदा ही पहुँचेगा।

    मगर उर्दू रस्म-उल-ख़त की अच्छाइयों और बुराइयों पर चर्चा करने से पहले ज़बान और रस्म-उल-ख़त के ताल्लुक़ को स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। इस सिलसिले में पहली बात यह है कि रस्म-उल-ख़त या लिखाई किसी ज़बान का अटूट हिस्सा नहीं है। लिखाई विचार व्यक्त करने की एक ऐसी निशानी है जिसे इंसान ने बोलने के लाखों साल बाद ईजाद किया और अपनाया। बीच के इस लंबे अंतराल में भी, जब लिखाई और रस्म-उल-ख़त का कोई वजूद था और वर्णमाला के अक्षर बने थे, ज़बानों में तब्दीलियाँ होती रहीं। लिखाई की कला की उम्र मुश्किल से छह हज़ार बरस है। इस कला के आविष्कारक सुमेर के लोग थे, जो आज से तीन हज़ार ईसा पूर्व दक्षिणी इराक़ में रहते थे। ये लोग सामी (Semitic) नस्ल से ताल्लुक़ नहीं रखते थे।

    दूसरी बात यह है कि आज भी दुनिया में... ख़ासकर एशिया और अफ़्रीका में... करोड़ों इंसान ऐसे मौजूद हैं जो लिखाई की कला से अनजान हैं, लेकिन अपने ख़यालात को ज़बान के ज़रिए दूसरों तक पहुँचा देते हैं। वे कोई रस्म-उल-ख़त नहीं जानते। रोमन, देवनागरी और अरबी। मगर वे अपनी ज़बानों में बातचीत करते हैं। गीत गाते हैं। शेर कहते हैं। इश्क़ करते हैं और इबादत के फ़र्ज़ भी अंजाम देते हैं। व्यक्ति ही नहीं, बहुत सी ऐसी क़ौमें भी मिलेंगी जिनको सिरे से ख़बर ही नहीं कि लिखना-पढ़ना है क्या। दुनिया में ऐसी कोई क़ौम, ऐसा कोई इंसान या गिरोह मौजूद नहीं जिसकी अपनी ज़बान हो। अलबत्ता ऐसे लोग अब भी बड़ी तादाद में मौजूद हैं जो लिखाई के चिह्नों से वाक़िफ़ नहीं। बच्चों को लीजिए, वे भी लिखाई के चिह्नों को पहचानने से पहले बोलना सीख चुके होते हैं।

    ज़बान और रस्म-उल-ख़त के विकास की मंज़िलें भी ज़रूरी नहीं कि एक ही हों। कभी ऐसा होता है कि ज़बान में तब्दीलियाँ हुईं मगर रस्म-उल-ख़त नहीं बदला। कभी रस्म-उल-ख़त में बदलाव पैदा हुए मगर ज़बान में तब्दीली हुई। मिसाल के तौर पर, अरबी ज़बान में इस्लाम के उदय से लेकर अठारहवीं सदी तक बहुत कम तब्दीली हुई है। लेकिन अरबी ज़बान के रस्म-उल-ख़त में बड़ी तब्दीलियाँ हुई हैं। अरबी रस्म-उल-ख़त शुरुआत में कूफ़ी था, जिसकी बुनियाद नबाती रस्म-उल-ख़त पर क़ायम थी। अरबों में यह रस्म-उल-ख़त इस्लाम के उदय से तीन सौ बरस बाद तक प्रचलित रहा। क़ुरआन शरीफ़ शुरू-शुरू में इसी रस्म-उल-ख़त में, जो इस्लाम से पहले अरब में प्रचलित था, लिखा गया। यरूशलम में ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक की बनवाई हुई मस्जिद में जो शिलालेख हैं, वे भी इसी प्राचीन रस्म-उल-ख़त में हैं। असवान के इलाक़े में जो सिक्के उस दौर के बरामद हुए हैं, वे भी इसी लिखाई में हैं। ख़त-ए-नस्ख़ दसवीं-ग्यारहवीं सदी ईसवी में और ख़त-ए-नस्तालीक़ तेरहवीं सदी में मुकम्मल हुए। ख़त-ए-कूफ़ी और ख़त-ए-नस्ख़ में इतना फ़र्क़ है कि आज अरबी का बड़े से बड़ा विद्वान भी क़ुरआन शरीफ़ को ख़त-ए-कूफ़ी में नहीं पढ़ सकता। इसके विपरीत उर्दू ज़बान को लीजिए कि इस ज़बान में पिछले पाँच सौ बरस में काफ़ी तब्दीलियाँ आई हैं। इतनी तब्दीलियाँ कि हमारे अच्छे-ख़ासे साहित्यकार भी दकन की प्राचीन मसनवियों और जायसी की 'पद्मावत' को शब्दकोश के बिना समझ नहीं सकते, हालाँकि इस बीच रस्म-उल-ख़त में कोई ख़ास तब्दीली नहीं हुई।

    एक बात और... पुरानी उर्दू सिर्फ़ यह कि हिंदी कहलाती थी बल्कि देवनागरी लिपि में भी लिखी जाती थी।

    ज़बान और लिपि के फ़र्क़ को साफ़ करने से हमारा मक़सद यह था कि उर्दू लिपि की बहस में ज़बान के मसलों को उलझाया जाए क्योंकि लिपि ज़बान का हिस्सा नहीं है। बहुत से लोग श्रद्धा के जोश में जज़्बात में बहकर मौजूदा लिपि का इस तरह समर्थन करते हैं मानो इसका ताल्लुक़ भी हमारे मज़हब से है। मानो क़ुरआन शरीफ़ और नबी की हदीसों की लिपि यही थी। यह बात ठीक नहीं। लिपि का ताल्लुक़ मज़हब से है, इस्लामी तहज़ीब से। लिपि हमारी आवाज़ों के ध्वनि-चिह्न (सौती अलामतें) हैं। इन चिह्नों को इंसान ने तय किया। इनमें समय-समय पर तब्दीलियां होती रही हैं और जब तक इंसान ज़बान से बोलता है और उसकी ज़बान में तब्दीलियां होती हैं, इन चिह्नों में भी सुधार और बढ़ोतरी होती रहेगी।

    भाषाविज्ञान के जानकारों ने दुनिया की ज़बानों को अलग-अलग परिवारों में बांटा है। एक परिवार इंडो-यूरोपियन ज़बानों का है। जिसमें अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, जर्मन, इतालवी, यूनानी, रूसी, फ़ारसी, पश्तो, पंजाबी, हिंदी, उर्दू, बंगाली, राजस्थानी, मराठी, उड़िया और गुजराती वग़ैरह शामिल हैं। इनके बोलने वालों की तादाद एक अरब है। दूसरा परिवार सामी-हामी ज़बानों का है जिसमें इब्रानी, अरबी, शामी, हब्शा की कुशीती ज़बानें, प्राचीन क़िब्ती और उत्तरी अफ़्रीका की दूसरी ज़बानें शामिल हैं। इनके बोलने वालों की तादाद आठ करोड़ के लगभग है। तीसरा परिवार यूराल-अल्ताई ज़बानों का है। इस परिवार का हिस्सा है फ़िनलैंड की फ़िनिश, इथियोपिया की लस्थोनी, हंगरी की गल्यार, तुर्की, मंगोल और मंचूरिया की ज़बान। इस परिवार की कुल तादाद सात करोड़ है। चौथा परिवार चीनी-तिब्बती ज़बानों का है। इस परिवार में चीनी, तिब्बती, बर्मी और सयामी ज़बानें शामिल हैं। इन ज़बानों के बोलने वालों की कुल तादाद साठ करोड़ है। पांचवां परिवार जापानी और कोरियन का है। छठा परिवार मलाया-पॉलीनेशिया का है। जिसमें मालागासी, मादुरी, मलय, इंडोनेशियाई, फ़िलिपीनो और प्रशांत महासागर के दूसरे द्वीपों की ज़बानें हैं। सातवां परिवार द्रविड़ ज़बानों का है जो दक्षिण भारत में बोली जाती हैं। इनके अलावा ज़बानों के एक-दो और परिवार भी हैं लेकिन वह बहुत छोटे हैं।

    उर्दू ज़बान इंडो-यूरोपियन परिवार से ताल्लुक़ रखती है। हालांकि अब तक यह पता नहीं चल सका है कि इंडो-यूरोपियन ज़बानों की मूल भाषा कौन सी ज़बान थी। लेकिन आधुनिक ज़बानों में जो ज़बान अपनी मूल भाषा के सबसे क़रीब समझी जाती है वह लिथुआनियाई ज़बान है जिसे बाल्टिक सागर के तट के बीस लाख निवासी बोलते हैं। अलबत्ता इस परिवार की सबसे पुरानी ज़बान संस्कृत है। इसके बाद यूनानी और इसके बाद लातीनी। संस्कृत ज़बान का पता दो हज़ार ईसा पूर्व तक लगाया जा चुका है। उर्दू, हिंदी, फ़ारसी, पंजाबी और बंगाली की वंशावली संस्कृत से ही मिलती है।

    यह इंडो-यूरोपियन ज़बानें बुनियादी तौर पर सामी ज़बानों से अलग हैं। दोनों परिवारों के व्याकरण (सर्फ़-ओ-नह्व) और शब्दकोश ही एक दूसरे से अलग नहीं हैं, उनके वाक्यों की बनावट के तरीक़े और शब्द-भंडार ही अलग नहीं बल्कि उनकी आवाज़ों के उच्चारण-स्थान (मख़ारिज) में भी फ़र्क़ पाया जाता है। सामी ज़बानों की कुछ आवाज़ें इंडो-यूरोपियन ज़बानों में सिरे से मौजूद ही नहीं। इसी तरह इंडो-यूरोपियन ज़बानों की कुछ आवाज़ें सामी क़ौम के लोग अदा नहीं कर सकते।

    ज़बानों के यह परिवार अलग-अलग द्वीपों में नहीं रहते और अलग-अलग संदूकों में बंद हैं कि उनका एक दूसरे से कोई ताल्लुक़ ही हो। अलग-अलग परिवारों के लोग एक दूसरे से मिलते हैं। आपस में लेन-देन करते हैं और इस तरह एक परिवार की ज़बान का असर दूसरे परिवार की ज़बान पर भी पड़ता है। वह एक दूसरे के अल्फ़ाज़ को अपनाते हैं। उनके मुहावरों का इस्तेमाल भी करते हैं। कभी-कभी उनकी आवाज़ों की नक़ल भी करते हैं। लेकिन इन परिवारों की अलग पहचान बदस्तूर क़ायम रहती है। उनके मिज़ाज पर इस मेल-जोल से कोई ख़ास असर नहीं पड़ता।

    लेखन के आविष्कारक सुमेर के लोग थे। लेकिन जो वर्णमाला (हुरूफ़-ए-अबजद) आजकल इंडो-यूरोपियन और सामी-हामी ज़बानों में प्रचलित है, उसके आविष्कारक फ़ोनीशिया (सीरिया का तट) के प्राचीन निवासी थे। फ़ोनीशिया के लोग इस लिखाई को दाएं से बाएं और फिर बाएं से दाएं तरफ़ लगातार लिखते थे। जिस तरह खेत में हल चलाते हैं। यूनानियों ने जब फ़ोनीशियाई लिपि को अपनाया तो शुरुआत में वह भी इसी तरह लिखते थे। लेकिन बाद में उन्होंने यह तरीक़ा छोड़ दिया और बाएं से दाएं तरफ़ लिखने लगे। अलबत्ता सामी क़ौम के लोगों ने दाएं से बाएं लिखने का तरीक़ा बरक़रार रखा। आज स्थिति यह है कि तमाम आर्य क़ौमें (उर्दू और फ़ारसी के अलावा) बाएं से दाएं की तरफ़ लिखती हैं। और सामी क़ौमें दाएं से बाएं तरफ़। फ़ारसी भी अरबों के कब्ज़े से पहले बाएं तरफ़ से लिखी जाती थी और उर्दू भी जो बक़ौल मौलवी अब्दुल हक़ साहब हिंदी का विकसित रूप है अपने शुरुआती दौर में देवनागरी लिपि में बाएं से दाएं तरफ़ लिखी जाती थी।

    फ़ोनीशिया की यह वर्णमाला ध्वनि के नियमों पर तैयार की गई थी। लेकिन वह इंसान के मुंह से निकलने वाली हर आवाज़ की नुमाइंदगी नहीं करती थी। वह सिर्फ़ उन्हीं आवाज़ों के चिह्न थे जो फ़ोनीशिया के निवासियों के मुंह से निकलती थीं और यह बात भी संदिग्ध है कि यह ध्वनि-चिह्न फ़ोनीशिया वालों की तमाम आवाज़ों को शामिल करते थे। दूसरी क़ौमों ने जब इस लिपि को अपनाया तो अपनी ध्वन्यात्मक ज़रूरतों के मुताबिक़ इसमें मुनासिब बढ़ोतरी और सुधार करती गईं। फ़ोनीशिया वालों ने यह लिपि अपनी कारोबारी ज़रूरतों के लिए ईजाद की थी। उन्हें इस बात का हरगिज़ एहसास था कि आगे चलकर दुनिया की सैकड़ों क़ौमें उनकी लिपि को अपना लेंगी। चुनांचे हर क़ौम ने इस लिपि में तब्दीलियां कीं। और जो आवाज़ें इस लिपि से अदा नहीं होती थीं उनके लिए नए-नए निशान तय किए। मसलन अरबों ने अपने एराब (मात्राओं) की ज़रूरतों के लिए पहले नुक़्तों (बिंदुओं) के चिह्न अपनाए। ज़बर के लिए हर्फ़ के ऊपर, ज़ेर के लिए नीचे और पेश के लिए किनारे पर एक नुक़्ता दिया जाता। हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वक़्त में और खुलफ़ा-ए-राशिदीन के ज़माने में यही तरीक़ा प्रचलित था। एराब की मौजूदा शक्लें दूसरी सदी हिजरी में ईजाद हुईं। इसी तरह अरबों ने अपनी ख़ास छह आवाज़ों के हुरूफ़ (से, ख़े, ज़ाल, ज़्वाद, ज़ोए और ग़ैन) नुक़्ते लगाकर हासिल किए।

    लिपि में सुधार और बदलाव का यह सिलसिला ख़त्म नहीं होता है। कोई लिपि चाहे वह रोमन हो या अरबी या देवनागरी, मुकम्मल नहीं है। यानी कोई लिपि ऐसी नहीं जो मुंह से निकली हुई आवाज़ की मुकम्मल नुमाइंदगी कर सके। यही नहीं बल्कि दुनिया की कोई लिपि ऐसी नहीं जो ख़ुद अपनी ज़बान की तमाम आवाज़ों को अदा करने में पूरी तरह सक्षम हो। इसीलिए कोई लिपि चाहे वह रोमन हो या अरबी या देवनागरी, यह दावा नहीं कर सकती कि वह अपनी मौजूदा शक्ल में दुनिया की तमाम ध्वन्यात्मक ज़रूरतों को पूरा करती है।

    जो लोग रोमन लिपि पर यह एतराज़ करते हैं कि रोमन वर्णमाला के अक्षरों से हमारी तमाम आवाज़ें अदा नहीं होतीं, वे इस ऐतिहासिक सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अगर रोमन वर्णमाला के अक्षर हमारी तमाम आवाज़ों को अदा नहीं कर सकते तो अरबी वर्णमाला के अक्षर भी हमारी तमाम आवाज़ों को अदा करने में असमर्थ हैं। इसी आधार पर ईरानियों को अपनी चार ख़ास आवाज़ों के लिए प, च, झ़ (ژ), और ईजाद करने पड़े और जब उर्दू ने फ़ारसी लिपि को अपनाया तो उर्दू को कुछ नए अक्षर बनाने पड़े, जो उन शुद्ध हिंदी आवाज़ों की नुमाइंदगी करते थे, जो अरबी वर्णमाला में मौजूद हैं और फ़ारसी में, मसलन ट, ड, ड़। लेकिन इस इज़ाफ़े के बाद भी हमारी वर्णमाला के अक्षर हमारी तमाम आवाज़ों को अदा नहीं करते, मसलन ख, घ, थ, और की आवाज़ें, क्योंकि इनके लिए हमें निर्धारित अक्षरों के बजाय संयुक्त अक्षरों (मुरक्कब हुरूफ़) से काम लेना पड़ता है। चुनांचे मोहतरम मौलवी साहब का यह एतराज़ कि रोमन वर्णमाला में संयुक्त अक्षरों से एक आवाज़ का काम लिया जाता है, उर्दू वर्णमाला पर भी अक्षरशः लागू होता है।

    जहाँ तक उर्दू लिपि का ताल्लुक़ है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि यह लिपि और इसकी वर्णमाला के अक्षर हमारी ध्वन्यात्मक ज़रूरतों को पूरा नहीं करते। हमने ऊपर उन चंद आवाज़ों की मिसाल दी थी जो हमारी अपनी आवाज़ें हैं, मगर जिनके लिए हमारी लिपि में कोई अक्षर मौजूद नहीं है और जिन्हें रोमन की तरह हम भी दो अक्षरों को मिलाकर बनाते हैं। इस लिपि में स्वर (हुरूफ़-ए-इल्लत) भी नहीं हैं। इसलिए हम उर्दू के हर लफ़्ज़ को अंदाज़े से पढ़ते हैं और अक्षरों को मिलाने का कोई क़ायदा नहीं बना सकते। मुमकिन है कि एराब (मात्राओं) का हवाला दिया जाए। मगर एराब वर्णमाला का हिस्सा तो नहीं हैं। और कितने लोग हैं जो हर लफ़्ज़ पर एराब लगाते हैं या एराब लगा सकते हैं। अगर उर्दू की हर किताब, हर अख़बार की लिखाई को एराब से सजाया जाए तो उसका क्या हाल होगा। एराब तो वे चिह्न हैं जिनसे अरब के लोग भी जहाँ तक मुमकिन हो परहेज़ करते हैं। अंग्रेज़ी ज़बान में दस, बीस, सौ, पचास लफ़्ज़ रोमन वर्णमाला की बेक़ायदगी के कारण अंदाज़े से पढ़े जाते हैं। हमारी लिपि में तक़रीबन हर लफ़्ज़ का यही हाल है।

    हमारी लिपि की तीसरी ख़राबी यह है कि हमारे नौ अक्षर अलग रहने वाले (मुन्फ़सिल) हैं और बाक़ी जुड़ने वाले (मुत्तसिल)। अलग रहने वाले अक्षर वे हैं जिनके आख़िर में कोई दूसरा अक्षर जोड़ा नहीं जा सकता। मसलन अ, द, ड, ज़, र, झ़, व, ء (हमज़ा)। नतीजा यह होता है कि इनमें से अगर कोई अक्षर किसी लफ़्ज़ के बीच में जाए तो लफ़्ज़ टूट जाता है। मसलन करीम, घुड़कना, खुरचना, धड़कना, भड़कना—ग़ौर से देखिए तो मालूम होगा कि अलग रहने वाले अक्षरों के कारण इन लफ़्ज़ों के हिस्से टूट गए हैं। बीच के हिस्से का एक अक्षर एक तरफ़ और दूसरा दूसरी तरफ़ लिखा गया और बीच में एक खाई क़ायम हो गई। इससे भी बुरी स्थिति उस जगह पैदा होती है जहाँ अलग रहने वाले अक्षर मिश्रित भी हों। मसलन ध, ढ, ठ, ढ़ लफ़्ज़ों के बीच में जाएँ, जैसे पढ़ना, कढ़ना, सधना (तफ़सील के लिए देखिए रिसाला उर्दू 1944)।

    चौथा मसला जुड़ने वाले अक्षरों का है। रोमन में चूँकि तमाम अक्षर जुड़ने वाले हैं, इसलिए अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, जर्मन, इतालवी और दूसरी रोमन ज़बानों में एक लफ़्ज़ के तमाम अक्षर मिलाकर लिखे जाते हैं। चाहे लफ़्ज़ के हिस्से दो हों या दस। वहाँ लिखाई की हद तक एक लफ़्ज़ एक इकाई (वहदत) होता है। लेकिन हमारी लिखाई में इस उसूल पर अमल करने से बड़ी दुश्वारियाँ होती हैं। मसलन कनकटा, बेहज़का संयुक्त मगर एक लफ़्ज़ हैं और इनके बीच में कोई अलग रहने वाला अक्षर भी नहीं आता। लेकिन हम इन लफ़्ज़ों को मिलाकर नहीं लिखते। क्योंकि मिलाकर लिखने से इनका पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि 1944 ई. में अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के केंद्रीय दफ़्तर की तरफ़ से यह प्रस्ताव पेश हुआ था कि संयुक्त शब्दों के घटकों (अज्ज़ा-ए-तरकीबी) को लाज़िमी तौर पर अलग-अलग लिखा जाए। और क्रिया के चिह्न (अलामत-ए-मस्दर) को भी मिलाकर लिखा जाए बल्कि अलग लिखा जाए। जैसे 'लिख ना'। मगर अफ़सोस है कि अंजुमन के इन प्रस्तावों को उर्दू जानने वाले वर्ग ने माना और ख़ुद अंजुमन इस पर अमल कर सकी।

    फिर समान ध्वनि वाले (हम-आवाज़) अरबी अक्षरों का मसला है। इनकी पाँच क़िस्में हैं:

    1... ऐन (ع)

    ते (ت)... तोए (ط)

    सीन (س)... से (ث), स्वाद (ص)

    ज़े (ز)... ज़ाल (ذ), ज़्वाद (ض), ज़ोए (ظ)

    हे (ح)... हे (ہ)

    अरबी में ये तेरह अलग-अलग आवाज़ें हैं जिनके उच्चारण स्थान (मख़ारिज) अलग हैं। लेकिन ये सामी (Semitic) क़ौमों की आवाज़ें हैं जिनको हम लोग और दूसरे ग़ैर-सामी लोग ठीक-ठीक अदा नहीं कर सकते और करते हैं।

    अरबी लिपि की ख़राबियाँ बयान करने से हमारा मक़सद यह था कि रोमन लिपि की बुराइयाँ गिनाते वक़्त हम अरबी लिपि की अनुपयुक्तता को भी नज़र में रखें और लिपि के सुधार की बहस को मज़हबी रंग दें, क्योंकि लिपि का ताल्लुक़ मज़हब से नहीं है।

    उर्दू लिपि के समर्थक इसके संक्षिप्त लेखन (इख़्तिसार-नवेसी) की बड़ी तारीफ़ करते हैं। चुनांचे मोहतरम मौलवी साहब ने भी अपने मज़मून में उर्दू लिपि की इस ख़ूबी पर बड़ा ज़ोर दिया है। उनकी राय में रोमन लिपि हमसे पिछड़ी हुई है। क्योंकि रोमन लिपि अपनाने वाले केवल अक्षरों को एक-दूसरे से मिलाने पर ही संतोष कर गए। बदनसीबों ने हिम्मत से काम लेकर अपने अक्षरों की शक्ल विकृत (मस्ख़) नहीं की। इसके विपरीत हमने संक्षेप की इस प्रक्रिया को और बढ़ाया। यहाँ तक कि अक्षरों के जोड़ से लफ़्ज़ बना लिए। इस संक्षिप्त लेखन का मक़सद यह था कि लिखने में वक़्त कम ख़र्च हो और जगह कम लगे।

    यह सही है कि ज़बान की तरह लिपि में (और दूसरे रचनात्मक कामों में भी) इंसान का स्वाभाविक रुझान आसानी की तरफ़ होता है। वह कम से कम मेहनत ख़र्च करके ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदेमंद नतीजे हासिल करने का इच्छुक रहता है। मगर इस संक्षेप की भी एक तारीख़ (इतिहास) है और इसके भी कुछ क़ायदे हैं और सीमाएँ भी। अरबी लिपि के शुरुआती दौर में हम देखते हैं कि अक्षर अलग-अलग होते थे। अलबत्ता एक ख़ास दौर में आकर उन्हें मिलाया गया और फिर एक ख़ास दौर में आकर इन अक्षरों के जोड़ से लफ़्ज़ बनाए गए। फिर भी नौ अक्षर ऐसे निकले जिनके टुकड़े नहीं किए जा सके। इसका नतीजा यह निकला कि लफ़्ज़ों के हिस्सों में ख़राबी पैदा हो गई।

    संक्षेप की प्रक्रिया कई तरीक़ों से मुमकिन है। संक्षेप का एक तरीक़ा तो वह था जो अक्षरों की शक्ल बिगाड़कर, उन्हें छोटा करके अपनाया गया। दूसरा तरीक़ा यह था कि अक्षरों की शक्ल बरक़रार रखी जाए और लफ़्ज़ों को संक्षिप्त किया जाए। उनके बुनियादी अक्षर रख लिए जाएँ और भरती के (अतिरिक्त) अक्षर छाँट दिए जाएँ। अंग्रेज़ी और दूसरी विकसित ज़बानों ने दूसरा तरीक़ा अपनाया। चुनांचे इन ज़बानों का रुझान पिछले छह-सात सौ साल से लफ़्ज़ों को संक्षिप्त करने की तरफ़ है। इससे दोहरा फ़ायदा होता है। इन्हें बोलने में भी कम मेहनत करनी पड़ती है और लिखने में भी। बोलने में भी इनका कम वक़्त ख़र्च होता है और लिखने में भी। इसके विपरीत, अक्षरों की शक्ल बदलकर और उनके जोड़ से लफ़्ज़ बनाकर हमें सिर्फ़ लिखने में आसानी हो जाती है, लेकिन बोलने में कोई आसानी नहीं होती। इसके अलावा, अक्षरों की शक्ल बदलने, उनके जोड़-जोड़ अलग करने के कारण नौसिखियों को उर्दू लिपि सीखने में जो दुश्वारियाँ होती हैं, उनका अंदाज़ा वही लोग बख़ूबी लगा सकते हैं जिनको बच्चों, अनपढ़ वयस्कों या विदेशियों को उर्दू पढ़ाने का तजुर्बा हुआ हो। मगर मुश्किल यह है कि इन मसलों पर ग़ौर करते वक़्त हम आम तौर से अपने बचपन को भूल जाते हैं।

    इसके अलावा, किसी लिपि के विकसित होने की एकमात्र कसौटी उसका संक्षेप-लेखन (शॉर्टहैंड) नहीं है, वरना हम शॉर्टहैंड को कब का अपनी लिपि बना चुके होते। दुनिया की किसी भाषा ने शॉर्टहैंड को अपनी लिपि नहीं बनाया है। इसकी एक वाजिब वजह है। भाषा की तरह लिपि भी एक सामाजिक क्रिया है। जिस तरह भाषा के लिए बोलने वाले के अलावा एक सुनने वाला भी ज़रूरी है जिस तक इंसान अपने विचार पहुँचाता है, उसी तरह लिखने वाले के लिए ज़रूरी है कि उसकी लिखावट को आसानी से समझने वाले भी मौजूद हों। संक्षेप-लेखन अगर इस हद तक बढ़ जाए कि वह शॉर्टहैंड या पहेली बन जाए, तो वह अपनी सामाजिक उपयोगिता खो देता है। वह माहिरों के एक छोटे-से समूह का शौक बन कर रह जाता है। पूरा समाज उससे फ़ायदा नहीं उठा सकता।

    हमारे पास ऐसा कोई ऐतिहासिक सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह नतीजा निकाला जा सके कि अरबों ने समय और जगह बचाने की ग़रज़ से संक्षेप-लेखन का प्रचलित तरीका अपनाया। अलबत्ता अंदाज़ा यह कहता है कि इस आविष्कार के कारण सौंदर्यपरक और सजावटी रहे होंगे, कि उपयोगितावादी। मुसलमानों में चित्रकारी और मूर्तिकला वर्जित थी। ऐसी हालत में कलाकार अपनी रचनात्मक क्षमताओं को उन्हीं कलाओं में इस्तेमाल कर सकते थे, जो वर्जित नहीं थीं। ऐसी ही एक कला सुलेख (ख़त्ताती) की थी। अब्बासी ख़लीफ़ा इल्म-दोस्त (विद्वानों के कद्रदान) थे। उनकी राजधानी ज्ञान और साहित्य का केंद्र बनी हुई थी। लेखन और संकलन के कामों को राज्य की सरपरस्ती हासिल थी। सुलेख की कला को इन्हीं ख़ुशगवार हालात में बढ़ावा मिला। बाद में मुसलमानों ने सुलेख की कला को इतनी तरक़्क़ी दी कि दुनिया इसकी कोई मिसाल पेश नहीं कर सकती। और सुलेख की कलात्मक ज़रूरतों की माँग थी कि अक्षरों को मिलाकर लिखा जाए, और उनके जोड़ों को भी अलग किया जा सके। इसके बिना कला की रूपगत (संरचनात्मक) एकता नामुमकिन थी।

    हमें उर्दू की मौजूदा लिपि पर उपयोगितावादी नज़रिए से ग़ौर करना चाहिए। अगर वह हमारी तमाम ध्वन्यात्मक ज़रूरतों (आवाज़ की ज़रूरतों) को पूरा करती है और भाषा की तरक़्क़ी की राह में रुकावट नहीं बनती, तो हमें ख़ामख़ाह कोई दूसरी लिपि नहीं अपनानी चाहिए। रोमन लिपि के हक़ में यह कोई दलील नहीं है कि यूरोप में यही लिपि प्रचलित है।

    जापान में तो यह लिपि प्रचलित नहीं है, फिर जापानियों ने अपनी पिछड़ी हुई लिपि के बावजूद कैसे तरक़्क़ी की? मेरी छोटी-सी राय यह है कि उर्दू लिपि मौजूदा शक्ल में हमारी तमाम आवाज़ों को अदा करने में असमर्थ है। अगर आप जायसी की 'पद्मावत' या पुराने दकनी शायरों की मसनवियाँ या कबीर के दोहे या अमीर ख़ुसरो की पहेलियाँ, दो-सुख़ने और मुकरनियाँ उर्दू लिपि में पढ़ें, तो आपको इस लिपि की ख़ामियों का अंदाज़ा हो जाएगा।

    अब सवाल यह है कि सुधार का स्वरूप क्या हो। पहली सूरत तो यह है कि वर्णमाला के वे अक्षर जिन्हें हम ज़बान से अदा नहीं करते, निकाल दिए जाएँ और उनकी जगह नए अक्षरों को जोड़ा जाए जो उन आवाज़ों की नुमाइंदगी करें जिनके लिए हमारे पास अलग अक्षर नहीं हैं। मगर जुड़े हुए और अलग अक्षरों (हुरूफ़-ए-मुत्तसिल और मुनफ़सिल) का झगड़ा फिर भी बाक़ी रहेगा और स्वर वर्णों (हर्फ़-ए-इल्लत) की कमी फिर भी महसूस होगी।

    दूसरी सूरत यह है कि रोमन लिपि अपनाई जाए। बशर्ते कि उसमें अपनी ध्वन्यात्मक ज़रूरतों के मुताबिक़ उचित बदलाव किए जाएँ।

    तीसरी सूरत यह है कि रोमन (देवनागरी????) लिपि को दोबारा अपना लिया जाए क्योंकि हमारी पुरानी लिपि यही है और हमारी ध्वन्यात्मक ज़रूरतों को दूसरी लिपियों के मुक़ाबले में बेहतर तरीक़े से पूरा करती है। मगर इस ज़माने में हर मसला, चाहे वह भाषा का हो या लिपि का, सियासी रंग ले चुका है। इसलिए देवनागरी लिपि का प्रस्ताव पेश करने से ख़ामख़ाह ग़लतफ़हमियाँ पैदा होंगी और लिपि की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ जाएगी। लेकिन विशुद्ध भाषाई और ध्वन्यात्मक नज़रिए से देखा जाए, तो हमारी भाषा की लिपि देवनागरी ही होनी चाहिए।

    पिछले बीस-पच्चीस साल से उर्दू लिपि में सुधार की कोशिश हो रही है। लेख लिखे जाते हैं। कमेटियाँ बनती हैं। प्रस्ताव पास किए जाते हैं। मगर नतीजा कुछ नहीं निकलता। अलबत्ता इससे यह ज़रूर पता चलता है कि लोगों में इस लिपि की ख़राबियों का गहरा अहसास है और वे चाहते हैं कि इसमें सुधार किया जाए। यह अहसास हमारी सामाजिक ज़रूरतों और वक़्त के तक़ाज़ों ने हममें पैदा किया है। मगर लिपि के सुधार का काम इतना बड़ा है, इसकी राह में इतनी मुश्किलें और दुश्वारियाँ हैं कि प्राइवेट संस्थाएँ इस काम को राज्य की सरपरस्ती और हुकूमत के ज़िम्मेदारों के सहयोग के बिना अंजाम नहीं दे सकतीं। हमारा सामाजिक जीवन दूसरे मुल्कों की तरह व्यवस्थित नहीं है कि प्राइवेट संस्थाओं के फ़ैसले पूरे देश में लागू हो जाएँ, और हममें इतना अनुशासन है कि हम सिर्फ़ भाषा-वैज्ञानिकों की बात मानकर उस पर अमल करना शुरू कर दें। इस मसले पर आज़ादी से बहस ज़रूर होनी चाहिए ताकि इसके तमाम पहलू सामने जाएँ और आम राय नए सुधारों को क़बूल करने के लिए तैयार हो सके। रह गई हुकूमत, तो उसे इन क़ौमी मसलों पर संजीदगी और आज़ादी से ग़ौर करने की फ़ुर्सत कहाँ। आठ साल में तो अभी वह यह फ़ैसला भी नहीं कर सकी है कि देश की सरकारी ज़बान क्या हो। अभी तो अंग्रेज़ी का ही परचम लहरा रहा है। इस ग़ैर-मुल्की परचम से छुटकारा मिले, तो लिपि की तरफ़ ध्यान दिया जाए।

    Read original article:
    स्रोत :

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    Click on any word to get its meaning
    बोलिए