मोसव्वेरी
मुसलमानों ने मूर्ति बनाने बल्कि हर जानदार की तस्वीर बनाने से परहेज़ किया है, लेकिन चित्रकारी को उन्होंने हमेशा ख़ुशी और अपनी बात समझाने के आसान तरीक़े का ज़रिया माना है। इसीलिए न सिर्फ़ चित्रकारी को संक्षेप में अपनाया, बल्कि उसे कमाल की हद तक पहुँचाया है। मुसलमानों का सौंदर्य का नज़रिया पूरी दुनिया से बहुत ऊँचा और श्रेष्ठ रहा है।
मुसलमानों के शुरुआती दौर में बनू उमय्या के ख़लीफ़ाओं के ज़माने में... विजयों से इस्लामी सल्तनत का विस्तार हुआ। उस वक़्त ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक बिन मरवान ने ससानी और बाज़ंतीनी (साम्राज्यों) पर अपना सिक्का जारी किया, जिस पर उसकी तस्वीर थी, जिसे उस वक़्त हालात के लिहाज़ से ज़रूरी समझा गया था। 'तबाक़ात' के लेखक इब्न साद के अनुसार, क़ाज़ी शुरैह की मुहर पर दो शेर और बीच में पेड़ उकेरे हुए थे। इस शुरुआती दौर में महज़ सौंदर्य के तौर पर ख़ुशी और आनंद पाने के लिए कपड़ों और बर्तनों पर कई तरह के रंगों से नक़्क़ाशी की जाती थी। उस ज़माने की नक़्क़ाशी के अध्ययन से हम आज उस ज़माने की सभ्यता और रहन-सहन का पता लगाते हैं।
मुसलमानों ने चित्रकारी वाली इन चीज़ों की सौंदर्य संबंधी ख़ूबियों के लिहाज़ से इनके नाम भी रखे। यानी 'मिर्त मरहल' उस चादर को कहा जाता था, जिस पर मुज्मल और आदमियों की तस्वीरें हों। 'शजराफ़' और 'सिजलात' वग़ैरह उन चादरों को कहा जाता था, जिन पर पेड़ों और गहनों की तस्वीरें हों। महलों के नाम भी उनकी सौंदर्य की ख़ूबियों और नक़्क़ाशी के हिसाब से रखे जाते थे। मुसलमानों ने फ़ज़दीन शहर में जब शुरुआती दौर में पहली मस्जिद बनाई, तो उसके लिए ऐसे खंभे इस्तेमाल किए जिनके सिरों पर बैलों के नक़्श थे। इसकी इसी ख़ूबी की वजह से इसका नाम 'मस्जिद-ए-सौर' यानी बैलों वाली मस्जिद रख दिया गया था।
मुसलमानों ने ऐसे सुंदर माहौल के सौंदर्य संबंधी प्रभावों को दिमागी परेशानी का इलाज भी माना है, जिसके कई ऐतिहासिक सुबूत मिलते हैं। मिसाल के तौर पर, हकीम बदरुद्दीन क़ाज़ी बालबकी ने अपनी किताब 'मुफ़र्रेह-उन-नफ़्स' में बयान किया है कि उस समय के सभी वैद्यों, हकीमों और विद्वानों की इस बात पर सहमति है कि ख़ूबसूरत और नाज़ुक तस्वीरों को देखने से मन को एक तरह की ख़ुशी और आनंद मिलता है, और इनसे उदासी की बीमारियाँ और परेशान करने वाले विचार दूर होते हैं। इसीलिए मध्य पूर्व में जब हमाम (स्नानघर) बनाए गए, तो उनकी दीवारों पर नाज़ुक तस्वीरें बनाई जाती थीं। मसलन, इन हमामों की दीवारों पर इश्क़िया नज़ारों, हसीन तस्वीरों और जंगली जानवरों के शिकार के दृश्य होते थे।
हकीम राज़ी ने लिखा है कि अगर बनाई गई आकृतियों में अनुपात और मात्रा का ध्यान रखकर उन्हें आँखों को भाने वाले रंगों, मसलन लाल, हरे, पीले और सफ़ेद रंगों से रंगा जाए, तो वे यक़ीनी तौर पर फ़ायदेमंद साबित होंगी। वे सभी चिंताओं और दुखों को दूर करेंगी और ख़ुशी का माहौल बनाएँगी। क्योंकि इंसान का मन इस तरह की ख़ूबसूरत तस्वीरों को देखकर आनंदित होता है।
हमारी चित्रकारी का सौंदर्यवादी इतिहास बहुत दिलचस्प है और हमारी चित्रकारी हमारी संस्कृति का बहुत अहम अध्याय है। हम यहाँ संक्षेप में चित्रकारी के क्षेत्र में मुसलमानों के बड़े-बड़े कारनामों को सौंदर्य के नज़रिए से बयान करते हैं, जिसे आज यूरोप में आम तौर पर 'मिनिएचर पेंटिंग' (लघु चित्रकला) कहा जाता है।
मुसलमानों ने पहली सदी हिजरी में पूरे मध्य पूर्व, निकट पूर्व और मध्य एशिया को जीत लिया था। मुसलमानों की फ़ौजों के अमीर ज़ियाद बिन सालेह ने जब 58 ई. में समरकंद को जीता, तो इस लड़ाई के क़ैदियों में कुछ चीनी क़ैदी भी हाथ आए। उनमें से कुछ काग़ज़ बनाना भी जानते थे, जिनसे यूसुफ़ बिन अम्र अरब ने काग़ज़ बनाना सीखा, जिसे मक्का में 'क़िरतास' का नाम दिया गया। उस वक़्त से मसौदों (पांडुलिपियों) को काग़ज़ पर लिखना शुरू किया गया।
यह ज़ाहिर है कि सबसे पहले मुसलमानों के सामने क़ुरआन-ए-करीम की हिफ़ाज़त उनके ईमान का हिस्सा था। और महज़ इसे लिखा ही नहीं गया, बल्कि इसे सजाया और इस पर नक़्क़ाशी की गई, जो मुसलमानों की चित्रकारी के जज़्बे का साफ़ सुबूत है। चुनांचे इब्न मरयम ने जहाँ क़ुरआन-ए-करीम के शुरुआती कातिबों (लिखने वालों) का ज़िक्र किया है, वहीं उन लोगों का भी ज़िक्र किया है जो क़ुरआन-ए-करीम को सुनहरे रंगों से सजाते थे। इनमें से इब्राहीम अस-सग़ीर, अबू मूसा बिन अम्मार अल-क़तनी, मुहम्मद बिन मुहम्मद अबू अब्दुल्लाह अल-ग़ज़ाई वग़ैरह काफ़ी मशहूर हुए हैं। इनमें से ज़्यादातर हाफ़िज़-ए-क़ुरआन (क़ुरआन ज़बानी याद रखने वाले) होते थे और क़ुरआन को लिखना, उस पर नक़्क़ाशी करना और उसे सुनहरे रंगों से सजाना अपनी आख़िरत (परलोक) की पूँजी मानते थे। यही वजह थी कि वे बहुत शौक़ और पूरे दिलो-दिमाग़ से इस काम को अंजाम देते थे।
मुसलमानों ने सौंदर्य के लिहाज़ से इस तरह के नक़्श-ओ-निगार (सजावट) में एक ख़ास पहचान बनाई है, जिसे आज यूरोप में एकमत होकर 'अराबेस्क' (Arabesque) कहते हैं और चित्रकारी की दुनिया में इसे एक मानी हुई नई खोज समझा जाता है। इसी ज़माने के थोड़ा बाद वह ज़माना आया जब मुसलमानों ने अपनी इल्मी (ज्ञानवर्धक) किताबों को और ज़्यादा फ़ायदेमंद बनाने के लिए उनमें चित्र बनाने की तरफ़ ध्यान दिया, क्योंकि इसके बिना उन्हें समझना थोड़ा मुश्किल था।
हालाँकि तस्वीर बनाना एक ग़ैर-इस्लामी काम है, मगर इल्मी (शैक्षणिक) मैदान में इसकी ज़रूरत महसूस करके चिकित्सा, भूगोल, क़िरात, गणित, खगोल विज्ञान, यांत्रिकी (इल्म-ए-जरसक़ील) और संगीत की किताबें लिखी गईं। इसके साथ ही इनकी पांडुलिपियाँ बेहतरीन चित्रकारी और जिल्दसाज़ी के साथ तैयार की गईं, जो बहुत बड़ा कारनामा था। अगर हम उस दौर की किसी किताब को, जो इन विषयों से ताल्लुक़ रखती है, उठाकर देखें तो अक़्ल हैरान रह जाती है कि उस शुरुआती ज़माने में मुसलमानों ने इस कला को कितनी ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। इन पांडुलिपियों की उपयोगिता एक माना हुआ कारनामा गिनी जाती है। किताबों के चित्रकारी वाले पन्नों का नज़ारा उनकी सौंदर्यवादी अहमियत में चार चाँद लगा देता है।
अरब चिकित्सा में हसन बिन इसहाक़ (मृत्यु 298 हिजरी) की 'किताब-उल-ऐन' के चित्रकारी वाले नुस्ख़ों (प्रतियों) का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया जाता है, जो बहुत अहम माने जाते हैं। इसी तरह युद्ध कला या सिपहगिरी में 'किताब-उल-अमत्सक़ फ़िल मजानीन' के चित्रकारी वाले नुस्ख़े को ऐतिहासिक अहमियत हासिल है। इन दो मिसालों से यह साबित करना है कि ऐसी इल्मी किताबों की उपयोगिता को और ज़्यादा फ़ायदेमंद और अहम बनाने के लिए उनमें चित्र बनाना ज़रूरी ही नहीं, बल्कि उन्हें बिना तस्वीर के समझना भी मुश्किल है।
साहित्य और क़िस्सों की किताबों में तस्वीरों का सिलसिला यूँ तो शुरुआती इस्लामी दौर में शुरू हो गया था, मगर इनके सबसे पुराने नुस्ख़े जो हमें मिलते हैं, वे ज़्यादातर छठी और सातवीं सदी हिजरी के हैं। इत्तेफ़ाक़ से 'क़ाबूस नामा' का चित्रकारी वाला नुस्ख़ा अमेरिका में पुरानी चीज़ों के एक व्यापारी के ज़रिए हाल ही में मिला है, जिसे लेखक ने भी देखा है। दरअसल क़ाबूस बिन दशमगीर ने दसवीं सदी ईसवी में इसे नसीहतों के तौर पर लिखा था, मगर इस चित्रकारी वाले नुस्ख़े के बारे में अलग-अलग राय हैं कि क्या यह नुस्ख़ा असली है या जाली। हालाँकि अभी तक ज़्यादा अंदाज़ा यही है कि यह जाली है। बहरहाल, यह नुस्ख़ा 413 हिजरी का लिखा हुआ है और इसकी रंगीन तस्वीरें अध्ययन के क़ाबिल हैं। मेरी नज़र में यह नुस्ख़ा ज़रूर संदिग्ध (शक के घेरे में) है।
बग़दाद में अब्बासिया हुकूमत के दौर में ज्ञान और कला का बहुत विकास हुआ था। यहाँ 'अलिफ़ लैला' और 'कलीला व दिमना' जैसी ज्ञानवर्धक और साहित्यिक उत्कृष्ट रचनाओं (शाहकारों) को भी चित्रित किया गया था, जो उस दौर की यादगार मानी जाती हैं। अलबत्ता 'कलीला व दिमना' की चित्रित पांडुलिपियाँ अब नहीं मिलती हैं। मिस्र के खेदिविया पुस्तकालय में अरबी की मशहूर किताब 'आग़ानी' की चित्रित पांडुलिपि भी मौजूद है, जिसके सौंदर्य से अरबों की संस्कृति और कला का उत्कर्ष नज़र आता है। संयोग से १९१४ ई. में म्यूनिख, जर्मनी की प्रदर्शनी में 'अलिफ़ लैला' के कुछ पन्ने भी रखे गए थे, जिनमें उस घड़ी का चित्र था जिसे हारून रशीद ने चार्ल्स पंचम को तोहफ़े के तौर पर भेजा था। इन पन्नों में उस ज़माने के बाज़ारों के दृश्य और संगीत विद्या से संबंधित कुछ बहुत अहम जानकारियाँ थीं।
चूँकि आम तौर पर 'कलीला व दिमना' को मूल रूप से भारतीय किताब 'हितोपदेश' की नक़ल माना जाता है, जो अब्दुल्लाह बिन मुक़फ़्फ़ा की कोशिशों का नतीजा है। इसे चित्रित करने की तरफ़ बहुत ध्यान दिया गया था। इसकी एक पांडुलिपि १९१४ ई. की प्रदर्शनी में पेरिस में आई थी, जो ६३२ हिजरी की लिखी हुई थी, जिसमें यही तस्वीरें भी थीं। मगर इनके अध्ययन से मालूम हुआ कि ये ज़्यादातर इराक़ी चित्रकला शैली से संबंध रखती थीं। पेरिस में एक और चित्रित पांडुलिपि ७३३ हिजरी की लिखी हुई मालूम होती थी, जो बग़दाद में लिखी गई थी, मगर इसी दौर में 'मक़ामात-ए-हरीरी' की चित्रित पांडुलिपियाँ तैयार हुईं, क्योंकि इस्लामी मदरसों में ये किताबें बाक़ायदा पढ़ाई जाती थीं और इस तरह इन्हें आसानी से समझ में आने वाली माना जाता था। इंसान इन किताबों के सौंदर्य रूप से भी ख़ूब आनंद उठा सकता था।
चुनाँचे इन किताबों की काफ़ी चित्रित पांडुलिपियाँ यूरोप के पुस्तकालयों, मसलन ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन, राष्ट्रीय पुस्तकालय पेरिस और वियना में मौजूद हैं, जिन्हें लेखक ने भी देखा है। पेरिस की पांडुलिपि भी अमीन महमूद अल-वास्ती ने चित्रित करके ६३४ हिजरी में तैयार की थी, मगर लंदन की पांडुलिपि जो ७२३ हिजरी की लिखी हुई है, उसे अबुल फ़ज़ल बिन अबी इस्हाक़ ने चित्रित किया है। ये तीनों पांडुलिपियाँ पूरी तरह से इराक़ी चित्रकला शैली से संबंध रखती हैं। इन पर किसी क़िस्म का चीनी या ईरानी प्रभाव नहीं है। इसी तरह रशीद-उद-दीन की 'मजमा-उत-तवारीख़' की चित्रित पांडुलिपि एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में है, जो ७५५ हिजरी की लिखी हुई है, इसमें काफ़ी तस्वीरें हैं। मगर इसी तारीख़ की चित्रित पांडुलिपियाँ, जिन्हें किसी हद तक इसी पांडुलिपि का हिस्सा मानना चाहिए, भारत में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के पुस्तकालय और रामपुर के पुस्तकालय में हैं, जिन्हें लेखक ने भी देखा है।
इनमें स्पष्ट रूप से मध्य एशियाई माहौल है। इसीलिए हम इनकी चित्रकारी को मध्य एशियाई चित्रकला शैली का नाम देते हैं और इन तस्वीरों पर कुछ हद तक चीनी चित्रकला के प्रभाव भी हैं। मध्य एशिया में फ़िरदौसी के 'शाहनामा' ने इस्लामी चित्रकला में एक नया युद्ध-संबंधी (रज़्मिया) रंग पैदा कर दिया था, इसे चित्रकारों ने हर दौर में चित्रित किया है। यह किताब, जो सुल्तान महमूद ग़ज़नवी के दौर का एक सुनहरा साहित्यिक कारनामा है, चित्रकारों की रचनात्मक उड़ान का केंद्र रही है। इसकी वजह यह है कि चित्रकारों को इसमें वे घटनाएँ मिलीं जिनका चित्रकार सहारा तलाश करता है ताकि चित्रण करने में आसानी हो। इसमें बने-बनाए विषय मिलते हैं। दूसरे, यह ईरानी संस्कृति का एक बेहतरीन नमूना है, यानी यह ईरानी क़ौम का चित्रित इतिहास है।
यह मानना पड़ेगा कि चित्रकला के स्तर के साथ-साथ हमारा सौंदर्यवादी दृष्टिकोण भी इसी तरह तरक़्क़ी करता रहा। चुनाँचे आठवीं सदी हिजरी के आख़िर में, कलाओं में काफ़ी तरक़्क़ी हो चुकी थी और ख़ासकर ईरानी चित्रकला में फ़िरदौसी के 'शाहनामा' के अलावा दूसरे प्रामाणिक कवियों की रचनाओं को चित्रित करने की तरफ़ भी चित्रकारों ने ध्यान दिया, जिनमें निज़ामी की 'कुल्लियात', ख़्वाजा किरमानी वग़ैरह ख़ास तौर पर ज़िक्र के क़ाबिल हैं, जिन्हें ईरानी चित्रकारों ने चित्रित करके सौंदर्य की दृष्टि से दुनिया में मुसलमानों की एक ख़ास पहचान क़ायम कर दी। इनमें हम देखते हैं कि पेड़ों, पहाड़ों और प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें ज़्यादा नज़र आती हैं, यानी मध्य एशियाई माहौल पूरी तरह नज़र आता है।
इस ज़माने में बग़दाद चित्रकारी का केंद्र नहीं रहा था और तबरेज़ व समरकंद वग़ैरह के इलाक़े ज़्यादा बड़े केंद्र बन गए थे। तैमूरी जीतों ने फिर एक बार ज्ञान और कला के संरक्षण का केंद्र समरकंद से निकालकर, उसके बेटे शाहरुख़ मिर्ज़ा के दौर से शीराज़ और बग़दाद के साथ हेरात को बना दिया था। हेरात तैमूरी शहज़ादों की आख़िर तक राजधानी रहा। यहाँ चित्रकला में ऐसे कारनामे सामने आए, कि दुनिया उनकी मिसाल पेश नहीं कर सकती। मगर इससे पहले कि हम इस दौर के कारनामों को बयान करें, ख़्वाजा किरमानी की 'कुल्लियात' की ख़ास पांडुलिपि का ज़िक्र करना उचित होगा, जो इस वक़्त संयोग से ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन में मौजूद है।
यह पांडुलिपि मशहूर मीर अली तबरेज़ी की ७९८ हिजरी में लिखी हुई है, जिन्हें आम तौर पर नस्तलीक़ लिपि का आविष्कारक बताया जाता है। यह पांडुलिपि जुनैद नक़्क़ाश की चित्रित की हुई है, जो अपने हस्ताक्षर 'जुनैद नक़्क़ाश सुल्तानी' के शब्दों से करता है, जिसका मतलब यह है कि वह बग़दाद में जलायर सुल्तान अहमद के दरबार में था। यह नक़्क़ाश उस्ताद शम्सुद्दीन का शागिर्द था जो सुल्तान ओवैस जलायर के यहाँ चित्रकार था। उनका एक और शागिर्द उस्ताद अब्दुल हई था। इसके दौर के चित्रकला के नमूनों की सौंदर्यवादी स्थिति उनके रंगों और लिबासों की क़िस्मों में है, मगर यह दर-ओ-दीवार की सजावट से भी स्पष्ट है। मसलन हम ख़्वाजा की 'हुमा-ए-हुमायूँ' में एक शादी का नज़ारा देखते हैं और हम पूरी तरह से शाही शान-ओ-शौकत और रंग-रलियों के साथ इन तमाम तस्वीरों में उच्च कोटि के नक़्श-ओ-निगार पाते हैं, जो उस ज़माने की संस्कृति का ज़िंदा सुबूत हैं। इन आकृतियों में बेहतरीन तरतीब, एक समान नज़र और मंच की गतिविधियों में ईरानी रुचि और विकसित होती कला की विशेषताएँ नज़र आती हैं।
ऊपर बयान कर चुके हैं कि हेरात को चित्रकला के ज़माने में केंद्र का दर्जा हासिल हो गया था। ८७६ हिजरी में तैमूर के घराने से सुल्तान हुसैन बायक़रा तख़्त पर बैठा। मीर अली शेर नवाई जैसा ज्ञान और कला का संरक्षक उसका मुख्यमंत्री था। उसके दरबार में मौलाना नूरुद्दीन, अब्दुर्रहमान जामी जैसे शायर, मौलाना तबाई जैसे कला विशेषज्ञ, मौलाना सुल्तान अली मशहदी 'क़िब्ला-तुल-कुत्ताब' जैसे सुलेखक और उस्ताद कमालुद्दीन बहज़ाद जैसे चित्रकार थे। पूरे इतिहास में ऐसी माहिर और अपने-अपने फ़न की उस्ताद हस्तियाँ एक जगह जमा नहीं हुई थीं। अपने ज़माने के इन अद्वितीय विद्वानों ने एक-दूसरे के सहयोग से वे कारनामे अंजाम दिए जो ज्ञान और कला के इतिहास में हमेशा यादगार रहेंगे। बहज़ाद ने बचपन में उस्ताद सैयद रूहल्लाह मीरक नक़्क़ाशी से तालीम हासिल की, जो मौलाना वहीउल्लाह के ख़ास शागिर्द थे। वह ८४४ हिजरी में हेरात में ही पैदा हुआ था और वहीं उसकी परवरिश हुई। अभी तक ईरानी चित्रकला में चीनी प्रभाव मौजूद थे, मगर बहज़ाद ही एक ऐसा चित्रकार गुज़रा है जिसने इस प्रभाव को ख़त्म करके ईरानी चित्रकला को पूरी तरह से स्थानीय कर दिया।
बहज़ाद और उसके शागिर्दों ने, जिनमें आग़ा मीरक, क़ासिम अली, रुस्तम अली वग़ैरह ज़िक्र के क़ाबिल हैं, ईरानी चित्रकला की एक नई शैली क़ायम की। बहज़ाद के कारनामों में बेशुमार इस क़ाबिल हैं कि उनको अलग-अलग बिना किसी आश्चर्य के बयान किया जाए, मगर मैं यहाँ सिर्फ़ 'गुलिस्ताँ-ए-सादी' की पांडुलिपि पर ही संतोष करता हूँ, जो संयोग से दार-उल-कुतुब मिस्रिया में मौजूद है, जिसे लेखक ने पिछले साल मिस्र में देखा था। इसे सुल्तान अली ने लिखा था और शम्सुद्दीन कातिब ने मुकम्मल किया था, और बहज़ाद ने ख़ुद इसकी तमाम तस्वीरें बनाई थीं।
इन तस्वीरों में बहज़ाद ने यूसुफ़-ज़ुलेख़ा के मशहूर वाक़ये को चित्रित किया है। बहज़ाद की इस तस्वीर को देखने से स्पष्ट होता है कि बहज़ाद ने महल के तमाम पर्दों और खिड़कियों को इस तरह चित्रित किया है कि हर हिस्सा अलग-अलग नज़र आता है और फिर इसमें दो लोग ही घूमते-फिरते नज़र आते हैं। आम तौर पर पूर्वी चित्रकारी पर यह आपत्ति की जाती है कि इसमें यूरोपीय चित्रकारी की तरह आकार (जसामत) स्पष्ट नहीं हो सकता, लेकिन इस तस्वीर में आकार बिल्कुल स्पष्ट है। इसी तरह बहज़ाद ने दो ऊंटों को आपस में लड़ते दिखाकर ऊंट के स्वभाव को स्पष्ट किया है।
सुल्तान हुसैन बायक़रा के बाद हनफ़ियों का दौर-दौरा हुआ और हुकूमत का केंद्र हेरात से निकल कर तबरेज़ हो गया। हनफ़ियों ने भी ज्ञान और कला की क़द्रदानी में बड़े-बड़े कारनामे अंजाम दिए। इस्माईल सूफ़ी बहज़ाद को अपने साथ तबरेज़ ले गया और वहां उसे पुस्तकालय का प्रबंधक (मोहतमिम) नियुक्त किया और तमाम चित्रकारों को उसके अधीन कर दिया। बहज़ाद का लंबी उम्र, क़रीब सौ साल में, 942 हिजरी में इंतक़ाल हुआ। उसकी मृत्यु की तारीख़ 'ख़ाक-ए-क़ब्र-ए-बहज़ाद' से निकलती है। उसकी मृत्यु के समय ईरानी चित्रकारी अपने चरम पर थी। इसका सेहरा बहज़ाद के सिर है।
इसी ज़माने में फ़रग़ना में ज़हीरुद्दीन बाबर तैमूर के ख़ानदान से उभर कर सामने आया और हालात से मजबूर होकर उसने हिंदुस्तान का रुख़ किया, जहां उसने 934 हिजरी में इब्राहीम लोधी को पानीपत के मैदान में करारी शिकस्त दी और मुग़ल सल्तनत की बुनियाद रखी। बाबर बादशाह जितना बड़ा सिपाही था, उतना ही ज्ञान से भी संपन्न था। इसलिए उसने अपने हालात ख़ुद 'तुज़ुक' के रूप में क़लमबंद किए, जिसका एक नुस्ख़ा 937 हिजरी में मुकम्मल हुआ। इसी साल उसका इंतक़ाल हुआ और उसका लड़का नसीरुद्दीन हुमायूं उसका जानशीन (उत्तराधिकारी) हुआ। तुज़ुक का यह मुकम्मल नुस्ख़ा जो उस वक़्त तैयार हुआ, उसे चित्रित किया गया, जो संयोग से अलवर रियासत में मौजूद है।
इसके बाद हुमायूं को भी हालात से तंग आकर ईरान का रास्ता अपनाना पड़ा, जहां उसने शाह तहमास्प सफ़वी के दरबार में पहुंचकर अपनी तंगी के दिन काटे। जब क़िस्मत ने साथ दिया तो वह ईरान से अपने साथ कलाकारों को लेकर हिंदुस्तान आया, जिनमें ख़ास तौर पर ख़्वाजा अब्दुस्समद शीरीं क़लम, मीर सैयद अली तबरेज़ी वग़ैरह क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं, जिन्होंने बहज़ाद की परंपरा पर चलकर चित्रकारी में कमाल पैदा किया था। इसका सबसे बड़ा कारनामा 'दास्तान-ए-अमीर हमज़ा' को चित्रित करना था। हुमायूं ने इससे ख़ुद भी चित्रकारी सीखी थी। अपने लड़के अकबर के लिए चित्रकारी की तालीम पर नियुक्त किया था। हुमायूं इसके बाद कुछ और अरसा ज़िंदा रहता मगर उसका लड़का जलालुद्दीन अकबर ही 923 हिजरी में बाप का जानशीन हुआ।
अकबर की उम्र अभी क़रीब चौदह बरस की थी कि तैमूरी ताज उसके सिर पर रखा गया। उसके संरक्षक (अतालीक़) मुनअम ख़ां और बैरम ख़ां थे। उन्होंने उसके शासन को मज़बूत करने की तरफ़ ध्यान दिया। अगर ये लोग न होते तो अकबर के नाज़ुक कंधे अकेले हुकूमत के भारी बोझ को न उठा सकते। उन्होंने अपने आक़ा की ज़िम्मेदारियों को अपने सिर ले लिया। अकबर ने शुरुआती मुहिमों से फ़ुर्सत पाकर फ़ौरन ज्ञान और कला की तरफ़ ध्यान दिया। बचपन से ही उसे चित्रकारी और क़िस्से सुनने का शौक़ था। और मीर सैयद अली तबरेज़ी और ख़्वाजा अब्दुस्समद शीरीं क़लम बराबर अपना काम कर रहे थे। हालांकि वे शुरुआत में कुछ उदास थे, मगर नौजवान बादशाह की उनके फ़न में दिलचस्पी ने उनकी हिम्मत बढ़ा दी। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से 'दास्तान-ए-अमीर हमज़ा' को चित्रित किया, जिसकी पूरी तफ़सील उस दौर के इतिहास में मिलती है। बल्कि अकबर की चित्रकला अकादमी में इन दो ईरानी चित्रकारों के अलावा कई हिंदू चित्रकार भी शागिर्द के तौर पर शामिल हुए।
अकबर को सौंदर्य की अनुभूतियों का सही अंदाज़ा करने और उनसे आनंद उठाने की क़ुदरत ने पूरी क्षमता (मलका) अता की थी, और वह धार्मिक मामलों और मुल्की हितों के मामले में बेहद व्यापक सोच रखता था। उसने अपने इस रवैये से हर वर्ग को अपनी कमउम्री में ही जीत लिया था और ख़ासकर राजपूतों से नज़दीकी हासिल हुई। आर्ट एकेडमी में सब क़िस्म के लोग मिलकर काम करते थे। अबुल फ़ज़ल ने एक हिंदू चित्रकार के बारे में लिखा है कि वह एक कहार का लड़का था। अकबर ने अपनी दूरदर्शी पारखी नज़र से उसको देखा, जबकि वह अभी कमसिन बच्चा ही था और एक दीवार पर चित्रकारी कर रहा था, जैसा आम तौर पर बच्चे करते हैं, लेकिन अकबर की पारखी नज़र ताड़ गई कि इस लड़के में आला दर्जे का चित्रकार बनने के गुण मौजूद हैं।
इसलिए उसने उसे ख़्वाजा अब्दुस्समद के सुपुर्द किया, तो उसकी तालीम से वह बेमिसाल चित्रकार निकला। मगर वह चित्रकारी के अपने स्वाभाविक जुनून में इस क़दर आगे बढ़ गया कि वह नौजवानी में ही दिमागी संतुलन खोकर ख़त्म हो गया। उसके कारनामे अपने आप में उसके आला कलाकार होने का पता देते हैं। अकबर को चित्रकारी का इस क़दर शौक़ था कि उसने फ़तेहपुर सीकरी में दीवारों पर इन चित्रकारों से तस्वीरें बनवाईं, जिनके निशान आज तक बाक़ी हैं। और अकबर चित्रकारी के सौंदर्य पहलू से इस क़दर प्रभावित हुआ कि तर्कों के ज़रिए हमेशा यह बात साबित करने की कोशिश किया करता था कि चित्रकारी इस्लाम की तालीम के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि ईश्वर को पहचानने (मारफ़त-ए-इलाही) के जहां और दूसरे तरीक़े हैं, वहां एक यह भी है।
चुनांचे एक मर्तबा उसने, जब कि ख़ास सभा में नेक लोग मौजूद थे, फ़रमाया कि बहुत से लोग चित्रकारी के पेशे को बुरा बताते हैं, मुझे यह गवारा नहीं। मेरे ख़्याल में चित्रकार ईश्वर को पहचानने (ख़ुदा-शनासी) में दूसरों से बढ़कर है। जब वह कभी जानवर की तस्वीर बनाता है और हर हिस्से को अलग-अलग उकेरता है, मगर रूह और जिस्म में संबंध पैदा करने से लाचार (आजिज़) होता है, तो वह सच्चे रचयिता (ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी) की तरफ़ ध्यान देता है और अपनी इस लाचारी से ईश्वर का ज्ञान (मारफ़त-ए-इलाही) हासिल करता है। यानी यह अल्लाह को ही एकमात्र रचयिता समझने का एक ज़रिया है।
अकबर ने अपनी सरपरस्ती में 'दास्तान-ए-अमीर हमज़ा' के अलावा संस्कृत किताबों के फ़ारसी में तर्जुमे कराकर उनको चित्रित भी कराया, जिसके कई चित्रित नुस्ख़े आज भी मिलते हैं। और अन्य किताबों जैसे 'बाबरनामा', 'अनवार-ए-सुहैली' वग़ैरह को चित्रित कराया। उस दौर के अमीरों में अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ानां ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं, जिन्होंने अपने यहां हस्तलिखित और चित्रित किताबें तैयार करने का एक अलग विभाग क़ायम किया हुआ था और अक्सर कलाकार उनके यहां काम करते थे, जिनमें मियां क़दीम और अब्दुर्रहीम अंबरिन क़लम क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।
अकबर के बाद उसके बेटे जहांगीर के हाथ में हुकूमत की बागडोर आई। वह बचपन से ज्ञान और कला की गोद में पला था और शहज़ादे होने के ज़माने से ही उसे चित्रकारी का शौक़ था। आग़ा रज़ा हेराती उसकी ख़िदमत में हर वक़्त हाज़िर रहता था। जहांगीर हुस्न-परस्त था और ख़ूबी व ख़ूबसूरती का सच्चा क़द्रदान। वह तस्वीर बनाना नहीं जानता था, लेकिन सौंदर्य के लिहाज़ से कला का बहुत बड़ा आलोचक (नक़्क़ाद) था और अच्छे-बुरे को कलात्मक नज़रिए से ख़ूब परखता था। उसकी पारखी नज़र का यह आलम था कि अगर कोई तस्वीर कई दरबारी चित्रकार मिलकर बनाएं, तो वह बता सकता था कि कौन सा हिस्सा किसके हाथ का बना हुआ है। उसने 'तुज़ुक' में इसे ख़ुद स्पष्ट रूप से बयान कर दिया है।
ईरानी चित्रकला शैली से काफ़ी लगाव था और उसने वहाँ की ज़्यादातर तस्वीरों को बहुत पसंद किया, बल्कि उनकी नक़लें भी बनवाईं। एक बार उसने अपने एक चित्रकार बिशन दास को राजदूत ख़ान-ए-आली के साथ ईरान भेजा, जो वहाँ से काफ़ी जानकारी हासिल करके आया। जहाँगीर ने अपने दरबारी चित्रकारों को उनके बेहतरीन नमूनों से प्रभावित होकर ख़िताब (उपाधियाँ) भी दिए। चुनाँचे उसने अबुल हसन सैयद आग़ा रज़ा को 'नादिर-उज़-ज़माँ' का ख़िताब और एक चित्रकार को, जो आमतौर पर जानवरों की तस्वीर बनाने में महारत रखता था, 'नादिर-उल-असर' का ख़िताब दिया। मगर उसके दरबार में फ़र्रुख़ बेग क़लमाक़, नादिर समरक़ंदी, मुहम्मद मुराद, हाशिम और मनोहर जैसे चित्रकार बहुत बेहतरीन काम करते थे और वह अक्सर उनको इनाम-ओ-इकराम से इज़्ज़त देता और उनकी हौसला-अफ़ज़ाई करता था, और वे भी बहुत उम्दगी से अपने आक़ा के इशारे पर उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ तस्वीर बनाते थे। इस ज़माने की चित्रकला में हमें रोमानियत ज़्यादा नज़र आती है और प्राकृतिक दृश्यों की तरफ़ भी रुझान नज़र आता है।
जहाँगीर के मुरक़्क़े (चित्र-संग्रह) का आमतौर पर ज़िक्र किया जाता है, जिसका ज़्यादातर हिस्सा बर्लिन में और पूना के एक पारसी रईस मिस्टर अर्देशिर के पास लेखक ने देखा है। इस युग में अमीरों की शबीहों (पोर्ट्रेट) की तरफ़ भी काफ़ी ध्यान दिया गया था, जिसका विकास शाहजहाँ के युग में अपने चरम पर हुआ। मगर हमें यह ज़रूर बताना होगा कि जहाँगीर को यूरोपियनों की चित्रकला से भी दिलचस्पी थी, जिसका ज़िक्र हमें उस युग के ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो के बयान में मिलता है कि उसने किस तरह उन्हें जहाँगीर की ख़िदमत में पेश किया, जिनकी उसके अपने दरबारी चित्रकारों ने तस्वीरें बनाईं, जिसकी मिसाल हमें लाहौर के क़िले की उत्तरी दीवार की काशीकारी (टाइल-वर्क) में नज़र आती है।
ग़रज़ यह कि अकबर और जहाँगीर के युग की चित्रकला में वही फ़र्क़ है जो उन दोनों के हालात और उनके चरित्र में है। मगर जहाँगीर के बाद शाहजहाँ का ज़माना मुग़ल साम्राज्य की बेहद ख़ुशहाली और उरूज (उत्कर्ष) का युग था। उसे अपने बाप-दादा की तरह ललित कलाओं (फ़ुनून-ए-लतीफ़ा) से जो ख़ास लगाव था, वह वास्तुकला से ज़ाहिर है और उसने ताजमहल जैसा वह शाहकार (मास्टरपीस) पैदा किया जो दुनिया के सात अजूबों में शुमार होता है। उसने बहुत अच्छी तरह से अकबर और जहाँगीर का ज़माना देखा हुआ था और फिर मनोहर और समरक़ंदी, अनूप चतर, हाशिम जैसे बाकमाल चित्रकार मौजूद थे। उसे ज़्यादातर प्रकृति-चित्रण के अलावा शोबदाकारी (चमत्कारिक कला) का ज़्यादा शौक़ था। इन चित्रकारों ने मुरक़्क़े तैयार किए। इनमें उनके अपने अमीरों की शबीहें ख़ास अहमियत रखती हैं। चुनाँचे शाहजहाँ के युग की तस्वीरों में से उसकी ताजपोशी और दरबारी अमीरों का पेश होना बहुत अहमियत रखती हैं।
ग़रज़ यह कि इस युग की चित्रकला से हम इस युग के पूरे सौंदर्य-बोध (जमालियाती कैफ़ियत) का अंदाज़ा कर सकते हैं। उसके बेटे दारा शिकोह को भी चित्रकला से ख़ास लगाव था। वह अकबर की तरह धर्म और राजनीति, ज्ञान और दर्शन और कलाओं की ऊँचाइयों, ग़रज़ कि ज़िंदगी के हर क्षेत्र में मिले-जुले रुझानों के प्रति संवेदनशील था, जो सब सौंदर्यपरक स्थितियों से जुड़े हुए थे। उसकी इस सुरुचि का सुबूत उस मुरक़्क़े से मिलता है जो इंडिया ऑफ़िस लंदन में उसके नाम से मौजूद है, जिसे उसने अपनी चहेती पत्नी नादिरा बेगम को भेंट किया था। मगर क़ुदरत को मंज़ूर न था कि शाहजहाँ का यह सबसे बड़ा बेटा दारा शिकोह उसका उत्तराधिकारी (जानशीन) हो। चुनाँचे हालात के एतबार से औरंगज़ेब कामयाब हुआ और तख़्त-ओ-ताज का मालिक बना, जिसे चित्रकला का बिल्कुल शौक़ न था।
अलबत्ता, उसने राजनीतिक तौर पर कुछ दरबारी चित्रकारों से ज़रूरी शबीहें बनवाकर हालात का जायज़ा लिया, जिनमें उसका अपना बेटा मुहम्मद सुल्तान भी शामिल है। ग़रज़ कि चित्रकला का यह भी एक सौंदर्यपरक पहलू है। उसने सुलेखन (ख़त्ताती) में भी कमाल पैदा किया और वास्तुकला में लाहौर जैसी मस्जिद को बनवाकर, जो दुनिया में सबसे बड़ी मस्जिद है, नाम कमाया। बल्कि यूँ कहना सही होगा कि औरंगज़ेब के युग में ललित कलाओं को दरबारी पाबंदियों से आज़ादी हासिल हो गई थी और लोग अपने-अपने तरीक़े से काम करने लगे। यानी कलाएँ अमीराना माहौल से निकलकर व्यक्तिगत सत्ता यानी जम्हूरियत (लोकतंत्र) के रंग में आ गईं और औरंगज़ेब के बाद चित्रकला ने बिल्कुल अलग रूप अख़्तियार कर लिया, मगर कलात्मकता की हद तक उसमें कोई फ़र्क़ नहीं आया।
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