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प्लॉट का क़िस्सा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

प्लॉट का क़िस्सा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

MORE BYशम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

    अफ़साने पर सैद्धांतिक बहस की शुरुआत अरस्तू से होती है। चूँकि त्रासदी (Tragedy), कॉमेडी (Comedy) और अफ़साना, तीनों में घटनाओं का बयान होता है, इसलिए त्रासदी और कॉमेडी में घटनाओं के बारे में अरस्तू ने जो कुछ कहा, उसे अफ़साने के लिए भी सही मान लिया गया। चुनाँचे अरस्तू के प्रभाव में यह सिद्धांत क़ायम और मक़बूल हुआ कि अफ़साने में प्लॉट का स्थान केंद्रीय है। प्लॉट के बारे में अरस्तू के बिंदु नीचे दिए गए हैं:

    (1) कार्य (action) की नुमाइंदगी त्रासदी का प्लॉट है, प्लॉट से मुराद घटनाओं का तार्किक क्रम है।

    (2) त्रासदी का मक़सद घटनाओं और प्लॉट को पेश करना है। प्लॉट के बिना त्रासदी क़ायम नहीं हो सकती, मगर किरदार के बिना क़ायम हो सकती है।

    (3) प्लॉट में शुरुआत, मध्य और अंत होता है। अच्छी तरह से बुना गया प्लॉट वह है जिसमें ये तीनों ख़ूबियाँ हों।

    (4) घटनाओं के क्रम से मुराद यह है कि अंत के बाद कुछ हो और अंत किसी घटना के बाद स्वाभाविक रूप से सामने आए, चाहे नियम के अनुसार, चाहे ज़रूरत के तहत।

    (5) प्लॉट के विभिन्न हिस्सों में इस तरह का रचनात्मक जुड़ाव होना चाहिए कि अगर किसी एक की जगह बदल दी जाए या उसे हटा दिया जाए, तो सारा का सारा ढाँचा अव्यवस्थित या तितर-बितर हो जाए।

    (6) प्लॉट में वही चीज़ें बयान होनी चाहिए जो घटित हो सकती हैं, यानी जिनका घटित होना लाज़मी या मुमकिन हो।

    ऊपर दिए गए बिंदुओं की रोशनी में यह देखना मुश्किल नहीं है कि आधुनिक अफ़साने के प्लॉट के बारे में लगभग सारी मान्यताएँ अरस्तू के विचारों पर ही खड़ी की गई हैं। इन विचारों का प्रभाव इतना ज़बरदस्त है कि अफ़साने और कहानी, यानी फ़िक्शन (Fiction) के सबसे आधुनिक सिद्धांतकार भी इनसे निकाले गए कुछ नतीजों को स्वाभाविक और सहज मानते हैं। मिसाल के तौर पर, अरस्तू के विचारों का एक अहम नतीजा यह है कि चूँकि अफ़साने के लिए प्लॉट ज़रूरी है और प्लॉट से मुराद घटनाओं का ऐसा क्रम है जिसमें आपस में शुरुआत, मध्य और अंत का रिश्ता हो और इस क्रम में एक रचनात्मक जुड़ाव हो, लिहाज़ा अफ़साना (यानी क़िस्सा) क़ायम होने के लिए यह ज़रूरी है कि उसमें बयान की गई घटनाओं में कारण और प्रभाव (cause and effect) का रिश्ता हो।

    चुनाँचे जेराल्ड प्रिंस (Gerald Prince) अपनी किताब 'Grammar of Stories' में कहता है कि घटनाओं का वह क्रम जिसमें कारण और प्रभाव का रिश्ता हो, कहानी नहीं मालूम होती, और वह क्रम जिसमें यह रिश्ता हो, हमें स्वाभाविक और सहज रूप से (intuitively) कहानी मालूम होती है। अफ़साना (यानी क़िस्सा, जो अफ़साने की असल है) और कहानी, यानी फ़िक्शन (Fiction) के फ़र्क़ पर बहस को फ़िलहाल टालते हुए हम यह कह सकते हैं कि चूँकि कहानी और अफ़साना दोनों में प्लॉट के महत्व को एक समान माना गया है और अफ़साने में क़िस्सापन (fictionality) को केंद्रीय महत्व दिया गया है, इसलिए प्लॉट की बहस की हद तक क़िस्से और फ़िक्शन यानी कहानी के पारंपरिक विचार में कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं है।

    घटनाओं के क्रम में रचनात्मक जुड़ाव का होना क़िस्से और अफ़साने की स्वाभाविक पहचान है, यह बात दिल को वाक़ई इतनी सही लगती है कि इसका विश्लेषण किए बिना अफ़साने के बारे में कोई सिद्धांत क़ायम नहीं हो सकता। इस बात के प्रभावशाली होने की एक वजह यह है कि घटना यानी event की परिभाषा तय करने में ज़रूरी स्पष्टता से काम नहीं लिया गया। लिहाज़ा यह भी ज़रूरी है कि घटना को स्पष्ट करने की कोशिश की जाए। ज़ाहिर है कि हर वह बात जो होती है, उसे हम घटना कहते हैं।

    अगर वह बात भविष्य में भी होने वाली है, तो हम उसे भविष्य में पेश आने वाली या वजूद में आने वाली घटना कहते हैं। मिसाल के तौर पर, अगर हम कोई नॉवेल पढ़ रहे हैं तो हम अपने आप से, या लेखक से, या किसी और व्यक्ति से, जिसने वह नॉवेल पढ़ा हो, यह हर वक़्त पूछ सकते हैं कि अब क्या घटना पेश आएगी? इसी तरह अगर हम किसी ऐसी घटना का विवरण पढ़ या सुन रहे हैं जो हक़ीक़त में हो चुकी है, तो भी हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि अब क्या घटना पेश आएगी? लिहाज़ा घटना यानी event अपने अमूर्त (abstract) अर्थों में अतीत, वर्तमान या भविष्य का मोहताज नहीं होता। लेकिन सिर्फ़ इतना कह देने से अफ़साने में घटना की परिभाषा तय नहीं हो सकती। मिसाल के तौर पर घटनाओं के कुछ क्रम नीचे दिए गए हैं:

    (1) ज़ैद एक किताब पढ़ रहा था, अचानक उसके पेट में दर्द उठा, उसे ख़ून की उल्टी हुई और वह मर गया।

    (2) ज़ैद एक किताब पढ़ रहा था और सेब खा रहा था। अचानक उसके पेट में सख़्त दर्द उठा। उसे ख़ून की उल्टी हुई और वह मर गया।

    (3) ज़ैद एक किताब पढ़ रहा था और सेब खा रहा था। किताब का नाम 'तारीख़-ए-तबरी' था। अचानक उसके पेट में सख़्त दर्द उठा, उसे ख़ून की उल्टी हुई और वह तड़प-तड़प कर मर गया।

    इन तीनों इबारतों में केंद्रीय घटना एक है, यानी ज़ैद की अचानक मौत। यानी इन इबारतों में ज़ैद की मौत की सूचना दी गई है। लेकिन इनकी सूचनात्मक सामग्री बराबर नहीं है। पहली इबारत में चार सूचनाएँ हैं: ज़ैद एक किताब पढ़ रहा था, अचानक उसके पेट में दर्द उठा, उसे ख़ून की उल्टी हुई, और वह मर गया। दूसरी इबारत में एक घटना और बताई गई है, यानी ज़ैद किताब पढ़ते वक़्त सेब खा रहा था। फिर इसमें एक घटना का विवरण बढ़ा दिया गया है, यानी उसके पेट में सख़्त दर्द उठा। तीसरी इबारत में यह अतिरिक्त जानकारी दी गई है कि किताब का नाम क्या था और उसकी मौत के बारे में यह विवरण बढ़ा दिया गया है कि वह तड़प-तड़प कर मरा।

    लिहाज़ा अब हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि अगर ज़ैद की मौत केंद्रीय घटना (event) है और उसका कारण उसके पेट का दर्द है, तो बाक़ी घटनाएँ, घटनाएँ हैं कि नहीं? अगर घटना से मुराद हर वह बात है जो हुई हो, तो यक़ीनन ये सब विवरण घटना के दायरे में आते हैं। लेकिन अगर घटना से मुराद कोई केंद्रीय घटना है (यानी ऐसी घटना जिसे बयान करने के लिए कोई इबारत लिखी गई और जिसे बयान किया जाता तो इबारत अधूरी रह जाती या उससे हमें कोई सूचना मिलती। यानी यह मालूम होता कि वह इबारत क्यों लिखी गई।) तो फिर ज़ैद की मौत और उस मौत के कारण के अलावा तमाम घटनाओं पर घटना (event) शब्द का प्रयोग ग़ैर-ज़रूरी बल्कि नुक़सानदेह है।

    क्योंकि अगर सब बातें घटना हैं तो सब बातों का महत्व बराबर होना चाहिए (जैसा कि अरस्तू ने कहा है)। लेकिन हम देख रहे हैं कि इबारत नंबर एक से इबारत नंबर तीन में बयान की गई हर बात बराबर का महत्व नहीं रखती। मगर इसमें कोई शक नहीं कि नंबर एक से नंबर तीन में जो विवरण दिए गए हैं, वे असल केंद्रीय घटना (यानी उस घटना जिसे बयान करने के लिए ये इबारतें लिखी गईं) के बारे में कुछ सूचनाएँ ज़रूर मुहैया कराते हैं। ये सूचनाएँ तीन तरह की हो सकती हैं:

    (1) जिनसे असल घटना पर रोशनी पड़े, यानी जिनसे असल घटना के बारे में ऐसी बातें मालूम हों जो असल घटना के बारे में हमारी जानकारी में इज़ाफ़ा करें।

    (2) जिनसे असल घटना पर कोई रोशनी पड़े।

    (3) जिनके बारे में हम तुरंत (या शायद कभी) यह फ़ैसला कर सकें कि उनसे असल घटना पर रोशनी पड़ती है या नहीं।

    जैसा कि हम देख चुके हैं, असल घटना तो ज़ैद की मौत है। लिहाज़ा नीचे दी गई घटनाएँ महज़ सूचनाओं की श्रेणी में आती हैं:

    (1) ज़ैद एक किताब पढ़ रहा था।

    (2) ज़ैद के पेट में अचानक दर्द उठा।

    (3) दर्द बहुत तेज़ था।

    (4) ज़ैद को ख़ून की उल्टी हुई।

    (5) ज़ैद किताब पढ़ते वक़्त सेब खा रहा था।

    (6) किताब का नाम 'तारीख़-ए-तबरी' था।

    (7) ज़ैद की मौत तड़प-तड़प कर हुई।

    ज़ाहिर है ज़ैद का किताब पढ़ना और उस किताब का नाम ऐसे वाक़यात (घटनाएँ) हैं जिनसे असल वाक़ये पर ज़ाहिरी तौर पर कोई रोशनी नहीं पड़ती। ज़ैद का सेब खाना ऐसा वाक़या है जिसके बारे में हम फ़ैसला नहीं कर सकते कि इसका असल वाक़ये से कोई ताल्लुक़ है कि नहीं। अगर सेब ज़हरीला था या उसमें कोई चीज़ थी जो ख़ूनी उल्टी का सबब बन सकती तो ज़ैद का सेब खाना एक अहम बात हो सकती थी। फ़िलहाल यह जानकारी हमारे लिए बेकार मालूम होती है, लेकिन संभावना है कि यह जानकारी बेकार हो। ज़ैद की ख़ूनी उल्टी भी एक बीच की हैसियत रखती है।

    हमें यह नहीं मालूम कि ज़ैद को कोई ऐसी बीमारी थी जिसमें सेब खाना नुक़सानदेह हो सकता है और उसको खाने से ख़ून की उल्टी हो सकती है। ज़ैद की मौत हो गई। उसे क़त्ल नहीं किया गया, फाँसी पर लटकाया गया, इसलिए उसकी ख़ूनी उल्टी हमारे लिए अहम नहीं मालूम होती, लेकिन यह ज़रूर है कि इस वाक़ये का ज़िक्र मरकज़ी वाक़ये (यानी ज़ैद की मौत) में एक ख़्वाह-मख़्वाह का दर्दनाक पहलू पैदा कर देता है। लिहाज़ा यह फ़ैसला ज़ाहिरी तौर पर मुमकिन नहीं कि इस जानकारी की अहमियत क्या है? अगर किसी वाक़ये को दर्दनाक बनाकर पेश करने से उसकी क़ीमत या अहमियत में इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) हो सकता है तो ख़ूनी उल्टी की अहमियत है, वरना नहीं।

    लेकिन यह अहमियत (यानी वाक़ये का दर्दनाक होना) ख़ुद इस वाक़ये के बारे में हमारी जानकारी में कोई इज़ाफ़ा नहीं करती, क्योंकि हम यह पहले ही देख चुके हैं कि ज़ैद के पेट में अचानक दर्द उठा था और वह मर गया। जब यह बात मालूम हो गई तो यह बात भी तय हो गई कि उसकी मौत तकलीफ़ से हुई। लिहाज़ा ख़ूनी उल्टी की अहमियत संदिग्ध रहती है। यही हाल तड़प-तड़प कर मरने का है।

    इसके बारे में भी फ़ैसला उसी वक़्त मुमकिन है जब हम यह मान लें कि किसी वाक़ये की दर्दनाकी का हाल उस वाक़ये की अहमियत में इज़ाफ़ा करता है, यानी उसके बारे में हमारी जानकारी में इज़ाफ़ा करता है। अगर ऐसा है तो इस तफ़सील (विवरण) की अहमियत है कि ज़ैद तड़प-तड़प कर मरा। वरना यह मामूली बयान से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। 'दास्तान-ए-अमीर हमज़ा' में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि किसी अहम से अहम किरदार की भी मौत को बहुत विस्तार से बयान किया गया हो। दास्तान सुनाने वाले शायद इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ थे कि किसी वाक़ये का दर्दनाक विवरण वाक़ये की अहमियत या अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा नहीं करता।

    इस तरह हम यह कह सकते हैं कि चूँकि ज़ैद की मौत के बारे में वही जानकारी असल वाक़ये का दर्जा रखती है जो हमें इस वाक़ये के बारे में कोई ज़रूरी इत्तला मुहैया कराए, इसलिए ऊपर दी गई तीनों इबारतों (वाक्यों) में सिर्फ़ एक जानकारी असल वाक़ये का दर्जा रखती है, और वह यह कि ज़ैद के पेट में दर्द उठा जिसकी वजह से उसकी मौत हुई।

    इसका मतलब यह हुआ कि हमें पहले तो वाक़ये और जानकारी में फ़र्क़ करना चाहिए, फिर जानकारी के दर्जों में फ़र्क़ करना चाहिए। जानकारी देने वाले वाक़यात चूँकि मुख्य अहमियत नहीं रखते, इसलिए उनकी तरतीब (क्रम) भी अहम नहीं होती। वह जानकारियाँ जो वाक़ये पर असर डालती हैं, उनकी तरतीब अहम हो सकती है। लेकिन तरतीब की अहमियत का यह मतलब क्यों हो कि वाक़यात और जानकारियों को यूँ तरतीब दिया जाए कि उनमें इल्लत (कारण) और मालूल (प्रभाव) का ताल्लुक़ स्पष्ट हो? इसके जवाब में अरस्तू ने कहा है (और प्रिंस ने इसका अनुसरण किया है) कि हमें वही वाक़यात दिलचस्प मालूम होते हैं जिनमें इल्लत और मालूल का रिश्ता हो।

    लेकिन हम ऊपर देख चुके हैं कि ज़ैद की मौत के बारे में बहुत सी जानकारियाँ भी दिलचस्प हैं, क्योंकि उनके बारे में यह फ़ैसला नहीं कर पाते कि इन जानकारियों और असल वाक़ये में इल्लत और मालूल का ताल्लुक़ है कि नहीं। हम कुछ वाक़यात को जानकारियों की श्रेणी में रखते हैं और उनके दर्जों का अध्ययन करते हैं। हम उन जानकारियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिनके ज़रिए हमें मरकज़ी वाक़ये के बारे में, या उसकी क़ीमत के बारे में कोई फ़ायदा हासिल नहीं होता।

    जिन जानकारियों से हमें यह फ़ायदा हासिल होता है, हम उन्हें असल वाक़ये के दर्जे में रख देते हैं और जिन जानकारियों के बारे में हम दुविधा में रहते हैं, उन पर हम तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं। मरकज़ी वाक़या जितना ही अहम होगा, ऐसी दुविधा वाली जानकारियों के बारे में हमारी अटकलें भी उतनी ही तेज़, उतनी ही विस्तृत और उतनी ही पेचीदा होंगी।

    फ़र्ज़ कीजिए ज़ैद, जिसकी मौत का वाक़या हम पढ़ रहे हैं, कोई बादशाह या कोई अहम शख़्सियत था। ज़ाहिर है कि उसकी मौत भी अहम होगी। अब हम इस अटकल पर मजबूर होंगे कि क्या सेब ज़हरीला था? अगर ख़ूनी उल्टी के पदार्थ का विश्लेषण किया जाता तो क्या नतीजा निकलता? शायद यह कि ज़ैद को जिगर का कैंसर था और उसका जिगर अचानक फट गया? अगर हम अटकल लगाने में कल्पना को काम में लाएँगे तो यह भी सोच सकते हैं कि शायद तारीख़ की किताब में कोई ऐसा वाक़या था जिसने ज़ैद पर यह असर किया। हम यह भी सोच सकते हैं कि शायद किताब के पन्नों में ज़हर लगा हुआ हो वग़ैरह।

    इस अटकल की ज़िंदा मिसाल 'हैमलेट' के बारे में हमारे इस सवाल के जवाब हैं कि वह अपने हक़ हड़पने वाले चाचा Claudius को क़त्ल करने में इतनी देर क्यों करता है? इस आसान जवाब से लेकर कि अगर वह देर करे तो ड्रामा जल्द ख़त्म हो जाए, डॉक्टर जॉनसन और अर्नेस्ट जोंस और टी. एस. एलियट तक सैकड़ों जवाब दिए गए हैं, यानी सैकड़ों अटकलें लगाई गई हैं। लिहाज़ा यह बात सही नहीं कि हमें दिलचस्पी उन्हीं वाक़यात से होती है जिनमें इल्लत और मालूल का रिश्ता स्पष्ट हो। कई बार तो इल्लत (कारण) ग़ैर-अहम बल्कि लुप्त हो जाती है। इंतज़ार हुसैन के अफ़साने आख़िरी आदमी में इल्लत स्पष्ट नहीं है। लेकिन अफ़साने में इस बात की कोई अहमियत नहीं। क्योंकि अगर इल्लत महज़ इतनी है कि कुछ लोगों ने शनिवार (यौम-उस-सब्त) पर भी मछलियाँ पकड़ने का काम किया इसलिए बंदर बन गए, तो यह एक पौराणिक वाक़या है। हम इसे पहले से जानते हैं और यह भी जानते हैं कि आस्था के हिसाब से यह बिल्कुल सही और अक़्ल के हिसाब से महज़ एक मिथक है।

    दोनों सूरतों में इल्लत ग़ैर-अहम है, क्योंकि इसका ताल्लुक़ क़ायदे से है ज़रूरत से, अनिवार्यता से संभावना से। काफ़्का के अफ़साने 'Metamorphosis' में इल्लत है ही नहीं। एक शख़्स अचानक सुबह को कीड़े में तब्दील हो जाता है, या जब वह सोकर उठता है तो ख़ुद को एक कीड़ा देखता है। यह भी मुमकिन है कि वह कीड़ा हो, बल्कि वह और उसका सारा ख़ानदान किसी सामूहिक सम्मोहन का शिकार हों। इल्लत मालूम नहीं, और अगर मालूम भी हो तो अहम नहीं, मालूल (प्रभाव) सब कुछ है। (मसलन काफ़्का के अफ़साने के बारे में यह सवाल कोई नहीं करता कि ग्रेगर साम्सा (Gregor Samsa) कीड़े में क्यों और कैसे तब्दील हुआ, जबकि हैमलेट के बारे में सब पूछते हैं उसने देर क्यों की?) लिहाज़ा अरस्तू की व्यवस्था के विपरीत प्लॉट को यूँ भी बयान कर सकते हैं: ग़ैर-अहम जानकारियाँ, अहम जानकारियाँ, अस्पष्ट जानकारियाँ, वाक़या, अंजाम।

    घटना और अंजाम (नतीजे) में कोई रिश्ता ज़ाहिर हो तो कभी-कभी उलझन ज़रूर पैदा होती है। लेकिन इसकी वजह यह है कि हमने यह मान लिया है कि अंजाम उसी वक़्त सामने आता है जब वह घटना के नतीजे में हो। लातीनी कहावत Post hoc, ergo, propter hoc (इस बात के बाद, इसलिए, इस बात की वजह से) इस तार्किक भ्रम की तरफ़ इशारा करती है कि एक बात के बाद दूसरी बात हो तो दोनों में लाज़िमी तौर पर कारण और प्रभाव (कार्य-कारण) का रिश्ता होगा। इमाम ग़ज़ाली ने बहुत पहले और उनके सदियों बाद ह्यूम (David Hume) ने यह बात हमें बताई कि एक के बाद दूसरी बात हो तो उनमें लाज़िमी रिश्ता कारण और प्रभाव का नहीं होता। ग़ज़ाली के अनुसार, यह रिश्ता फ़ंक्शन (Function) का हो सकता है। कहानी (Fiction) के आलोचकों को चाहिए कि कारण और प्रभाव के पूर्वाग्रह को अपने ज़ेहनों से निकाल फेंकें।

    कहानी की बुनियादी ज़रूरत यह है कि घटना से संबंधित जो जानकारियाँ इसमें दी जाएँ, वे घटना के बारे में ही हों, चाहे वे अहम हों या ग़ैर-अहम। यह अलग बात है कि अगर बहुत सी ग़ैर-अहम जानकारियाँ जमा कर दी जाएँगी तो ख़ुद घटना की अहमियत धुँधली पड़ सकती है, लेकिन इस बात का ताल्लुक़ अफ़साने या क़िस्से की तकनीक से है, ढाँचे से नहीं। जानकारियाँ जब तक घटना से जुड़ी होंगी (चाहे वे उस घटना के बारे में हमारी मालूमात, यानी उस घटना की स्थिति तय करने में मदद करने वाले तथ्यों में इज़ाफ़ा करें या करें) अफ़साने के निर्माण में कुछ कुछ काम ज़रूर आएँगी। मिसाल के तौर पर ज़ैद की मौत की घटना में नीचे दी गई जानकारियों का इज़ाफ़ा कर लीजिए:

    ज़ैद की उम्र चालीस साल की थी। वह शादीशुदा था। मौत के वक़्त उसकी बीवी उसके पास नहीं थी लेकिन बच्चे मौजूद थे। ज़ैद को पढ़ने-लिखने से कोई ख़ास लगाव नहीं था। उसे सेब खाने का भी शौक़ था, यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था कि वह उस दिन किताब भी देख रहा था और सेब भी खा रहा था।

    इसमें कोई शक नहीं कि इन जानकारियों में कुछ ऐसी भी हैं जो जानकारी और घटना के बीच की हैं और उनके बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मसलन यह कि अगर ज़ैद को किताब पढ़ने और सेब खाने का शौक़ था तो वह उस दिन ऐसा क्यों कर रहा था? अगर उसकी उम्र महज़ चालीस साल की थी तो इसकी संभावना कम है कि उसको लिवर का कैंसर रहा हो, लेकिन यह संभावना है कि अगर वह शराबी था तो उसका लिवर ख़राब हो चुका हो वग़ैरह।

    हम यह कह सकते हैं कि ये सब अंदाज़े दुरुस्त हैं, लेकिन चूँकि ख़ुद ज़ैद की मौत (जो कि मुख्य घटना है) हमारे लिए अहम नहीं, इसलिए हम इन झमेलों में क्यों पड़ें? बात सही है, लेकिन इसका भी ताल्लुक़ अफ़साने के ढाँचे से नहीं, बल्कि उसकी सार्थकता (अर्थ) से है। अगर ज़ैद (जैसा कि हम पहले देख चुके हैं) कोई बादशाह होता या किसी भी तरह से हमारे लिए जज़्बे या तजुर्बे के स्तर पर अहम होता (जैसा कि हैमलेट है) तो हम ज़रूर अंदाज़े लगाते। मौजूदा सूरत में हमें इस बात से बहस ही नहीं कि यह अफ़साना महान है या मामूली। बहस तो सिर्फ़ यह है कि ज़ैद की मौत की घटना जिस तरह बयान हुई, उसकी बुनियाद पर वह अफ़साना या क़िस्सा है कि नहीं। ज़ाहिर है कि इसका जवाब हाँ में है, क्योंकि एक मुख्य घटना है और उसके बारे में बहुत सी जानकारियाँ हैं और इन जानकारियों के स्तर हैं, जिनके कारण हम मुख्य घटना के महत्व को पहचानने और तय करने का काम करते हैं। अफ़साना इसी को तो कहते हैं।

    अगर अफ़साने में जानकारियाँ और घटनाएँ अहम होतीं, बल्कि उनका स्पष्ट कार्य-कारण संबंध अहम होता तो हम बहुत से अफ़सानों को अफ़साना मानने से इनकार कर देते। इस वक़्त तो सूरत-ए-हाल यह है कि हम ज़ैद की मौत वाले बयान को अफ़साना मानने से इनकार कर भी दें तो मजनूँ गोरखपुरी के अफ़साने तसादुम (टकराव) को अफ़साना मानने से इनकार नहीं कर सकते, हालाँकि इसमें दो रेलगाड़ियों के टकराव का कारण यह दिखाया गया है कि स्टेशन मास्टर साहब शौच के लिए गए हुए थे और उनके मातहत ने अनजाने में दो गाड़ियों को एक साथ लाइन क्लियर दे दिया।

    यह कारण ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि हादसा ग़लती से हो गया। यानी इस कारण का दारोमदार एक ऐसी घटना पर है जो किसी तर्क पर क़ायम नहीं होती। इस बात से बहस नहीं कि तसादुम अच्छा अफ़साना है कि नहीं, क्योंकि यह बहस फिर हमें अपने मुख्य सवाल से दूर ले जाएगी कि प्लॉट के बुनियादी हिस्से क्या हैं। कौन सा प्लॉट अच्छे अफ़साने बनाता है, यह एक बेमानी सवाल है, क्योंकि यह उसी तरह का सवाल है कि कौन सा विषय अच्छे शेर को जन्म देता है।

    प्लॉट में स्पष्ट कार्य-कारण संबंध होने के बावजूद अफ़साना हमेशा क़ायम नहीं होता। इसकी दलील यह है कि वे कारण और प्रभाव जो रोज़मर्रा के अवलोकन और हक़ीक़त से ताल्लुक़ रखते हैं, उन पर हक़ीक़त का बोझ इस क़दर ज़बरदस्त होता है कि उनका अफ़सानापन ग़ायब हो जाता है और वे क़िस्से की जगह असलियत के दायरे में दाख़िल हो जाते हैं। हालाँकि सच्ची घटना अफ़साना बन सकती है, लेकिन घटना का सच्चा होना अफ़साने के लिए शर्त नहीं है, सिर्फ़ घटना का होना शर्त है। लिहाज़ा जब अफ़साने पर सच्ची घटना का गुमान इस तरह हो कि यह तो रोज़मर्रा के अवलोकन की हद में है, तो उसका अफ़साना होना संदिग्ध हो जाता है। मिसाल के तौर पर दो इबारतें (गद्यांश) देखिए:

    (1) ज़ैद जवान हुआ। उसकी दाढ़ी-मूँछें निकल आईं। उसने शेव करना शुरू कर दिया।

    (2) ज़ैद जवान हुआ। उसकी दाढ़ी-मूँछें निकल आईं। लेकिन उसने शेव करना नहीं शुरू किया।

    हम देखते हैं कि इबारत नंबर एक की तीनों घटनाओं में कारण और प्रभाव का रिश्ता है। लेकिन अफ़साना क़ायम नहीं हुआ। क्योंकि जवान होने पर शेव करने लगना रोज़मर्रा के अवलोकन की बात है, इसमें कुछ अफ़सानापन (fictiveness) नहीं है। इसके बरख़िलाफ़ इबारत नंबर दो में आख़िरी घटना (उसने शेव करना नहीं शुरू किया) पिछली किसी घटना का प्रभाव नहीं है लेकिन इसी वजह से अफ़साना क़ायम हो गया। क्योंकि एक ऐसी जानकारी दी गई जिसके बारे में अंदाज़ा लगाना मुमकिन है, महज़ इस वजह से कि वह जानकारी किसी कारण का प्रभाव नहीं है। फ़र्ज़ कीजिए यह इबारत यूँ होती:

    (3) ज़ैद जवान हुआ। उसकी दाढ़ी-मूँछें निकल आईं लेकिन चूँकि वह धार्मिक नियमों का पाबंद था इसलिए उसने शेव करना नहीं शुरू किया।

    अब कारण और प्रभाव पूरी तरह मौजूद हैं, लेकिन अफ़साना ग़ायब हो गया, क्योंकि कारण के स्पष्टीकरण ने घटना को हक़ीक़त का ऐसा रंग दे दिया कि अफ़साने के टिकने की जगह रही। लेकिन यह कहना कि प्लॉट के लिए कारण और प्रभाव का क्रम ज़रूरी नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो हम बहुत से अफ़सानों को अफ़साना मानने से इनकार कर देते, उसी तरह की दलील है कि हम उन इबारतों को स्वाभाविक और सहज तौर पर अफ़साना मान लेते हैं जिनमें यह क्रम होता है। ये दोनों तर्क कुछ तहरीरों और तक़रीरों (यानी क़िस्सों) को देखकर बनाए गए हैं। इनमें ख़राबी यह है कि इनकी तरह की कोई भी परिकल्पना (मान्यता) बनाकर ऐसे अफ़साने तलाशे जा सकते हैं जिन पर वे अफ़साने पूरे उतरते हैं। यानी ये तर्क तार्किक से ज़्यादा सहज बोध (अंतर्ज्ञान) पर आधारित हैं।

    इसलिए ज़रूरी है कि कोई ऐसी दलील भी तलाशी जाए जो कमोबेश तर्क पर आधारित हो। एक दलील तो हम देख चुके हैं कि अगर रचना में कारण स्पष्ट हो लेकिन जानकारी की बहुतायत हो तो अंदाज़ा लगाने की प्रवृत्ति पैदा होती है जो दिलचस्पी का सुबूत है। अरस्तू ने यही तो कहा था कि हमें दिलचस्पी उन्हीं घटनाओं से होती है जिनमें कारण और प्रभाव (cause and effect) का क्रम हो। जब हमने यह देख लिया कि कारण की ग़ैर-मौजूदगी, लेकिन जानकारी की बहुतायत भी दिलचस्पी पैदा कर सकती है तो हमारी दलील क़ायम हो गई। लेकिन इस एक दलील के अलावा भी कुछ और दलीलें मुमकिन हैं। अगर इस मान्यता (यानी प्लॉट में कारण और प्रभाव होना चाहिए) को तय करने के लिए जिस तरीक़े को काम में लाया गया है, उसकी जाँच की जाए।

    इस तरीक़े को कार्ल पॉपर ने जौहरियत (Essentialism) का नाम दिया है। अफ़लातून (Plato) और अरस्तू दोनों का ख़याल था कि ज्ञान और राय में फ़र्क़ है। चीज़ों के सार (essence) को जानना ज्ञान है और चीज़ों के बारे में जानना कि वे किस वक़्त कैसी नज़र आती हैं, महज़ राय है। चीज़ों का सार जानना एक तरह की ईश्वरीय देन और अंतर्ज्ञान (intuition) की बात है, क्योंकि हमारा ज्ञान ऐसा नहीं है जिसे तर्क या अवलोकन (observation) के ज़रिए साबित किया जा सके। अरस्तू का ख़याल था कि चीज़ों के सही नाम बयान करना मानो उनके सार को बयान करना है। इसीलिए उसने कहा कि असली ज्ञान और चीज़ एक ही बात हैं। यानी चीज़ों का ज्ञान उनसे अलग कोई चीज़ नहीं है। अगर चीज़ों की परिभाषा तय कर दी जाए तो उनका ज्ञान भी हासिल हो जाएगा।

    इसका नतीजा यह हुआ कि अरस्तू की नज़र में सारा ज्ञान परिभाषाओं पर आधारित हुआ और परिभाषाएँ बयान करना तर्क से ज़्यादा अंतर्ज्ञान का काम है। इसलिए उसने त्रासदी (Tragedy) की परिभाषा यह तय की कि वह एक ऐसे काम का प्रतिनिधित्व है जो गंभीर ध्यान के लायक़, अपने आप में मुकम्मल और एक ख़ास आकार रखने वाला है। और चूँकि त्रासदी इंसानों का नहीं बल्कि किसी काम और ज़िंदगी का चित्रण करती है। और इसका मक़सद घटनाओं और प्लॉट को पेश करना है। इसलिए प्लॉट के बिना त्रासदी क़ायम नहीं हो सकती।

    इस तरीक़े की ख़राबी उस वक़्त ज़ाहिर होती है जब यह सवाल उठाया जाए कि अरस्तू की यह परिभाषा किस सवाल के जवाब में है? ज़ाहिर है कि वह सवाल है, त्रासदी क्या है? इसके मायने यह हुए कि फ़लाँ चीज़ क्या है? का जवाब हम जो चाहें दे सकते हैं और कह सकते हैं कि जो चीज़ हमारी परिभाषा पर पूरी नहीं उतरती, वह चीज़ नहीं है जिसकी हम परिभाषा दे रहे हैं। मसलन सवाल यह हो कि बिल्ली क्या है? तो हम जवाब में कह सकते हैं कि बिल्ली वह चीज़ है जो हवा में उड़ती है। अब अगर हमें कोई ऐसी बिल्ली दिखाई जाए जो हवा में उड़ती हो तो हम कह सकते हैं कि हमारी परिभाषा के हिसाब से यह बिल्ली नहीं है। इस तरह परिभाषा और परिभाषित चीज़ के बीच कोई रिश्ता बाक़ी नहीं रह जाता और परिभाषा महज़ एक विश्वास बनकर रह जाती है।

    प्लॉट क्या है? के जवाब में अरस्तू को मानने वाले कहते हैं कि प्लॉट वह चीज़ है जिसकी घटनाओं में कारण और प्रभाव का संबंध हो। इसलिए हर वह चीज़ जिसमें कारण और प्रभाव का संबंध हो, प्लॉट की परिभाषा से बाहर हो जाती है। इसलिए तरीक़ा यह नहीं होना चाहिए कि क्या है? वाले सवाल उठाए जाएँ। बल्कि यह होना चाहिए कि क्या काम करता है? वाले सवाल उठाए जाएँ। इस तरीक़े की अहमियत और सच्चाई उस वक़्त ज़ाहिर होती है जब हम बिजली क्या है? और बिजली क्या काम करती है? इन दो सवालों के जवाब तलाश करना शुरू कर दें। ज़ाहिर है कि बिजली क्या है? का जवाब जो भी दिया जाएगा, वह या तो बेमानी होगा या झूठ होगा। इसीलिए बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने कहा था कि बिजली कोई चीज़ नहीं है, बल्कि एक स्थिति है।

    यह कहा जा सकता है कि जो सवाल विज्ञान के मसलों से जुड़े हैं, उनको साहित्य या दर्शन पर लागू करना ठीक नहीं। लेकिन यह सवाल इस ग़लतफ़हमी पर आधारित है कि विज्ञान के मसले पर छानबीन ऐसे तथ्यों को खोज सकती है जिनका खंडन किया जा सके, जबकि दार्शनिक मसलों की स्थिति ऐसी नहीं है। हक़ीक़त यह है कि वैज्ञानिक मसलों के हल भी अंतिम और पक्के नहीं होते। फ़िलहाल इसके विस्तार में जाने का मौक़ा नहीं है, लेकिन यह कहना ज़रूरी है कि हर तरह के मसलों पर छानबीन का तरीक़ा बुनियादी तौर पर एक ही होना चाहिए।

    इसलिए प्लॉट के बारे में सवाल अगर यह हो कि प्लॉट क्या करता है? तो जवाब यही मिलेगा कि घटनाओं को इस तरह बयान करता है कि दिलचस्पी पैदा हो। इस जवाब की रोशनी में और भी सवाल क़ायम हो सकते हैं। इसके बरख़िलाफ़ अरस्तू का तरीक़ा चक्करदार (circular) होने की वजह से ऐसी परिभाषा निकालता है जो हर उस चीज़ को ख़ारिज कर देती है जिस पर इस परिभाषा को लागू किया जा सके। उसे इससे कोई मतलब नहीं कि जिन चीज़ों पर इसे लागू नहीं किया जा सकता, उनको बाहर कर देने से परिभाषा के बेमानी हो जाने की संभावना है।

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