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तश्बीह

दत्तात्रिया कैफ़ी


अनुवाद : Rekhta Editor

MORE BYदत्तात्रिया कैफ़ी

    अदबियात (साहित्य) का मूल 'अदब' है। अदब अरबी का एक शब्द है जिसके अर्थ हैं हर चीज़ की सीमा और अंदाज़े का ध्यान रखना। भाषा और रचना विज्ञान के विद्वान अदब या आदाब के अंतर्गत इन विद्याओं (इल्मों) को शामिल करते हैं:

     

    (1) इल्म-ए-लुग़त, (2) इल्म-ए-सर्फ़, (3) इल्म-ए-इश्तिकाक, (4) इल्म-ए-नह्व, (5) इल्म-ए-मआनी, (6) इल्म-ए-अरूज़, (7) इल्म-ए-क़ाफ़िया, (8) इल्म-ए-रस्म-उल-ख़त, (9) इल्म-ए-फ़र्ज़-उश-शेर, (10) इल्म-ए-इंशा, (11) इल्म-ए-तवारीख़ या इल्म-ए-मुहाज़रात और इल्म-ए-बयान।

     

    आपने देखा कि अदब कितना विस्तृत और गहरा समंदर है। साहित्य या लिटरेचर को आमतौर पर साइंस और फ़लसफ़े (दर्शन) के मुक़ाबले में हिक़ारत की नज़र (हेय दृष्टि) से देखा जाता है, लेकिन असल में यह अपने आप में एक साइंस है और अदीब (साहित्यकार) एक फ़िलॉसफ़र का दर्जा रखता है। आजकल यह देखने में आया है कि जो व्यक्ति मामूली नज़्म या नस्र (गद्य) लिखने लगे, उसे लिटरेरी आदमी कह देते हैं और जो दूसरों के लिखे हुए पर उचित-अनुचित ऐतराज़ और नुक्ताचीनी करे, उसे नक़्क़ाद (आलोचक) और अदीब कहने लगते हैं, भले ही ख़ुद उसके लेख और रचना में उस आलोच्य रचना से ज़्यादा ग़लतियाँ और ख़ामियाँ मौजूद हों। मैं इस चर्चा में न अदब पर बातचीत करूँगा, न इन बारह इल्मों में से किसी पर, बल्कि सिर्फ़ आदाब की एक क़िस्म यानी इल्म-ए-बयान के एक अंग यानी तश्बीह (उपमा) और उसके लवाज़मात (ज़रूरी बातों) के बारे में कुछ मामूली बिंदुओं पर कुछ कहूँगा। जिनका जानना हर लिखने-पढ़ने वाले, ख़ासकर शायरों के लिए बहुत ज़रूरी और लाज़िमी है।

     

    सबसे पहले यह जानना चाहिए कि इल्म-ए-बयान किसे कहते हैं। इल्म-ए-बयान वह इल्म है जिसके ज़रिए से एक मतलब को अलग-अलग इबारतों (वाक्यों) में अदा कर सकें, मगर सब इबारतें अर्थ प्रकट करने में एक जैसी न हों, बल्कि उनमें कोई साफ़ और स्पष्ट हो और किसी में उसकी तुलना में कुछ हद तक बात छुपी हुई हो, किसी में बहुत ज़्यादा छुपी हो।

     

    कहा गया है कि इंसान स्वभाव से मुहाकात (अनुकरण या नक़ल) की तरफ़ ज़्यादा माइल (आकर्षित) होता है और उसका दिल मुहाकात से बहुत आनंदित होता है। एक मनमोहक प्राकृतिक दृश्य या एक आलीशान ख़ूबसूरत इमारत या एक बेहद हसीन व्यक्ति को देखकर उसकी दिलकशी या ख़ूबसूरती या हुस्न को हम अपने ज़ेहन में पूरी तरह से ग्रहण नहीं कर सकते और अनुपात की सीमाओं और सौंदर्य के बिंदुओं की समझ और मानसिक स्वीकारोक्ति में हमारा दिमाग़ पूरी तरह से हावी नहीं हो सकता। मगर उसी दृश्य या इमारत या व्यक्ति की तस्वीर जब सामने आ जाती है, तो उसकी तमाम ख़ूबियाँ हमें हर पहलू से महसूस होती हैं और दिमाग़ को उसका पूरा इल्म होकर दिल को ख़ुशी और आनंद मिलता है। शायद इसी ढर्रे पर बयान में तश्बीह (उपमा) और इस्तेआरा (रूपक) की शुरुआत हुई। लेकिन जिस तरह वह व्यक्ति जो सिर्फ़ नक़्शे और प्लान ही बना और समझ सकता हो, मगर एक इमारत की ख़ूबियाँ और ख़ामियाँ उसकी नज़र में न समा सकती हों, इंजीनियर नहीं कहला सकता। उसी तरह वह गद्यकार या शायर जो सिर्फ़ तश्बीह और इस्तेआरा के सहारे ही अपने कलाम को सजीव कर सकता हो और हक़ीक़त बयानी और तहक़ीक़ (शोध) में असमर्थ हो, उसे गद्य और पद्य की रचना पर हावी (पूर्ण ज्ञाता) नहीं कहा जा सकता।

     

    तश्बीह और इस्तेआरा के उचित-अनुचित इस्तेमाल पर मौलाना आज़ाद मरहूम ने 'आब-ए-हयात' में जो कुछ लिखा है, उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ। हिंदी और फ़ारसी, इन दोनों ज़बानों का मुबालग़ा (अतिशयोक्ति), इस्तेआरा और तश्बीह दो-आतिशा (दोगुना तेज़) क्या, चंद-आतिशा (कई गुना तेज़) होकर हमारी उर्दू की कच्ची घड़िया में आ बसे। कहिए बस ही गए और हमारे हवास (इंद्रियों) पर ऐसे हावी हो गए कि अब उनके सिवा और कुछ नज़रों में जँचता ही नहीं। मौलाना के ये अल्फ़ाज़ हमारे रचनाकारों और शायरों को ग़ौर से सुनने और याद रखने चाहिए:

     

    यह अफ़सोस दिल से नहीं भूलता कि उन्होंने एक कुदरती फूल को जो अपनी ख़ुशबू से महकता और रंग से लहकता था, मुफ़्त हाथ से फेंक दिया। वह क्या है? कलाम का असर और असलियत का इज़हार। हमारे नाज़ुक ख़याल और बारीक़-बीन (गहराई से देखने वाले) लोग इस्तेआरों और तश्बीहों की रंगीनी और शब्दों की मुनासिबत के शौक़ में ख़याल से ख़याल पैदा करने लगे और असली मतलब के अदा करने में लापरवाह हो गए। इसका अंजाम यह हुआ कि ज़बान का ढंग बदल गया और नौबत यह हुई कि अगर कोशिश करें तो फ़ारसी की तरह 'पंज रुक़्क़ा' और 'मीना बाज़ार' और 'फ़साना-ए-अजायब' लिख सकते हैं। लेकिन एक मुल्की मामले या तारीखी इंक़लाब को इस तरह नहीं बयान कर सकते जिससे मालूम होता जाए कि... इत्यादि।

     

    लिखने वालों को एहतियात बरतनी चाहिए कि तश्बीहें और इस्तेआरे कलाम में सिर्फ़ उसी क़दर आएँ जिस क़दर खाने में नमक और मसाला, न कि मसाले और नमक में खाना। यह ऐतराज़ बल्कि चेतावनी किसी एक व्यक्ति से वाबस्ता (जुड़ी) नहीं है। आप और मैं सब इस भूल-भुलैया में चक्कर काट रहे हैं।

     

    इन सबके बावजूद, जब कलाम के मज़े की बुनियाद मुहाकात (अनुकरण) पर ठहरी, तो इसके मुख्य अंगों की असलियत मालूम करना हमारा फ़र्ज़ है। जानना चाहिए कि मुहाकात या तो एक चीज़ को दूसरी चीज़ से तश्बीह देना है या किसी चीज़ को तब्दील करके दूसरी चीज़ की सूरत में ज़ाहिर करना, और यह मजाज़-ए-मुरसल, किनाया और इस्तेआरा में बँटा हुआ है। इस मज़मून में हमारा मौज़ू (विषय) महज़ तश्बीह होगा।

     

    तश्बीह के मायने हैं यह जताना कि एक चीज़ एक अर्थ में बिना किसी अलगाव और बिना इस्तेआरा के दूसरी चीज़ के समान है। मसलन, उसका क़द सर्व (सनोबर के पेड़) जैसा है, यानी सीधेपन में दोनों बराबर हैं। इन दो चीज़ों में पहली चीज़ को 'मुशब्बा' कहते हैं, यानी जिसकी उपमा दी गई, और दूसरी को 'मुशब्बा बिही', यानी जिसके साथ उपमा दी गई। और जो अर्थ दोनों में साझा हैं, उसको 'वजह-ए-शिबह' यानी समान होने की वजह कहते हैं। और जो शब्द इस समानता को ज़ाहिर करता है, उसे 'हर्फ़-ए-तश्बीह' कहते हैं। ज़िक्र की गई मिसाल में, यानी उसका क़द सर्व जैसा है, क़द मुशब्बा है, सर्व मुशब्बा बिही, सीधापन जो सर्व और क़द दोनों में पाया जाता है वह वजह-ए-शिबह या वजह-ए-तश्बीह है, और 'जैसा' हर्फ़-ए-तश्बीह है। हर्फ़-ए-तश्बीह को 'अदात' भी कहते हैं और वे ये हैं: मानिंद, मिस्ल, जैसा, का, सा, गोया, वग़ैरह। याद रहे कि बहुत से हुरूफ़-ए-तश्बीह अब पूरी तरह से अप्रचलित (मतरूक) हो चुके हैं, मसलन ज्यों, कहे, तो वग़ैरह। कुछ स्थानीय विशेषता रखते हैं जैसे 'का', 'ऐसा' लखनऊ से मख़सूस (विशेष) हैं। ये चार चीज़ें यानी मुशब्बा, मुशब्बा बिही, वजह-ए-शिबह और हर्फ़-ए-तश्बीह, तश्बीह के चार अंग (अरकान-ए-चहार-गाना) कहलाते हैं। इनमें से पहले दो को 'अतराफ़-ए-तश्बीह' (तश्बीह के पक्ष) भी कहते हैं।

     

    अतराफ़-ए-तश्बीह

    अतराफ़-ए-तश्बीह या हिस्सी (इंद्रियगोचर) होंगे या अक़्ली (बौद्धिक)। हिस्सी से मुराद है महसूस होने वाला और अक़्ली से मुराद है वह चीज़ जिसकी समझ अक़्ल के ज़रिए से हो सके, यानी जो महसूस न हो। मीर हसन मरहूम का यह शेर दोनों क़िस्म की मिसालें रखता है:

     

    बदन आईना सा दमकता हुआ

    निगह आफ़त ओ चश्म ऐन बला

     

    पहले मिसरे में बदन और आईना दोनों महसूस होने वाले (हिस्सी) हैं। वजह-ए-शिबह इनमें चमक-दमक है। दूसरे मिसरे में निगह (नज़र) और आफ़त महसूस होने वाले नहीं बल्कि अक़्ली हैं, यानी अक़्ल के ज़रिए से ही इन्हें समझा जा सकता है।

     

    अतराफ़-ए-तश्बीह यानी मुशब्बा और मुशब्बा बिही कभी दोनों हिस्सी होते हैं और कभी दोनों अक़्ली, कभी दोनों अलग-अलग यानी एक हिस्सी और एक अक़्ली। चूँकि अतराफ़ के बयान में और उससे ज़्यादा वजह-ए-शिबह के अंतर्गत हवास (इंद्रियों) और ज़ेहनी ताक़तों (मानसिक शक्तियों) का ज़िक्र अक्सर आएगा, इसलिए ज़रूरी है कि फ़लसफ़े के इस मसले पर व्याख्या के तौर पर कुछ कहा जाए। इंद्रियों और मानसिक शक्तियों का मामला 'इल्म-उल-हिस वल-क़ुवा' (इंद्रिय और शक्ति विज्ञान) से संबंधित है। यहाँ हमारी बात का रुख़ सिर्फ़ पाँच बाहरी इंद्रियों (हवास-ए-ख़मसा ज़ाहिरी) और पाँच भीतरी इंद्रियों (हवास-ए-ख़मसा बातिनी) की तरफ़ है। पाँच इंद्रियाँ जो ज़ाहिर की हैं, उनका विवरण नीचे दिया गया है:

     

    (1) बासिरा, देखने की ताक़त (2) सामिआ, सुनने की ताक़त

    (3) शाम्मा, सूँघने की ताक़त (4) ज़ाइक़ा, चखने की ताक़त

    (5) हिस-उल-लम्स या लामिसा, छूने की ताक़त। यह हमारे तमाम अंगों में पाई जाती है। इसी से गर्मी, सर्दी, सख़्ती, नरमी का एहसास होता है।

     

    पाँच भीतरी इंद्रियों (हवास-ए-बातिनी) का संक्षिप्त विवरण यह है:

     

    (1) हिस-ए-मुश्तरक (सामान्य बोध) का काम यह है कि जो चीज़ बाहरी हवास (इंद्रियों) से महसूस होती है, यह बोध उसे ले लेता है।

     

    (2) ख़याल इस हिस-ए-मुश्तरक का ख़ज़ाना है। जो सूरतें (आकार) हिस-ए-मुश्तरक ग्रहण करती है, यह उन्हें ख़याल में महफ़ूज़ रखता है।

     

    (3) मुतख़य्यिला या मुतफ़क्किरा (कल्पना या विचार शक्ति) का मुख्य काम यह है कि जो सूरतें ख़याल में जमा हैं, कभी उन्हें एक-दूसरे से मिलाती (मुरक्कब करती) है और कभी एक-दूसरे से अलग करती है। और ऐसे ही इन सूरतों में जो मानी (अर्थ) हैं, उन्हें भी कभी मिलाती है और कभी अलग करती है। यानी मिसाल के तौर पर भेड़िये की दुश्मनी भेड़ से या बाप की मुहब्बत बेटे से। इन मानियों को मिलाए या अलग करे और कभी इन सूरतों और मानियों में तसर्रुफ़ (बदलाव) भी करती है।

     

    (4) वाहिमा या वहम का काम यह है कि ख़ास सूरतों में जो ख़ास मानी हैं, उन्हें दरयाफ़्त करे (खोजे)।

     

    (5) हाफ़िज़ा और मुतसर्रिफ़ा (स्मृति और संचालन शक्ति) वहम का ख़ज़ाना है, जैसे हिस-ए-मुश्तरक का ख़ज़ाना ख़याल है।

     

    ये परिभाषाएं बेशक मुकम्मल और सटीक हैं, लेकिन इन्हें आसानी से समझने के लिए इनमें एक क़ुव्वत (शक्ति) यानी मुतख़य्यिला और मुतफ़क्किरा के बारे में इतना और कहना है कि इसकी ख़ासियत यह है कि वह सूरतों और मानियों को मिलाने और अलग करने और उनमें अपने बदलाव के अलावा कई ऐसी चीज़ें ईजाद करती है जो असल में कुछ भी नहीं होतीं। और वह ईजाद या तो क़ुव्वत-ए-वहमिया (वहम की शक्ति) के ज़रिए होती है जिसे मुतख़य्यिला कहते हैं, या क़ुव्वत-ए-अक़्लिया (बुद्धि की शक्ति) के ज़रिए होती है जिसे मुतफ़क्किरा कहते हैं। इसलिए जिस ग़ैर-मौजूद चीज़ को क़ुव्वत-ए-मुतख़य्यिला ऐसी चीज़ों से मिलाए, जो बाहरी हवास (इंद्रियों) से पहचानी जा सकें, वह हिस्सियात (ऐंद्रिक चीज़ों) में शामिल है। मिसाल के तौर पर ग़ालिब के इस शेर में:

     

    बंटते हैं सोने रुपये के छल्ले हुज़ूर में

    है जिनके आगे सीम-ओ-ज़र मेहर-ओ-माह मांद

     

    यूं समझिए कि बीच से ख़ाली किए हुए

    लाखों ही आफ़ताब हैं और बेशुमार चांद

     

    पहला शेर सिर्फ़ सुनने वाले की सहूलियत के लिए नक़्ल किया गया। असल मतलब दूसरे शेर से है। यह एक क़ितआ में से लिया गया है जो मिर्ज़ा ग़ालिब ने सफ़र महीने के आख़िरी बुधवार के मौक़े पर बादशाह के हुज़ूर में पेश किया था। यहां चांदी और सोने के छल्लों को रंगत, चमक, रोशनी और दूर तक चमकने के एतबार से चांद और सूरज के साथ तश्बीह (उपमा) दी गई है और क़ुव्वत-ए-मुतख़य्यिला ने उनको यानी चांद और सूरज को, बीच में से ख़ाली किया हुआ ख़याल कर लिया और अपने इस बदलाव से तश्बीह को दुरुस्त कर लिया। लेकिन इस सूरत के पेट-ख़ाली सूरज-चांद हक़ीक़त में देखे नहीं जाते। लिहाज़ा यह तश्बीह हिस्सी (ऐंद्रिक) ठहरी क्योंकि छल्ले और चांद-सूरज महसूस किए जा सकते हैं।

     

    जिस चीज़ को क़ुव्वत-ए-मुतफ़क्किरा (विचार शक्ति) अपने पास से ईजाद करे, वह अक़्लियात (बौद्धिक चीज़ों) में दाख़िल है। ज़ौक़ का यह शेर इसकी उम्दा मिसाल है:

     

    नहूसत भी सआदत हो गई सौदा में ज़ुल्फ़ों के

    गलीम-ए-तीरा-बख़्ती सर पे हम ज़िल्ल-ए-हुमा समझे

     

    अब देखिए, हक़ीक़त में 'हुमा' कोई चीज़ नहीं। सिर्फ़ एक फ़र्ज़ी नाम है जिसे इस्तलाह (पारिभाषिक शब्दावली) में 'मफ़रूज़-ए-ज़ेहनी' (मानसिक कल्पना) कहते हैं। फिर इस फ़र्ज़ी नाम के साथ कुछ ख़ास सिफ़तें (विशेषताएं) जोड़ दी गईं। यहां इसकी एक सिफ़त से मतलब है, यानी इसका बहुत मुबारक माना जाना। लेकिन चूंकि इंसान ने सुन रखा है कि वह एक मुबारक चीज़ है, इसलिए तीरा-बख़्ती (बदक़िस्मती) को इससे तश्बीह दी। यानी कह दिया कि गलीम-ए-तीरा-बख़्ती (बदक़िस्मती की चादर) को जिससे नहूसत मुराद है, हम हुमा का साया ख़याल करते हैं। यानी यह तीरा-बख़्ती हुमा के साये से मुशाबेह (मिलती-जुलती) है। पस तीरा-बख़्ती 'मुशब्बह' (जिसकी उपमा दी जाए) है और ज़िल्ल-ए-हुमा (हुमा का साया) 'मुशब्बह बिह' (जिससे उपमा दी जाए), यानी हुमा का साया जिस्म के लिहाज़ से ग़ैर-मौजूद और नाम के लिहाज़ से मालूम है। जैसे कि ग़ोल-ए-बयाबानी (रेगिस्तानी भूत)। क़ुव्वत-ए-मुतफ़क्किरा ने इसको मौजूद मान लिया, और फिर इसके लिए साया साबित किया। ये दोनों यानी मुशब्बह और मुशब्बह बिह अक़्ली (बौद्धिक) हैं।

     

    साफ़ ज़ाहिर है कि तीरा-बख़्ती माक़ूल (बुद्धिगम्य) है, महसूस (ऐंद्रिक) नहीं, और दूसरे यानी ज़िल्ल-ए-हुमा के हाल पर अभी बहस की गई कि यह एक काल्पनिक बात है। एक और बात यह बतानी है कि 'गलीम-ए-तीरा-बख़्ती' में इज़ाफ़त-ए-तश्बीही है यानी तीरा-बख़्ती जो गलीम (चादर) की तरह है, इस ज़िम्नी (अंतर्निहित) तश्बीह में तरफ़ैन यानी मुशब्बह और मुशब्बह बिह अलग-अलग हैं, यानी गलीम हिस्सी है और तीरा-बख़्ती अक़्ली। इसी तरह सआदत (सौभाग्य) और नहूसत (दुर्भाग्य) में भी तश्बीह है यानी हमारी नहूसत सआदत की तरह है क्योंकि इसी नहूसत को पहले गलीम के साथ मुशाबेह किया (मिलाया), फिर इस गलीम को जो सियाह (काली) तसव्वुर की गई है, ज़िल्ल-ए-हुमा से मुशाबेह किया और यह मालूम है कि ज़िल्ल यानी साया हर चीज़ का सियाह ही होता है। लेकिन चूंकि यह ज़िल्ल-ए-हुमा है और वह मुबारक चीज़ मानी जाती है, लिहाज़ा वह नहूसत सआदत में बदल गई। और ये सआदत और नहूसत दोनों अक़्ली हैं।

     

    आपने देखा कि एक शेर की तश्बीह के अरकान (अंग) बयान करने में कितना वक़्त लगा और फ़लसफ़े (दर्शन) के कितने मसले सामने आए। अदीबों (साहित्यकारों) ने जिस शान से इन अदबी मामलों पर फ़लसफ़ियाना (दार्शनिक) नज़र डाली है और साइंटिफ़िक (वैज्ञानिक) तरीक़े से छानबीन करके बहस की है, वह अवाम के लिए हैरतअंगेज़ साबित होगी। चुनांचे तश्बीह के इन्हीं दोनों पक्षों (अतराफ़-ए-तश्बीह) की हिस्सी या अक़्ली हैसियत के बारे में फ़रमाते हैं कि बहरहाल ख़याली चीज़ों को इल्म-ए-बलाग़त (अलंकार शास्त्र) वालों ने हिस्सी में दाख़िल किया है। इस वजह से कि हिस्सी से मुराद वह चीज़ है जो ख़ुद हवास (इंद्रियों) से जानी जा सके या उसका माद्दा (पदार्थ)। पस ख़याली चीज़ का माद्दा हवास से जाना जाता है। जैसा कि मालूम हुआ, और वहमी को अक़्ली में दाख़िल किया है, इसलिए नहीं कि वह भी माक़ूलात (बौद्धिक चीज़ों) की तरह हवास से नहीं जानी जाती, बल्कि वह ऐसी है कि अगर पाई जाए तो ज़रूर हवास से जानी जाएगी और इसी बात की वजह से अक़्ली और वहमी में फ़र्क़ होता है, वरना दोनों एक हो जाएं।

     

    एक दिलचस्प नुक्ता 'हदाएक़-उल-बलाग़त' के लेखक ने दस सिर के आदमी का तसव्वुर ग़ोल (भूत) के तसव्वुर के साथ बयान किया है। इसके बाद ख़ुद यह एतराज़ (आपत्ति) गढ़ा कि पहली नज़र में इन दोनों क़िस्मों यानी वहमी और ख़याली में फ़र्क़ नहीं मालूम होता, इस वास्ते कि दस सिर के आदमी का तसव्वुर इल्म या क़ुव्वत की तरह है कि इन दोनों क़िस्मों के हिस्से महसूस की जाने वाली चीज़ों से हैं। इसलिए बाद के आलिमों ने इसमें इख़्तिलाफ़ (मतभेद) किया है। चूंकि यह बहस बहुत बारीक और आलिमाना (विद्वतापूर्ण) है, इसलिए इससे बचा जा रहा है। अतराफ़-ए-तश्बीह (तश्बीह के पक्षों) की दीगर तश्बीही तफ़्सीलात और बारीक नुक़्तों को नज़रअंदाज़ करके अब मैं 'वजह-ए-शिबह' का ज़िक्र करता हूं।

     

    वजह-ए-शिबह या वजह-ए-मुशब्बह

    वजह-ए-मुशब्बह की मुकम्मल और सटीक तारीफ़ (परिभाषा) यूं बयान की जा सकती है कि वजह-ए-शिबह वह मानी है जो मुशब्बह और मुशब्बह बिह से बहुत ख़ासियत रखता हो और इन दोनों का इसमें शरीक होना मक़सद हो। वह सिफ़त (विशेषता) जिसमें इन दोनों यानी मुशब्बह और मुशब्बह बिह की साझेदारी हो या अलगाव हो, तीन तरह की होती है। पहली, सिफ़त-ए-हक़ीक़ी यानी ऐसी शक्ल जो ज़ात (मूल अस्तित्व) में मौजूद हो। दूसरी, सिफ़त-ए-इज़ाफ़ी जो ज़ात में पहली की तरह न हो, बल्कि दो चीज़ों से मुताल्लिक़ (संबंधित) हो। तीसरी, सिफ़त-ए-एतबारी कि उसका मफ़हूम (अर्थ) हक़ीक़त में साबित न हो बल्कि महज़ अक़्ल ने उसे मान लिया हो।

     

    सिफ़त-ए-हक़ीक़ी की दो क़िस्में हैं। एक हिस्सी और दूसरी अक़्ली। हक़ीक़त के मानी इल्म-ए-मंतिक़ (तर्कशास्त्र) में चाहे कुछ भी हों, लेकिन यहां मुराद एक ऐसी कैफ़ियत (स्थिति) से है कि जिस्म उसके सबब अपने माहौल की तरफ़ माइल (आकर्षित) होता है, जैसे आग और हरारत यानी गर्मी। सिफ़त-ए-अक़्ली नफ़्सियाती कैफ़ियतों पर हावी है, यानी वे कैफ़ियतें जो जानदार की ज़ात से मख़्सूस (विशेष) हों, मसलन ज़का यानी समझ की तेज़ी और इल्म, मारफ़त (ज्ञान), करम (कृपा), हिल्म (धैर्य), ग़ज़ब (क्रोध) और शुजाअत (बहादुरी) वग़ैरह जो अक़्ल से जानी जाएं। सिफ़त-ए-इज़ाफ़ी वह सिफ़त है जो ज़ात में मौजूद न हो बल्कि दो चीज़ों से मुताल्लिक़ हो, मसलन कोई शख़्स दलील या राय को आफ़ताब (सूरज) से तश्बीह दे, इस नज़र से कि दोनों में पर्दा हटाने की सिफ़त मौजूद है और यह सिफ़त हुज्जत (तर्क) और आफ़ताब की ज़ात में मौजूद नहीं बल्कि उनसे मुताल्लिक़ है।

     

    सिफ़त-ए-एतेबारी (काल्पनिक विशेषता) वह है जिसका अर्थ वास्तविकता में सिद्ध न हो और केवल बुद्धि ने उसे मान लिया हो, जैसे भूत-प्रेत (ग़ौल) के लिए किसी दरिंदे की शक्ल, दांत और पंजों की कल्पना कर लेना। यह केवल एक काल्पनिक रूप है, जबकि वास्तविकता में इसका कोई प्रमाण नहीं। सिफ़त (विशेषता) का केंद्र कभी एक चीज़ होती है और कभी एक से अधिक। इसी तरह कुछ वास्तविकताएं मुफ़रद (एकल) होती हैं और कुछ अलग-अलग हिस्सों से मिलकर मुरक्कब (संयुक्त) होती हैं। अतः 'वजह-ए-शिबह' (समानता का कारण) इन प्रकारों के आधार पर कई तरह की हो जाती है। इन विस्तृत बारीकियों को छोड़कर, जो उच्च स्तर के विद्यार्थियों के लिए हैं और जिन्हें आप अकादमिक किताबों में विस्तार के साथ पा सकते हैं, अब मैं शुरुआती लोगों के लिए 'वजह-ए-शिबह' के बारे में कुछ मोटी-मोटी बातें बयान करता हूँ।

     

    (1) वजह-ए-शिबह कभी मुफ़रद (एकल) होती है, जैसे नसीम का शेर:

     

    दिखलाता था वह मकां जादू

    मेहराब से दर से चश्म-ओ-अबरू

     

    मेहराब (ताक़) को अबरू (भौंह) से तश्बीह (उपमा) दी गई है और दर (दरवाज़े) को चश्म (आँख) से। पहले में वजह-ए-शिबह वह गोलाई है जो मेहराब और अबरू में पाई जाती है, दूसरे में खुलापन है जो दोनों में महसूस होता है। और यह वजह-ए-तश्बीह (उपमा का कारण) एक ही है। इस पर यह आपत्ति उठ सकती है कि 'मुशब्बा-बिह' (जिससे उपमा दी जाए) को 'मुशब्बा' (जिसकी उपमा दी जाए) पर श्रेष्ठता प्राप्त होती है (किसका दर्जा ज़्यादा मज़बूत होता है, इसका ज़िक्र आगे आएगा) और मेहराब हमेशा मुशब्बा-बिह होती है और अबरू मुशब्बा, जबकि यहाँ मामला उल्टा है। अतः मुशब्बा-बिह यहाँ कमतर है और मुशब्बा उच्च। इसका जवाब यह है कि अगर यह मान भी लें कि यह वर्जित है, तो इसमें यह दावा है कि मेहराब और दर ऐसे थे कि उन्हें चश्म और अबरू से तश्बीह दी जा सकती थी। इस दावे का नाम साहित्य की शब्दावली में 'इद्दआ-ए-नाक़िस-बदर्जा-ए-कामिल' है, यानी अपूर्ण को पूर्ण कहना। ग़ालिब के इस शेर में इसी प्रकार से 'इद्दआ-ए-नाक़िस-बदर्जा-ए-कामिल' कहा गया है:

     

    कम नहीं जल्वा-गरी में तेरे कूचे से बहिश्त

    यही नक़्शा है वले इस क़दर आबाद नहीं

     

    कूचा (गली) हमेशा मुशब्बा होता है और बहिश्त (स्वर्ग) मुशब्बा-बिह। मगर यहाँ वक्ता का दावा है कि वह मुशब्बा-बिह है और यह मुशब्बा, इसी वजह से उसे अपूर्ण ठहराकर कह दिया कि उसमें यह कमी है कि वह इस क़दर आबाद नहीं है जिस क़दर तेरा कूचा है। तश्बीह के सिद्धांतों और उसके कारणों पर गहरी नज़र डालने से साबित होगा कि यक़ीनन मुशब्बा-बिह मूल (असल) है और मुशब्बा शाखा (फ़रअ)। शाखा को मूल बनाना और मूल को शाखा मानना सही नहीं है। मगर किसी ऐसे दावे के लिए जो जगह की ख़ासियत के कारण हो या अन्य कारणों से, इस तरह की तश्बीह लाने से शुरुआती लोगों को बचना चाहिए क्योंकि इसे निभाना और दावा साबित करना आसान काम नहीं है। मिर्ज़ा ग़ालिब को इस मामले में कमाल हासिल था जो हर किसी के बस की बात नहीं, इसलिए एक और शेर में ऐसी ही तश्बीह लाते हैं:

     

    नहीं कि मुझको क़यामत का एतेक़ाद नहीं

    शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं

     

    आमतौर पर समय की लंबाई को क़यामत के दिन से तश्बीह दिया करते हैं, मगर मिर्ज़ा क़यामत को रात के समान लंबा कह गए और कितनी ख़ूबसूरती से कह गए।

     

    जब यह तय हो चुका है कि मुशब्बा-बिह उच्च होना चाहिए, तो कला के जानकारों का कथन है कि महसूस (इंद्रियों से अनुभव होने वाली चीज़) को माक़ूल (बुद्धि से समझी जाने वाली चीज़) के साथ तश्बीह देना तर्क के आधार पर उचित नहीं है, क्योंकि माक़ूलात (बौद्धिक चीज़ें) महसूसात (इंद्रियगत चीज़ों) से ही प्राप्त होती हैं।

     

    कभी वजह-ए-तश्बीह मुरक्कब (संयुक्त) होती है, इसका उदाहरण वही चाँदी-सोने के छल्लों और चाँद-सूरज वाला ग़ालिब का शेर है। इसमें वजह-ए-तश्बीह मुरक्कब यानी एक से अधिक है। रंग, उच्च दर्जे, चमक और प्राप्त आकार के आधार पर, और आकार को समान करने के लिए, पहले यह दावा कर लिया गया है कि चाँद और सूरज बीच में से खाली किए हुए रूप में वांछित हैं, न कि केवल अपने मूल रूप में। अगर यह दावा न होता तो तश्बीह सही नहीं हो सकती थी। इसे शायद आप अत्यधिक नाज़ुक-ख़याली (सूक्ष्म कल्पना) कहें। मैं इसे अत्यधिक तार्किकता कहता हूँ। एक बात याद रखने के क़ाबिल है, यानी जहाँ वजह-ए-तश्बीह हिस्सी (इंद्रियगत) हो, वहाँ अतराफ़-ए-तश्बीह (तश्बीह के दोनों पक्ष) भी अनिवार्य रूप से हिस्सी होंगे, जैसे:

     

    थर्राईं ख़वासें सूरत-ए-बेद

    एक एक पूछने लगी भेद

     

    ख़वासें (दासियाँ) और बेद (बेंत का पेड़) हिस्सी हैं, यानी देखने की शक्ति के कार्य की सीमा के अंदर हैं। थर्राना जो दोनों में पाया जाता है, वह भी महसूस होने वाली चीज़ है, लेकिन जहाँ तश्बीह अक़्ली (बौद्धिक) होगी, वहाँ यह क़ैद नहीं है। इसलिए मिर्ज़ा के इस मक़्ते में:

     

    मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब

    मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

     

    'कुछ नहीं' के अर्थ हैं मादूम (अस्तित्वहीन)। मौजूद यानी ग़ालिब को मादूम के साथ तश्बीह दी गई है और यह इस दृष्टिकोण से कि कोई भी कार्य मादूम से नहीं हो सकता। ऐसा ही ग़ालिब है जिससे कोई कार्य नहीं हो सकता। या यह शेर मीर तक़ी का है:

     

    मीर इन नीम-बाज़ आँखों में

    सारी मस्ती शराब की सी है

     

    मुरक्कबात (संयुक्त प्रकारों) की क़िस्म से यह तश्बीह-ए-मुरक्कब-ए-हिस्सी है। मीर हसन के यहाँ ऐसी तश्बीह 'सहर-उल-बयान' के कई लगातार शेरों में आई है, जिसकी व्याख्या आनंद से खाली न होगी:

     

    पर उसने भी इतना तकल्लुफ़ किया

    कि इक दिन में जोड़े को धानी रंगा

     

    कहे तू कि शब चाँद ने आन के

    निकाला है मुँह खेत से धान के

     

    माशूक़ को (कई शेरों के बाद कहा है) जो धानी लिबास पहने हुए है, चाँद से तश्बीह दी। मगर केवल चाँद से नहीं, बल्कि इस हालत में कि हरे-हरे धानों का खेत लहलहा रहा हो और चाँद भी पूरी रोशनी के साथ निकले और ज़मीन से थोड़ा ही ऊँचा हुआ हो और धानों की हरियाली भली नज़र आती हो और देखने वाला इस खेत के किनारे पर हो और चाँद की तरफ़ मुँह करके देखे, तो यह नज़ारा उसके देखने में आएगा कि धान का हरा-भरा खेत लहलहा रहा है और चाँद उसके इतना क़रीब है कि मानो उसी खेत में से निकला है। यह ऐसा मुरक्कब-ए-हिस्सी (संयुक्त इंद्रियगत रूप) है कि इसके अतराफ़ (पक्ष) भी मुरक्कब हैं। अचरज नहीं कि 'चाँद का खेत करना' जो उर्दू का एक मुहावरा है, इसी शेर के अर्थ से लिया गया हो। यह है नेचुरल (प्राकृतिक) शायरी, अगर किसी के पास देखने की आँख और समझने का स्वाद हो।

     

    मुरक्कबात-ए-हिस्सी में वह अनोखी और दुर्लभ मुरक्कब समझी जाती है जिसमें तश्बीह इस रूप में आए कि उसमें अन्य विशेषताएँ और हरकतें भी पाई जाएँ, उदाहरण के लिए मसनवी 'सहर-उल-बयान' के इस शेर में:

     

    तमामी की संजाफ़ जल्वा-कुनां

    कि जूँ अक्स-ए-मह ज़ेर-ए-आब-ए-रवाँ

     

    तमामी (रेशमी कपड़े) की संजाफ़ (गोट/किनारी) को अक्स-ए-मह (चाँद की परछाईं) के साथ तश्बीह दी है। चाँद का अक्स अगर ठहरे हुए पानी पर पड़े तो बहुत अच्छा लगता है और उसकी चमक दोगुनी हो जाती है, मगर जब 'आब-ए-रवाँ' (बहते पानी) की शर्त लगा दी तो उसमें हज़ार गुना सुंदरता पैदा हो गई, क्योंकि एक तो वह ख़ुद चमकदार चीज़ है, फिर जब उसमें लहरें पड़ती हैं तो चमक कभी दोगुनी हो जाती है और कभी एक पल के लिए ग़ायब हो जाती है, और यह सूरज या चाँद की रोशनी से अच्छी तरह ज़ाहिर होता है। और संजाफ़ की भी यही ख़ूबी है कि जहाँ रोशनी का अक्स पड़ता है वहाँ चमक ज़्यादा दिखाई देती है और जहाँ उसकी सिलवटों का साया पड़ जाता है, जैसे बहते पानी में लहरों का, वहाँ कम। यहाँ तश्बीह लहर और चमक में है, और इस स्थिति में भी कि वह चमक कभी कम दिखाई देती है और कभी ज़्यादा। जब तक ये सभी विशेषताएँ दिमाग़ में मौजूद न हों, तश्बीह सही नहीं हो सकती।

     

    वजह-ए-तश्बीह कभी केवल हरकत (गति) में होती है। मगर ज़रूरी है कि उसमें हरकतों का मिश्रण (इख़्तिलात) हो, यानी जैसी हरकत मुशब्बा में हो वैसी ही मुशब्बा-बिह में हो। इसे 'इख़्तिलात-ए-हरकात' कहते हैं। ज़ौक़ का शेर है:

     

    नफ़स की आमद-ओ-शुद है नमाज़ अहल-ए-हयात

    जो यह क़ज़ा हो तो ऐ ग़ाफ़िलो क़ज़ा समझो

     

    नफ़स (साँस) की आमद-ओ-शुद (आने-जाने) को नमाज़ के साथ तश्बीह दी गई है, यानी जिस तरह नमाज़ में क़ियाम (खड़े होना) और सुजूद (सजदा करना) होता है, वैसे ही एक ज़िंदा इंसान की साँस कभी ऊपर को आती है और कभी नीचे को जाती है। अतः जब तक दोनों की हरकतों का आपस में मिश्रण नहीं होगा, वजह-ए-तश्बीह पैदा नहीं हो सकती।

     

    तश्बीह की ग़रज़

     

    अब इस बात पर चर्चा की जाएगी कि तश्बीह से ज़ेहन का क्या मक़सद होता है। याद रहे कि तश्बीह की ग़रज़ अक्सर और आमतौर पर मुशब्बह की तरफ़ लौटती है, यानी तश्बीह से अक्सर यह मक़सद होता है कि मुशब्बह की खूबी या ख़राबी या कोई और बात बयान की जाए, लेकिन कभी ऐसा भी होता है कि ग़रज़ मुशब्बह बिह की तरफ़ लौटती है।

     

    मेरे ख़याल में तश्बीह के मक़ासिद (उद्देश्यों) को समझना और उन पर महारत हासिल करना शायरों के लिए बहुत ज़रूरी है। इसलिए इस पर ज़रा तफ़्सील से बात की जाएगी। पहली ग़रज़ यानी मुशब्बह की खूबी या ख़राबी वग़ैरह को वाज़ेह करना कई क़िस्म का होता है। पहला यह कि तश्बीह की ग़रज़ से इस बात का बयान हो कि मुशब्बह का वजूद मुमकिन है और यह बात वहाँ होती है जहाँ इसके नामुमकिन होने का दावा भी हो सकता हो। ज़ौक़ के ये दो शेर इसकी मिसाल हैं:

     

    तुझ से देखा सब को और तुझ को न देखा जूँ निगाह

    तू रहा आँखों में और आँखों में पिन्हाँ ही रहा

     

    इल्म है कुछ और शय और आदमियत और शय

    लाख तोते को पढ़ाया फिर भी हैवाँ ही रहा

     

    इख़्तिसार (संक्षेप) के मक़सद से सिर्फ़ पहले शेर की तशरीह की जाएगी। दावा किया गया है कि माशूक़ आँखों में होने के बावजूद आँखों से पोशीदा (छुपा हुआ) है और कह सकते हैं कि यह बात नामुमकिन है क्योंकि जो चीज़ आँखों के इतनी क़रीब हो कि ख़ुद आँखों में रहे और फिर दिखाई न दे, यह अजीब बात है। लेकिन जब उसे यानी माशूक़ को निगाह से तश्बीह दी तो वह दावा साबित हो गया और उसका मुमकिन होना मालूम हो गया।

     

    दूसरा यह कि मुशब्बह का हाल बयान करना मक़सद हो, जैसे एक कपड़े को दूसरे कपड़े से सफ़ेदी या स्याही (कालेपन) में तश्बीह दी जाए। इस क़िस्म में मुशब्बह बिह में वजह-ए-शिबह बिल्कुल ज़ाहिर और जानी-पहचानी होनी चाहिए ताकि मुशब्बह का हाल पूरी सफ़ाई के साथ ज़ाहिर हो जाए। मिसाल के तौर पर सौदा का यह शेर है जो आसमान के रुतबे के बारे में है:

     

    रखता है पुर-ग़ुरूर को जूँ नेज़ा सर-बुलंद

    जूँ जादा ख़ाकसार को दे है ज़मीं पे डाल

     

    मगरूर को सर-बुलंद रखने और ख़ाकसार (विनम्र) को ज़मीन पर डालने का हाल नेज़ा (भाला) और जादा (रास्ता) की तश्बीह से बहुत वाज़ेह हो गया। तीसरा यह कि मुशब्बह के हाल की मिक़दार (मात्रा) बयान करना मक़सद हो, ज़्यादती और ताक़त या कमज़ोरी में, जैसे काले कपड़े को कालेपन की शिद्दत में कौवे के पर से तश्बीह दें या सफ़ेद कपड़े को बर्फ़ से या माशूक़ की ज़ुल्फ़ को उम्र-ए-ख़िज़्र से लंबाई की ज़्यादती में। चौथा यह कि तश्बीह देने की ग़रज़ यह हो कि मुशब्बह का हाल सुनने वाले के दिल में उतार दिया जाए, मसलन बेनतीजा कोशिश को पानी पर खिंची हुई लकीर से तश्बीह दें। चूँकि लकीर का बेफ़ायदा होना और मिट जाना ज़ाहिर है, इसलिए जब इससे कोशिश को तश्बीह देंगे तो उसका बेफ़ायदा होना अच्छी तरह ज़ेहन में बैठ जाएगा। इसमें एक फ़ायदा भी है और दलील देने वालों के मुताबिक़ ज़रूर यही तश्बीह का आविष्कारक रहा होगा। जानना चाहिए कि इंसान का मन अक़्ली (बौद्धिक) चीज़ों के मुक़ाबले हिस्सी (महसूस होने वाली) चीज़ों की तरफ़ ज़्यादा माइल होता है। इसी क़िस्म से होगा अगर किसी शख़्स के पक्के वादे को पत्थर की लकीर से तश्बीह दें, मेरा शेर है:

     

    मुँह से जो कह दिया समझो उसे पत्थर की लकीर

    फ़र्क़ इस में न कभी बाल बराबर होगा

     

    पाँचवीं ग़रज़ तश्बीह की यह होती है कि सुनने वाले की नज़र में मुशब्बह की बुराई या भलाई आईने की तरह साफ़ हो जाए, जैसे दाँतों की तश्बीह मोतियों से, होंठों की याक़ूत (लाल पत्थर) से या बदसूरत की देव या भूत से। छठा यह कि मुशब्बह का अनोखा और अजीब होना साबित हो जाए या मुशब्बह की ऐसी सूरत बयान की जाए जो आम आदत के ख़िलाफ़ और नामुमकिन हो। मसलन यह शेर:

     

    चेहरा मह-वश है एक काकुल-ए-मुश्क-फ़ाम दो

    हुस्न-ए-बुताँ के दौर में है सहर एक शाम दो

     

    दो शाम में एक सुबह का होना अजीब और अनोखा है और यह ज़्यादातर वहमी और ख़याली तश्बीह में पाया जाता है।

     

    यह नुक्ता याद रखना चाहिए कि जब मुशब्बह के हाल को सुनने वाले के ज़ेहन में बिठाना मंज़ूर हो तो लाज़िम है कि वजह-ए-शिबह सबसे मुकम्मल और सबसे मशहूर हो। किस लिए कि तबीयत मुकम्मल और मशहूर की तरफ़ ज़्यादा माइल होती है। तश्बीह की बुनियाद अगरचे पेचीदगी-पसंदी, बारीकी पैदा करने, नयापन और कलाम की ख़ूबसूरती पर है, लेकिन इसका असल मक़सद हक़ीक़त को बयान करने में होने वाली कमी को पूरा करना है। नीचे दी गई तारीखी मिसाल से इसकी वज़ाहत होगी जो मौलाना शिब्ली मरहूम की 'शेर-उल-अजम' से ली गई है।

     

    लिखा है कि हस्सान इब्न-ए-साबित के छोटे बच्चे को एक दफ़ा भिड़ (ततैया) ने काट खाया। चेहरे पर सूजन आ गई। हस्सान को ख़बर हुई। लड़के से पूछा किस जानवर ने काटा? यह लड़का कुछ जवाब न दे सका क्योंकि यह हक़ीक़त उस पर ज़ाहिर न थी कि जिस जानवर ने उसे काटा उसको ज़ंबूर (भिड़) कहते हैं। फिर हस्सान ने पूछा कि वह किस शक्ल का जानवर था। बच्चा बोल उठा, का-अन्नहू मुल्तफ़्फ़न बे-बुर्द। यानी ऐसा मालूम होता था कि वह धारीदार चादरों में लिपटा हुआ है। भिड़ों के परों पर रंगीन लकीरें होती हैं इसलिए उसको धारीदार चादर से तश्बीह दी। हस्सान समझ गया कि भिड़ ने काटा है। इससे दो बातें साबित हो गईं। एक यह कि जब हम हक़ीक़त-ए-हाल बयान करने में लाचार होते हैं तो तश्बीह से काम लेते हैं और दूसरा यह कि तश्बीह असल हक़ीक़त को ज़ाहिर कर देती है। इसके साथ तश्बीह के मक़ासिद की बहस को ख़त्म किया जाता है।

     

    तश्बीह की क़िस्में

    अब मुख़्तसर तौर पर तश्बीह की चंद क़िस्मों का ज़िक्र मिसालों के साथ करेंगे।

     

    तश्बीह-ए-मुतअद्दिद

    इसका बयान आ चुका है। यह दो क़िस्म की है, एक मुतअद्दिद हिस्सी (ऐंद्रिक) जैसे कहें यह बेर सेब की मानिंद है। यानी रंग, मज़े और बू में और ये तीनों तश्बीह की वजहें हैं और हिस्सी हैं। दूसरी मुतअद्दिद अक़्ली (बौद्धिक), जैसे कहें कि फ़लाँ तबीब (हकीम) बुक़रात है, यानी समझ की तेज़ी, बीमारी की पहचान, इलाज वग़ैरह में।

     

    तश्बीह-ए-मुरक्कब (मिश्रित तश्बीह) में तमाम हिस्से मुशब्बह बिह के लिए लाज़िमी हैं, वरना तश्बीह दुरुस्त न होगी, मगर तश्बीह-ए-मुतअद्दिद में इसकी क़ैद नहीं। इसे कभी तश्बीह-ए-नाक़िस (अधूरी तश्बीह) भी कह देते हैं। तश्बीह-ए-मुतअद्दिद में कभी एक तरफ़ मुरक्कब और एक तरफ़ मुफ़रद (अकेली) होती है, ज़ौक़:

     

    तश्बीह-ए-नाक़िस

     

    नहीं ये शीशा-ए-मय है किसी मय-ख़्वार का दिल

    मुहतसिब देख न कर दिल-शिकनी, ख़ूब नहीं

     

    शीशे को सूरत और रुतबे की बुलंदी में दिल के साथ तश्बीह दी गई है। चुनाँचे दूसरे मिसरे में रुतबे की बुलंदी के लिहाज़ से इसके तोड़ने की मनाही की गई है। पस सूरत तो हिस्सी है मगर रुतबे की बुलंदी अक़्ली है।

     

    सबका इस पर इत्तेफ़ाक़ (सहमति) है कि आम बातों को जो तमाम मौजूद चीज़ों में ज़ाहिरी तौर पर मुश्तरक (साझा) हैं, आपस में तश्बीह देना लुत्फ़ नहीं पैदा करता। मसलन कोई कहे, फ़लाँ शख़्स ख़ुदा का बंदा है। हालाँकि दोनों वजूद में शरीक हैं लेकिन यह तश्बीह ठीक नहीं क्योंकि तश्बीह में ज़रूरी है कि मख़्सूस ख़ूबियाँ बयान की जाएँ क्योंकि इस मौक़े पर ख़ूबियों की ख़ुसूसियत को ध्यान में रखा जाता है। इसलिए तल्मीह (इशारे) या मज़ाक़ के तौर पर किसी कंजूस को यह कहना कि 'वह हातिम है' दुरुस्त होता है बल्कि ऐसी तश्बीह को तश्बीह-ए-बलीग़ कहना चाहिए, क्योंकि तश्बीह में ख़ूबियों की ख़ुसूसियत को ध्यान में रखा जाता है। इस वजह से तबीब को मसीहा और रहबर को ख़िज़्र से तश्बीह देना सबसे बेहतरीन तश्बीहात हैं। इसके अलावा शायरी के मौक़ों पर इस क़िस्म का कलाम क़ाबिल-ए-एतराज़ नहीं। जैसे कंजूस को मज़ाक़ में हातिम कह देना या दुश्मन को मेहरबान कहना भी तारीफ़ में दाख़िल है। ज़ौक़ फ़रमाते हैं:

     

    कहाँ हम और कहाँ ग़म हम को ग़म से कुछ ग़रज़ मतलब

    मगर ऐ हज़रत-ए-इश्क़ आप ने ये मेहरबानी की

     

    यहाँ हज़रत और मेहरबानी साफ़ तौर पर तंज़ (कटाक्ष) के तरीक़े पर हैं।

     

    तश्बीह वुक़ूई और तश्बीह ग़ैर-वुक़ूई

     

    ये दोनों मुशब्बह की तरफ़ से होती हैं क्योंकि वह असल है। अगर उसका होना या न होना तय होगा तो इसका भी होगा। यह इस तरह होगा कि अगर मुशब्बह बिही का वजूद में आना नामुमकिन है तो उसके साथ कोई ऐसा लफ़्ज़ इस्तेमाल कर दें जिससे उसका वजूद में आना मुमकिन हो जाए, तो यह एक अजीब बात हो जाती है और एक क़िस्म का अनोखापन पैदा हो जाता है। मिसाल के तौर पर मिर्ज़ा ग़ालिब का मतला है:

     

    क़तरा-ए-मय ब-स-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ

    ख़त-ए-जाम-ए-मय सरासर रिश्ता-ए-गौहर हुआ

     

    नीचे दी गई तफ़्सीर से मिर्ज़ा का उस्ताद-ए-फ़न होना कितने यक़ीन के साथ साबित होता है। क़ायदा है कि प्याला या गिलास वग़ैरह पीने के बर्तनों में असल बनावट या नक़्क़ाशी की गोल लकीरें अंदर की तरफ़ होती हैं। आपने चीनी के बर्तनों में अक्सर ऐसा देखा होगा। अगर फ़र्ज़ कीजिए कि बिलौर के प्यालों या गिलासों में ऐसी गोल लकीरें नहीं पाई जातीं, तो यूँ ही सही, मगर तजुर्बा गवाह है कि जब कोई तरल चीज़ चीनी या बिलौर के एक बिल्कुल सादे प्याले में डाली जाए तो ख़ुद वह चीज़ उस प्याले में अपनी सतह की हद से एक क़िस्म की लकीर या निशान पैदा कर देती है। लीजिए 'ख़त-ए-जाम-ए-मय' (शराब के प्याले की लकीर) का सुबूत मिल गया। अब एक और बात देखिए, जब प्याले में शराब डाली जाती है तो फ़ौरन एक गोल लकीर पैदा हो जाती है। सिर्फ़ यही नहीं, बल्कि उसी वक़्त उसकी गोल लकीर में बुलबुले लगातार पैदा हो जाते हैं। इसकी साइंटिफ़िक वजह यह है कि यह एक ज़ाहिर सी सच्चाई है कि हर ख़ाली जगह में हवा होती है और एक ख़ाली जगह में से भारी चीज़ हल्की चीज़ को निकाल देती है। प्याले में गोल लकीर से जुड़े हुए ये बुलबुले हवा के उस बचे हुए हिस्से को अपने अंदर लिए हुए हैं जो अंदरूनी हिस्से से बाहर कर दी गई।

     

    किनारों की हवा को प्याले की दीवार से एक क़िस्म का सहारा मिला, इसलिए वह तरल पदार्थ यानी शराब से थोड़ी देर के लिए मुक़ाबले को तैयार हो गई और शायर के तेज़ ज़ेहन के लिए मोतियों की लड़ी सी बन गई। मगर साइंस ने कहा, नहीं, अभी बुलबुलों का वह घेरा 'रिश्ता-ए-गौहर' (मोतियों की लड़ी) नहीं हुआ क्योंकि मोती ठोस चीज़ है और बुलबुला ठोस नहीं। शायर पहले ही साइंस की चोट से बचना चाहता था। पहले मिसरे में 'हैरत' और 'नफ़स-परवर' को रख दिया। इस पर साइंस ने तो वाह-वाह कह दी मगर फ़न (कला) ने अब भी मंज़ूरी नहीं दी और त्यौरी चढ़ाकर फ़रमाया कि लड़ी के साथ तश्बीह तब पूरी हो जब वह दाना-दाना हो, और यह होना नामुमकिन है। मगर उस्ताद ने लफ़्ज़ 'क़तरा' की तरफ़ इशारा किया जिससे इसके मुमकिन होने की बात समझ में आ गई। ऐसी तश्बीहों को निभाना बहुत मुश्किल है। नए सीखने वालों को इन मुश्किल मंज़िलों में क़दम नहीं रखना चाहिए।

     

    इज़हार-उल-मतलूब

     

    यह तश्बीह की वह क़िस्म है जिसमें बात कहने वाले के नज़दीक मुशब्बह बिही अहम होता है, जैसे भूखा पूरे चाँद को या दोपहर के सूरज को रोटी से तश्बीह देता है। ज़फ़र फ़रमाते हैं:

     

    तनूर-ए-चर्ख़ से लेते गुरसने कब के उतार

    ज़रा भी लगती अगर क़ुर्स-ए-आफ़्ताब में सीख़

     

    क़ुर्स (रोटी) मुशब्बह बिही है और आफ़्ताब मुशब्बह। बात कहने वाले के नज़दीक रोटी अहम थी इसलिए उसी को मुशब्बह बिही बनाया।

     

    तश्बीह-ए-तस्विया

     

    यह वह है जिसमें मुशब्बह बिही एक और मुशब्बह एक से ज़्यादा होते हैं, जैसे यह कहें कि मेरा जुदाई का दिन और तेरी ज़ुल्फ़ बरसात की रात जैसी है।

     

    तश्बीह-ए-जमा

     

    यह वह है जिसमें इसका उल्टा हो, यानी मुशब्बह एक हो और मुशब्बह बिही एक से ज़्यादा हों, जैसे ज़ौक़ के इस शेर में:

     

    मिज़ा पैकाँ का है टुकड़ा कि सिरी का टुकड़ा

    मुखड़ा है चाँद का टुकड़ा कि परी का टुकड़ा

     

    वजह के लिहाज़ से तश्बीह कभी तमसील (दृष्टांत) होती है, ज़ौक़:

     

    बद-ख़स्लतों को करता है बाला-नशीं फ़लक

    ऊँची है आशियाना-ए-ज़ाग़-ओ-ज़ग़न की शाख़

     

    या नासिख़ का यह शेर:

     

    जो कि ज़ालिम है, वह हरगिज़ फूलता फलता नहीं

    सब्ज़ होते खेत देखा है कभी शमशीर का

     

    यह तरीक़ा उर्दू में कम राइज है, फ़ारसी की शाइरी में मिर्ज़ा मोहम्मद अली साइब और हिंदुस्तान में मुल्ला ताहिर ग़नी ने इसे बहुत बरता है। उर्दू में सबसे ज़्यादा नासिख़ ने, फिर ज़ौक़ ने इसे इस्तेमाल किया। कुछ लोग इस अंदाज़ को पसंद नहीं करते क्योंकि उनकी तबीयत पेचीदगियाँ पसंद करती है और तमसील में आसानी से बात बन जाती है। मिर्ज़ा ग़ालिब उनमें से एक हैं।

     

    तश्बीह-ए-मुजमल

     

    इसमें वजह-ए-तश्बीह बयान नहीं की जाती, जैसे:

     

    तेरे सोने के लिए मह-पारा

    मेरी आँखों का बने गहवारा

     

    गहवारा (पालना) को आँख से जो तश्बीह दी गई है, वह ज़ाहिर है मगर बयान नहीं की गई। कभी यह तश्बीह पोशीदा (छुपी हुई) होती है।

     

    तश्बीह-ए-मुफ़स्सल

     

    यह वह है जिसमें वजह-ए-तश्बीह का ज़िक्र हो।

     

    मीर हसन:

     

    वह पीठ उसकी शफ़्फ़ाफ़ आईना-दार

     

    पीठ को शफ़्फ़ाफ़ी (पारदर्शिता) और सफ़ाई में आईने से तश्बीह दी गई है, जो ज़ाहिर है।

     

    तश्बीह-ए-क़रीब मुब्तज़ल

     

    यह वजह के लिहाज़ से है। इसकी दूसरी क़िस्म को 'ग़रीब बईद' कहते हैं। इसमें वजह ज़ाहिर होने के कारण सुनने वाले का ज़ेहन मुशब्बह से मुशब्बह बिही की तरफ़ बिना ज़्यादा सोचे चला जाता है, जैसे बाप को बेटे के साथ सूरत-शक्ल में तश्बीह दें। क़रीबी मुनासिबत (संबंध) की वजह से ज़ेहन बेटे से बहुत जल्द बाप की तरफ़ चला जाता है और बाप बिना किसी दिमागी उलझन के ज़ेहन में आ जाता है। कभी मुशब्बह बिही पूरी तरह मौजूद होता है, इस वजह से कि एहसास में दोहराव पाया जाता है, और एहसास के दोहराव का मतलब यह है कि मुशब्बह बिही बार-बार महसूस होता है। मिसाल के तौर पर आफ़्ताब (सूरज) को चमकाए हुए आईने के साथ तश्बीह दें। इस वजह से कि वह भी गोल और रोशन होता है और यह भी। और दोनों अक्सर देखने में आते हैं। इसलिए क़रीबी मुनासिबत और एहसास के दोहराव से तफ़्सील (विस्तार), और तफ़्सील से अनोखेपन की कमी पैदा हो जाती है, और एहसास से मामूलीपन पैदा होता है।

     

    ग़रीब बईद

     

    यह ऊपर बताई गई बात के उलट है। यहाँ तो मुशब्बह बिही में बहुत सी तफ़्सील होती है, जैसे ग़ालिब के सोने-रुपए के छल्लों और मीर हसन के धान के खेत वाले शेर में। यानी मुशब्बह बिही कई तरह की बातों से मिलकर बना हो, या मुशब्बह बिही का हासिल होना और मौजूद होना, मुशब्बह की मौजूदगी के वक़्त मुनासिबत (संबंध) की दूरी के कारण अनोखे तरीक़े से होता है। यानी मुशब्बह ज़ेहन में हाज़िर हो जाता है तो मुशब्बह बिही को बड़े सोच-विचार के साथ ज़ेहन में बिठाया जा सकता है, जैसा कि ज़ौक़:

     

    मुर्ग़-ए-दिल नर्गिस-ए-मैगूँ की है मिज़्गाँ में असीर

    ताज़ा मज़मून है जो बाँधूँ क़फ़स जाम-ए-शराब

     

    जाम-ए-शराब (शराब के प्याले) को क़फ़स (पिंजरे) से तश्बीह देना बहुत दूर की बात है। जब तक कि नर्गिस-ए-मैगूँ (सिर्फ़ नर्गिस नहीं) का ख़याल इस नज़रिए से न किया जाए कि उसकी पलकों में मुर्ग़-ए-दिल (दिल रूपी पक्षी) क़ैद हो, इसे समझना मुश्किल है। इस शेर में कई तश्बीहें हैं। दिल को मुर्ग़ (पक्षी) से, आँख को इस्तिआरे (रूपक) के तौर पर नर्गिस से, और नर्गिस के साथ मैगूँ (शराब के रंग का) होने की शर्त है। इन बातों के लिहाज़ से नर्गिस-ए-मैगूँ को जाम-ए-शराब से तश्बीह दी गई है और यह तश्बीह अनोखी (बदीअ) है। यानी बईद (दूर की) भी है और ग़रीब (अनोखी) भी। यहाँ यह नोट करना ज़रूरी है कि बाद के उस्ताद शाइरों की इस्तलाह में 'मुब्तज़ल' उस मज़मून को कहते हैं जिसमें तश्बीह-ए-मुजमल या मुफ़स्सल को बहुत से लोग बाँधें, जैसे माशूक़ के क़द को सर्व (पेड़) से, गाल को गुलाब से और दाँतों को मोती से सब तश्बीह देते आए हैं।

     

    तश्बीह-ए-मशरुत

     

    यह वह है जिसमें मुशब्बह या मुशब्बह बिही दोनों को किसी चीज़ के होने या न होने की शर्त के साथ जोड़ दें:

     

    लब को तेरे हम अक़ीक़ कहते

    गर आब-ए-हयात इसमें होता

     

    सुर्खी और जान बख़्शने की ख़ूबी, ये सिफ़तें (ख़ूबियाँ) माशूक़ के लब में मान लीं। अक़ीक़ (एक लाल पत्थर) में सुर्खी तो है लेकिन दूसरी ख़ूबी नहीं है। इसलिए इसमें आब-ए-हयात (अमृत) के मौजूद होने की शर्त लगा दी।

     

    तश्बीह-ए-इज़मार

     

    कभी एक चीज़ को दूसरी से तश्बीह तो देते हैं मगर ज़ाहिर ऐसा मालूम होता है कि तश्बीह देना मक़सद नहीं है, मगर तश्बीह असल में होती है:

     

    गुल अगर तुम हो तो हूँ किस लिए मैं हमरह-ए-ख़ार

    शोला अगर तुम हो तो क्या जलने से मुझको सरोकार

     

    इस क़िस्म की तश्बीह में दोनों पक्षों के एक होने का दावा होता है। मुशब्बा बिही और मुशब्बा मानो आपस में एक ही हैं और जब मुशब्बा बिही के गुण मुशब्बा में पाए जाते हैं तो वह तश्बीही एकता ख़त्म हो जाती है और असल में तश्बीह देना ही मक़सूद होता है, वरना अर्थ की बारीकी ज़ाहिर नहीं होती ताकि यह भ्रम अच्छी तरह ज़ाहिर हो जाए कि तश्बीह देने का इरादा नहीं था।

     

    आपने देखा कि तश्बीह-ए-मशरुत और तश्बीह-ए-इज़मार कितनी मिलती-जुलती हैं, मगर इनमें एक बारीक फ़र्क़ है। वह यह कि मशरुत में शर्त की क़ैद मुशब्बा और मुशब्बा बिही दोनों में ध्यान में रखी जाती है और इज़मार में शर्त का ध्यान नहीं रखा जाता, बल्कि पूरे वाक्य के साथ शर्त का ताल्लुक़ होता है। इसके अलावा, इज़मार में शर्त का जवाब लाज़िमी तौर पर सवालिया शब्द (प्रश्नवाचक शब्द) के साथ आता है।

     

    तश्बीह-ए-तफ़्ज़ील

    वह यह कि पहले एक चीज़ को दूसरी चीज़ से तश्बीह दें और फिर मुशब्बा को मुशब्बा बिही पर तरजीह (श्रेष्ठता) दें। तफ़्ज़ील (तरजीह) वजह-ए-शिबह बयान नहीं करती ताकि यह भ्रम हो जाए कि मुशब्बा में मुशब्बा बिही की तमाम ख़ूबियाँ पाई जाती हैं। शेर:

     

    तू मसीहा है बल्कि उसको भी

    तेरे लब से है माया-ए-एजाज़

     

    'तू' मुशब्बा है और 'मसीहा' मुशब्बा बिही, वजह-ए-शिबह दोनों में मुर्दों को ज़िंदा करना है जिसका ज़िक्र नहीं है, और बढ़ोत्तरी की वजह होंठों का फ़ैज़ (लाभ) देना है। यह और वजह-ए-शिबह दोनों एक नहीं हैं।

     

    नोट: यह भी इसी क़िस्म से है कि पहले दावा करें कि मुशब्बा, मुशब्बा बिही की ही क़िस्म से है, फिर मुशब्बा को मुशब्बा बिही पर तरजीह दें। यह तश्बीह सबसे लतीफ़ (सुंदर) उस सूरत में होती है जब इसमें इज़मार भी किया जाए, यानी ज़ाहिरी तौर पर मालूम हो कि तश्बीह देना मक़सद नहीं है।

     

    तमाम रात हुई कर गया किनारा चाँद

    लो उतरो बाम से तुम जीते और हारा चाँद

     

    पहले दावा किया कि तुम और चाँद एक जैसे हो। फिर रात भर एक-दूसरे के मुक़ाबले में उनका इम्तिहान लिया। रात के आख़िर में चाँद को कमतर और माशूक़ को कामिल (मुकम्मल) ठहराया। ज़ाहिरी तौर पर मालूम नहीं होता कि बात कहने वाले (शायर) ने इसमें तश्बीह का इरादा किया भी है।

     

    तश्बीह की और भी कई क़िस्में हैं। मसलन तश्बीह-ए-मुअक्कद और ग़ैर-मुअक्कद वग़ैरह-वग़ैरह, मगर लेख लंबा हो जाने के डर से उनके ज़िक्र को छोड़ दिया जाता है।

     

    इस बहस को ख़त्म करने से पहले एक और ज़रूरी बात बतानी है। याद रहे कि तश्बीह उस जगह साबित होती है जहाँ मुशब्बा बिही, वजह-ए-शिबह के लिहाज़ से, मुशब्बा से ज़्यादा कामिल (बेहतर) हो, चाहे दावे के तौर पर, चाहे हक़ीक़त में। और जहाँ वजह-ए-शिबह में मुशब्बा और मुशब्बा बिही दोनों की बराबरी मुराद हो और यह मक़सद न हो कि एक कामिल है और दूसरा कमतर है, तो वहाँ तश्बीह नहीं हो सकती, और उसे छोड़ देना ही मुनासिब है। क्योंकि तश्बीह में एक की बढ़ोतरी और एक की कमी का इरादा होता है। जहाँ बराबरी का इरादा हो उसे 'तशाबुह' कहते हैं, यानी एक चीज़ का दूसरी चीज़ के मुशाबेह (मिलता-जुलता) होना। तश्बीह और तशाबुह के आपसी फ़र्क़ का ख़याल रखना चाहिए। मिर्ज़ा सौदा के इन अशआर में तशाबुह है, तश्बीह नहीं:

     

    जिसके तू पास न होवे तो उसे आलम में

    मजलिस-ओ-शादी-ओ-तन्हाई-ओ-ग़म चारों एक 

     

    कर दिया पल में करिश्मा ने तेरी आँखों के

    मस्जिद-ओ-मय-कदा-ओ-दैर-ओ-हरम चारों एक

     

    यहाँ मजलिस की तन्हाई से और शादी (ख़ुशी) की ग़म से तश्बीह देना मक़सूद नहीं है, बल्कि उनकी बराबरी दिखाना मक़सद है। शायद नीचे दिए गए अशआर तशाबुह की ज़्यादा साफ़ मिसाल हैं:

     

    तेरे रू-ए-अरक़-आलूदा और कानों के मोती का

    बयाँ क्या कीजिए है लुत्फ़ दोनों में बराबर का

     

    गुहर है तेरे कानों में दिया क़तरा अरक़ का है

    यह है क़तरा अरक़ का या कि है दाना यह गौहर का

     

    कभी एक लतीफ़ मुबालग़े (बारीक अतिशयोक्ति) को ग़लती से तश्बीह समझ लिया जाता है:

     

    आतिश-ए-ग़म ऐसी कुछ भड़की कि पल में हो गया

    दाग़-ए-दिल से आफ़्ताब-ए-रोज़-ए-महशर आश्कार

     

    यहाँ दिल के दाग़ की जलन में मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) करना मक़सूद है। यानी दिल का दाग़ जलन में उस दर्जे को पहुँच गया कि क़यामत के दिन का सूरज बन गया, जो ज़मीन की सतह से सिर्फ़ सवा नेज़े (भाले) ऊपर होगा। पस ज़ाहिर है कि उसमें किस दर्जे की तपिश और जलन होगी। पहली नज़र में यह शक होता है कि दिल के दाग़ को सूरज से तश्बीह दी गई है, लेकिन चूँकि यह तजरीद के तरीक़े पर है, इसलिए तश्बीह नहीं है। 'तजरीद' इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) की एक इस्तलाह है, जिसके ज़िक्र की यहाँ ज़रूरत नहीं।

     

    तश्बीह और दूसरी सनाए (अलंकारों) की पूरी वाक़फ़ियत (जानकारी) के लिए इल्म-ए-बयान के शुरुआती रिसालों (पुस्तिकाओं) के मुताले के बाद ऐसी मुंतही-उल-फ़न (उच्च स्तर की) किताबों का देखना और समझना ज़रूरी है, जैसे ख़ान आरज़ू की 'मुस्तलहात-उश-शोअरा', 'मुस्तलहात-ए-वारस्ता', क़तील की 'नहर-उल-फ़साहत', 'हदाईक़-उल-बलाग़त', शेख़ अब्दुल क़ादिर जुरजानी की लिखी 'असरार-उल-बलाग़त', हकीम सकाकी की लिखी किताबें, ज़ुहूरी उरूज़ी की किताबें वग़ैरह-वग़ैरह।

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