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संपूर्ण
परिचय
ई-पुस्तक437
लेख54
कहानी4
उद्धरण24
साक्षात्कार10
शेर1
ग़ज़ल20
नज़्म17
ऑडियो 1
वीडियो30
गेलरी 22
रुबाई9
ब्लॉग2
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी के लेख
हमारी क्लासिकी ग़ज़ल की शेअ'रियात: कुछ तंक़ीदी कुछ तारीख़ी बातें
क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल की शेरियात (काव्यशास्त्र) जिन धारणाओं पर क़ायम है, उन्हें मोटे तौर पर दो प्रकारों में बांटा जा सकता है। एक वो जिनकी प्रकृति इल्मियाती (एपस्टेमोलॉजिकल) है, यानी ये धारणाएं इस सवाल पर आधारित हैं कि शेर से हमें क्या हासिल होता है? दूसरे
नज़्म क्या है?
इस सवाल का मक़सद यह मालूम करना नहीं है कि वह चीज़ क्या है जिसे नज़्म (यानी पद्य रचना) कहते हैं। यानी इस सवाल का मक़सद यह नहीं है कि नज़्म की वजूदियात (Ontology) से बहस की जाए। नज़्म बा-मानी (अर्थपूर्ण) होती है कि नहीं? नज़्म के मानी इसके अंदर होते हैं
उर्दू लुग़ात और लुग़त-निगारी
अस्करी साहब मरहूम ने एक बार मुझे लिखा था कि कभी-कभी हमें ड्रामे से लेकर ऑडेन (W.H.Auden) तक दस के दस पर्चे एम.ए. की क्लासों को पढ़ाने पड़ते हैं। यह पढ़कर मुझे उनके और उनके मरहूम उस्ताद प्रोफ़ेसर एस.सी. देब (S.C.Deb) याद आए, जो हर वह विषय पढ़ा दिया करते
नस्री नज़्म या नस्र में शायरी
एक शायर की हैसियत से अपने आप को दोहराना और एक आलोचक की हैसियत से अपना हवाला ख़ुद देना मुझे बहुत बुरा लगता है। लेकिन इस वक़्त बात ही ऐसी आ पड़ी है कि मुझे अपनी कही हुई बातें दोहरानी पड़ रही हैं। कुछ लोगों का ख़याल है कि मैं नस्री नज़्म (गद्य कविता) के
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी शुमार-ए-सुबहा मरग़ूब-ए-बुत-ए-मुश्किल-पसंद आया तमाशा-ए-ब-यक-कफ़ बुर्दन-ए-सद-दिल पसंद आया ग़ालिब के बारे में ज़ौक़ ने कहा था कि मिर्ज़ा नौशा को अपने अच्छे शेरों की ख़बर भी नहीं होती। बात तक़रीबन सही है, लेकिन ग़ालिब को
अकबर इलाहाबादी, नौ-आबादियाती निज़ाम और अह्द-ए-हाज़िर
1 / 4 अकबर इलाहाबादी के बारे में कुछ बातें आम हैं। हम उन्हें दो हिस्सों में बांटकर संक्षेप में इस तरह बयान कर सकते हैं: (1) अकबर तंज़ और मिज़ाह (व्यंग्य और हास्य) के बड़े शायर थे। (2) वह आज़ादी पसंद थे। (3) उन्होंने अंग्रेज़ों के विरोध में झंडा तो
अदबी तख़लीक़ और अदबी तन्क़ीद
रचना और आलोचना के आपसी संबंध, उनके बीच के अस्तित्वगत तनाव और खुद आलोचक के पद के बारे में कुछ सवाल पिछले चालीस सालों में हमारे यहाँ कई बार उठे या उठाए गए हैं। इन सवालों को संक्षेप में इस तरह बयान किया जा सकता है: (1) क्या आलोचना का दर्जा रचना से ऊँचा
शायरी का इबतिदाई सबक़
पहला हिस्सा (1) मौज़ूं (लयबद्ध), नामौज़ूं (लयहीन) से बेहतर है। (1) (अलिफ़) चूँकि नस्री नज़्म (गद्य कविता) में मौज़ूनियत (लय) होती है, इसलिए नस्री नज़्म, नस्र (गद्य) से बेहतर है। (2) इंशा (रचनात्मक अभिव्यक्ति), ख़बर (सूचना) से बेहतर है। (3) किनाया (संकेत),
अलामत की पहचान
तख़्लीक़ी (रचनात्मक) ज़बान चार चीज़ों से मिलकर बनी है: तश्बीह (उपमा), पैकर (बिंब), इस्तिआरा (रूपक) और अलामत (प्रतीक)। इस्तिआरा और अलामत से मिलती-जुलती और भी चीज़ें हैं, मसलन तमसील (Allegory), आयत (Sign), निशानी (Emblem) वग़ैरह। लेकिन ये तख़्लीक़ी ज़बान
प्लॉट का क़िस्सा
अफ़साने पर सैद्धांतिक बहस की शुरुआत अरस्तू से होती है। चूँकि त्रासदी (Tragedy), कॉमेडी (Comedy) और अफ़साना, तीनों में घटनाओं का बयान होता है, इसलिए त्रासदी और कॉमेडी में घटनाओं के बारे में अरस्तू ने जो कुछ कहा, उसे अफ़साने के लिए भी सही मान लिया गया।
मग़रिब में जदीदियत की रिवायत
किपलिंग का बदनाम कथन "पूरब पूरब है और पश्चिम पश्चिम, और दोनों का कोई मिलन बिंदु नहीं है।" हिंदुस्तान और यूरोप दोनों के बुद्धिजीवियों की आलोचना का निशाना रहा है और इसमें कोई शक नहीं कि जिस भावना के तहत यह बात कही गई वह यक़ीनन आपत्तिजनक थी, लेकिन किपलिंग
इंसानी तअ'ल्लुक़ात की शाइ'री
मीर की ज़बान के इस संक्षिप्त विश्लेषण और ग़ालिब के साथ तुलना से यह बात ज़ाहिर हो जाती है कि मीर और ग़ालिब की भाषा में समानता है और नहीं भी। भाषा के इस्तेमाल से हट कर देखिए तो भी समानता के कुछ पहलू नज़र आते हैं। ऊपर मैंने अर्ज़ किया है कि मीर के बाद ग़ालिब
कुछ उर्दू रस्म-उल-ख़त के बारे में
यह हमारी ज़बान की बदनसीबी ही कही जाएगी कि इसकी लिपि बदलने के प्रस्ताव बार-बार उठते हैं, मानो लिपि न हुई, बदनामी का ऐसा दाग़ हुआ कि इससे जल्द-से-जल्द छुटकारा पाना बहुत ज़रूरी हो। कभी इसके लिए रोमन लिपि का प्रस्ताव रखा जाता है, कभी देवनागरी और अफ़सोस की
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर कि ग़ालिब?
इस बात को स्वीकार करना ज़रूरी है कि हमने अभी मीर के साथ इंसाफ़ नहीं किया। आल अहमद सुरूर, मजनूं गोरखपुरी, गोपी चंद नारंग और मोहम्मद हसन अस्करी के इक्का-दुक्का लेखों और असर लखनवी के पुरज़ोर बचाव और वकालत के सिवा मीर-शनासी (मीर को समझने की परंपरा) का दामन
ग़ज़ल की शेअरियात: फ़िराक़ और अहमद मुश्ताक़ का मुहाकिमा
मेज़बान: हमीद क़ैसर, सुहैल अहमद ज़ैदी रिपोर्ट: अहमद महफ़ूज़ शायद 1986 की बात है कि जनाब हमीद क़ैसर के घर पर इदारा-ए-फ़न-ओ-अदब, इलाहाबाद की एक ख़ास बैठक आयोजित हुई। इसके आयोजन की एक ख़ास वजह थी। फ़िराक़ साहब का इंतिक़ाल 1982 में हो चुका था और उनकी याद
ग़ालिब और मीर: मुताले’ के चंद पहलू
ग़ालिब ने मीर से बार-बार फ़ायदा उठाया है। यह इस बात का सबूत है कि ग़ालिब और मीर एक ही तरह के शायर थे। यानी दुनिया के कुछ नज़ारों और ज़िंदगी के कुछ तजुर्बों को शेर में ज़ाहिर करने के लिए दोनों एक ही तरह के साधन इस्तेमाल करना पसंद करते थे। इसका मतलब यह
मीर की शख़्सियत: उनके कलाम में
शायरी के बारे में हमारे यहाँ यह ख़याल आम है कि यह शायर की शख़्सियत (व्यक्तित्व) को व्यक्त करती है। इसे तरह-तरह से बयान किया गया है। मसलन नूरुल हसन हाशमी ने कहा कि शायरी या कम से कम "सच्ची" शायरी "दाख़िली" (आंतरिक) चीज़ है। लिहाज़ा जिस शायरी में शायर की "दाख़िली
उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़
(रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी, 1896 ई. से 1982 ई.) फ़िराक़ साहब की मौजूदा इज़्ज़त और शोहरत को देखते हुए उनके बारे में कोई मतभेद की बात कहना बर्र के छत्ते को छेड़ने जैसा है। मैं अपने बचाव में यही कह सकता हूँ कि मैं यह काम फ़िराक़ साहब के जीवन में भी
अफ़साने में बयानिया और किरदार की कश्मकश
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी नए अफ़साने के बारे में आम तौर पर इस चिंता का इज़हार किया जाता है कि इसको रिवायत (परंपरा) से बिना वजह का बैर है, इसमें रिवायत तोड़ने का रुझान है, बल्कि इसे रिवायत तोड़ने की बीमारी है। इसमें बयानिया (कथा) की रिवायती खूबियां नहीं हैं,
मुक़द्दमा-ए-दीवान-ए-चिर्कीन
हम में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने लड़कपन में चिरकीन के दो-चार शेर न सुने हों। कुछ ऐसे भी होंगे (मैं भी उनमें शामिल हूँ) जिन्होंने एक-दो शेर चिरकीन के याद भी कर लिए होंगे, लेकिन चिरकीन के और कलाम की तलाश शायद दो-चार लड़कों या बुज़ुर्गों ने भी न की हो। इसकी
उर्दू शायरी पर ग़ालिब का असर
बड़ा शायर अपना कोई स्कूल (परंपरा) कायम नहीं करता, यह बात अजीब ज़रूर है लेकिन इतनी अजीब नहीं जितनी यह हक़ीक़त कि बड़े शायर की आँख बंद होते ही शायरी की जो शैली उभरती है, वह उसकी शैली के लगभग उलट होती है, और अगर उलट नहीं होती तो उससे बिल्कुल अलग ज़रूर होती
क्या नज़रियाती तन्क़ीद मुम्किन है?
आलोचना (तनक़ीद) क्या है? इस सवाल का जवाब शायद बहुत संतोषजनक न हो, लेकिन आलोचना क्या नहीं है? इसका जवाब यक़ीनन संतोषजनक और काफ़ी हद तक निश्चित हो सकता है। आलोचना सामान्य और सरसरी तौर पर राय ज़ाहिर करना नहीं है। अनिश्चित और गोल-मोल बात कहना आलोचक (नक़्क़ाद)
मीर की ज़बान, रोज़-मर्रा या इस्तिआरा (1)
मीर के बारे में यह ग़लतफ़हमी, कि वह ख़ालिस ज़बान या रोज़मर्रा के शायर हैं, कई वजहों से आम हुई। पहली बात तो यह कि मीर और उनके कुछ समकालीनों में एक तरह की सतही और लाज़िमी समानता तो है ही, क्योंकि बहरहाल इन सभी शायरों की बुनियादी ज़बान एक जैसी थी। दूसरी
तारीख़, अ़क़ीदा और सियासत
इतिहास, मान्यता और राजनीति शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी पुराने ज़माने में 'उर्दू' नाम की कोई ज़बान नहीं थी। जो लोग 'क़दीम उर्दू' (पुरानी उर्दू) शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वे भाषाई और ऐतिहासिक लिहाज़ से ग़लत शब्द बरतते हैं। इसके अलावा यह भी है कि 'क़दीम
शुरूआत, वक़्फ़े, क़ियासात
शुरुआत, वक़्फ़े, क़यास शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी 1 / 6 उर्दू अदब की बाक़ायदा शुरुआत का सेहरा मसूद साद सलमान लाहौरी (1046 ई. से 1121 ई.) के सर बांधा जा सकता है, लेकिन उस "हिंदी" दीवान का अब कोई सुराग़ नहीं मिलता जिसे मसूद साद सलमान ने संकलित किया था। इस
तारीख़ की ता'मीर-ए-नौ, तहज़ीब की तशकील-ए-नौ
'हिंदी/उर्दू' के शब्द कब और किस तरह चलन में आए, उनके बारे में किस-किस तरह के मिथक गढ़े गए और उनकी असल, ऐतिहासिक स्थिति क्या है, इन बातों का ऊपर दिया गया संक्षिप्त बयान ज़रूरी था। इसकी वजह यह है कि आज बहुत से विद्वान यह मानते हैं कि वह ज़बान जिसे आज हिंदी
सादगी, असलीयत और जोश
हाली ने नई शायरी की इमारत जिन बुनियादों पर खड़ी करनी चाही थी, उन्हें तखय्युल (कल्पना), सादगी, असलियत और जोश का नाम दिया जा सकता है। तखय्युल के बारे में आम तौर पर मालूम है कि इस विषय में हाली के विचार कोलरिज से लिए गए हैं, हालाँकि हाली ने कोलरिज का नाम
साहेब-ए-ज़ौक़ क़ारी और शे'र की समझ
क्या कोई पाठक सही मायनों में साहिब-ए-ज़ौक़ हो सकता है? मुझे अफ़सोस है कि इस सवाल का जवाब ना में है। क्या किसी ऐसे पाठक का वजूद मुमकिन है जिसकी शेर-फ़हमी पर हम सबको, या अगर हम सबको नहीं तो हम में से ज़्यादातर लोगों को भरोसा हो? मुझे अफ़सोस है कि इस सवाल
दरयाफ़त और बाज़याफ़्त: तर्जुमे का मुआमला
अनुवाद के बारे में सवालों और मसलों का गहरा संबंध भाषा के मूल और स्वरूप के बारे में सवालों से है। अगर कोई ऐसी एक प्राचीन भाषा नहीं थी जिसे हम सभी भाषाओं की माँ कह सकें और अगर हर भाषा अपनी जगह बेजोड़ और अद्वितीय है, तब तो अनुवाद असंभव है। चूँकि एक भाषा
उर्दू और इसका रस्म-उल-ख़त: एक मुबाहिसा
'शबख़ून' के अंक 250 में लेख "कुछ उर्दू रस्म-उल-ख़त (लिपि) के बारे में" पढ़ने को मिला। पूरा लेख पढ़ा और पढ़ने के बाद बस एक ख़याल ने चंद वाक्य लिखने पर मजबूर किया। बक़ौल फ़ैज़, वो बात जिसका फ़साने में कोई ज़िक्र न था वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है मैं
वली नाम का एक शख़्स
1966 में लगाए गए एक अंदाज़े के मुताबिक़, उस वक़्त दीवान-ए-वली के 65 नुस्खे (पांडुलिपियाँ) ऐसे मौजूद थे जिनमें लिखने की तारीख़ दर्ज थी। और 53 ऐसे थे जिनमें लिखने की तारीख़ नहीं थी। इनके अलावा, 33 ऐसी हस्तलिखित बयाज़ें (नोटबुक) मौजूद थीं जिनमें वली के
चंद कलमे बयानिया के बयान में
मुमताज़ शीरीं ने अपना बेमिसाल मज़मून "तकनीक की विविधता, नॉवेल और अफ़साने में" यूँ शुरू किया था, "उर्दू के अच्छे अफ़सानों में यूँ ही चंद चुन लीजिए, 'आनंदी', 'हरामजादी', 'हमारी गली', 'शिकवा शिकायत।' ये किस तकनीक में लिखे गए हैं? बयानिया (नैरेटिव)। ठीक!
फ़ैज़ और क्लासिकी ग़ज़ल
फ़ैज़ की ग़ज़ल का ज़िक्र करते वक़्त आम तौर पर जो बात सबसे पहले कही जाती है, वह यह है कि फ़ैज़ ने क्लासिकी प्रतीकों (अलामतों) को नए अर्थ और नई सार्थकता दी। यह भी कहा गया कि फ़ैज़ की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनके काम करने के तरीक़े में है, जिसके कारण
जदीद शेरी जमालियात
खाली मैदान में अगर कुत्ता भी गुज़रे तो लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ चला जाता है। (वैलेरी) अगर पुरानी शेरी जमालियात (काव्य-सौंदर्यशास्त्र) रद्द हो चुकी है तो मैदान खाली है। ऐसी सूरत में इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि हर वह चीज़ जो उसकी जगह भरने के लिए
हमारी शायरी पर एक नज़र-ए-सानी
नीमा रहनुमाए मन अस्त, अम्मा मन साख्ता-ए-ख़ुदम फ़ुरोग़ फ़र्रुख़ज़ाद इस वक़्त बिल्कुल याद नहीं कि मसूद हसन रिज़वी अदीब का नाम पहली बार कब सुना था। यह ज़रूर कह सकता हूँ कि हाली और मुहम्मद हुसैन आज़ाद की तरह मसूद हसन रिज़वी अदीब का नाम भी मेरे ज़ेहन में
उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़, पस-नविश्त
कोई ढाई-तीन साल हुए जब मैंने अपना लेख "उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़" कराची के "नया दौर" में छपने के लिए भेजा तो जमील जालबी ने मुझसे कहा कि लेख छप तो जाएगा लेकिन इसके छपने के बाद जो हंगामा उठेगा और लेख के बारे में जो कुछ लिखा जाएगा, उसका सामना करने
मीर साहब का ज़िंदा अजाइब घर, कुछ ताज्जुब नहीं ख़ुदाई है
मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने मीर के बारे में एक वाक़िया लिखा है कि उन्होंने अपने घर के बारे में एक दोस्त से कहा कि मुझे ख़बर नहीं कि इसमें कोई पायीं बाग़ (छोटा बाग़) भी है। यह वाक़िया बहुत मशहूर है लेकिन इसे मुहम्मद हुसैन आज़ाद के रंगीन और सुंदर शब्दों में सुना जाए
क्या नक़्क़ाद का वजूद ज़रूरी है?
आलोचना में कोई किसी के बराबर या हमसफ़र होता है या हो सकता है, यह बात बड़ी संदिग्ध है। कुछ लोग जो आलोचकों से या आलोचनाओं से नाराज़ हैं, वे तो यह कहते हैं कि जिससे रचना न बन पड़े वह आलोचना की दुकान खोलता है। अगर यह सही है तो फिर बराबरी या हमसफ़री का क्या
अफ़साने की हिमायत में (१)
बात यह है राम लाल साहब कि इन मामलों पर सबसे मुनासिब राय देने के लिए मुझसे बेहतर लोग इस वक़्त मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आपने हैरी टी. मूर (Harry T. Moore) की किताब "बीसवीं सदी का फ्रांसीसी साहित्य" देखकर मुझसे पूछा है कि इसमें अफ़सानानिगारों का ज़िक्र क्यों
अफ़साने में कहानी-पन का मसअला
अगर किसी अफ़साने में कहानीपन हो तो क्या वह अफ़साना दिलचस्प हो जाता है? अगर इस सवाल का जवाब "हाँ" है, तो कहानीपन और दिलचस्पी एक ही चीज़ के दो नाम ठहरते हैं। या अगर वे एक ही चीज़ नहीं हैं तो लाज़िम और मलज़ूम (एक-दूसरे के लिए ज़रूरी) ज़रूर बन जाते हैं।
ग़ालिब की मीरी
ग़ालिब ने मीर से बार-बार फ़ायदा उठाया है। यह इस बात का सुबूत है कि ग़ालिब और मीर एक ही तरह के शायर थे, यानी दुनिया के कुछ नज़ारों और ज़िंदगी के कुछ तजुर्बों को शेर में ज़ाहिर करने के लिए दोनों एक ही तरह के साधन इस्तेमाल करना पसंद करते थे। इसका मतलब यह
क़िराअत, ताबीर, तन्क़ीद
पठन और आलोचनात्मक पठन हम साहित्य के आम पाठक हों या आलोचक, दोनों ही रूपों में हम किसी कलाकृति (फ़न पारे) के बारे में यही कहते हैं कि हर कलाकृति व्याख्या (ताबीर) की मांग करती है, लेकिन हमारा यह कहना काफ़ी नहीं है। इस कथन, या इस दावे के साथ यह भी कहना
नज़ीर अकबराबादी की कायनात
मैं यह बात शुरू में ही साफ़ कर देना चाहता हूँ कि मैं नज़ीर को बड़ा शायर नहीं समझता। अच्छा शायर भी नहीं समझता। वह एक अहम, दिलचस्प और पढ़ने लायक़ शायर ज़रूर हैं लेकिन अच्छी या बड़ी शायरी उनके दायरे से बाहर है। शायद उन्होंने शायरी को संजीदगी से बरता नहीं,
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