मंटो और नया अफ़साना
उर्दू अफ़साने के इतिहास में मंटो की जगह इतनी सुरक्षित और हमारे फ़िक्शन की परंपरा में उनका मर्तबा इतना मज़बूत है कि अब मंटो के बारे में सिर्फ़ तारीफ़ और श्रद्धा जताने का कोई मतलब नहीं निकलता। अपनी हैसियत ख़ुद मंटो ने जिस तरह तय की थी, अपनी अलग-अलग रचनाओं, यहाँ तक कि अपनी क़ब्र के पत्थर की इबारत में भी, मंटो के ज़्यादातर पाठकों ने उसे बिना किसी सवाल के स्वीकार कर लिया है।
मंटो से जुड़े ज़्यादातर लेख और किताबें अपने बारे में ख़ुद मंटो की क़ायम की गई रायों की व्याख्या और उनका औचित्य पेश करती हैं। इस बात के अनुसार, मंटो उर्दू का सबसे बड़ा अफ़साना निगार (कहानीकार) है और इससे जुड़ी जो सबसे ताज़ा किताब मेरे सामने आई है (आपका सआदत हसन मंटो 'मंटो के ख़ुतूत' संकलनकर्ता मोहम्मद असलम परवेज़, प्रकाशन, मुंबई, जनवरी 2012) इसके साथ संकलनकर्ता ने एक मंटो शताब्दी कैलेंडर भी प्रकाशित किया है जिसमें मंटो को दुनिया का सबसे बड़ा अफ़साना निगार कहा गया है।
यह एक मानी हुई सच्चाई है कि पुराना या नया कोई भी दूसरा अफ़साना निगार मंटो के महत्व से इनकार नहीं करता। मंटो जैसे दावों की हिम्मत भी किसी ने नहीं दिखाई, बाद का कोई अफ़साना निगार मंटो जैसी शोहरत और लोकप्रियता भी नहीं रखता। यह सच्चाई भी अहम है कि मंटो के समकालीनों में एक उपेन्द्रनाथ अश्क ने ही मंटो को अपने प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा और मंटो के बाद आने वालों में, रेवती सरन शर्मा ने उसकी राजनीतिक समझ और निष्पक्षता पर बहुत ही कड़े सवालिया निशान खड़े किए। हमारे प्रगतिशीलों ने उस पर अश्लीलता और प्रतिक्रियावाद के आरोप लगाए (सरदार जाफ़री, 'तरक़्क़ी पसंद अदब')। मंटो के कुछ नादान दोस्तों ने मंटो की इंसान-दोस्ती और नैतिक समानता की सोच को दरकिनार करके, उसे राष्ट्रवादी, देशभक्त और शायद अपने ही क़बीले के रुझानों से भरा हुआ और सच्चा मुसलमान दिखाने की कोशिश की, मानो उसी बेतुके तर्क के अधीन जो रेवती सरन शर्मा ने अपने लेख में अपनाया है।
मगर मंटो के अपने कुछ अधिकार हैं और पाठक पर उसकी कहानियों की तरफ़ से लागू होने वाली कुछ शर्तें भी हैं, जिन्हें सिरे से नज़रअंदाज़ कर देने का कोई औचित्य नहीं है। एक बात जो उसके पाठक को हर हाल में याद रखनी चाहिए, वह यह है कि मंटो शुरू से आख़िर तक एक अफ़साना निगार था। वह अपने दौर का इतिहासकार, घटना-लेखक, दार्शनिक या विचारक नहीं था। उसकी यथार्थवादिता भी एक आर्टिस्ट की यथार्थवादिता थी, किसी पत्रकार या सामाजिक समीक्षक की यथार्थवादिता नहीं थी। यह एक स्वाभाविक और रचनात्मक बुद्धिमत्ता से मालामाल आर्टिस्ट की यथार्थवादिता थी, जो आम ज़िंदगी और सच्चाई को भी, अपनी कलात्मक ज़रूरत के अनुसार नए सिरे से गढ़ता है। मंटो की भावनाओं में कशमकश का जो लगातार अंदाज़ दिखाई देता है, एक स्थायी बेचैनी की जो स्थिति मिलती है, उसके कारण आइडियोलॉजिकल और राजनीतिक नहीं हैं।
मंटो की चेतना जिस परिदृश्य की तह से निकलकर आई है, वह उसके तमाम समकालीनों, ख़ासकर प्रगतिशील अफ़साना निगारों की चेतना से ज़्यादा व्यापक है और अपने पाठक की दृष्टि से एक अनोखा, निजी क़िस्म का संबंध भी क़ायम करती है। हालाँकि, उसके बड़प्पन को स्वीकार करने के बावजूद, अफ़साना निगार मंटो को यह संरक्षणवादी रवैया और रियायत नहीं चाहिए कि उसे दुनिया का सबसे बड़ा अफ़साना निगार भी क़रार दिया जाए, भले ही अपने हक़ में यह फ़ैसला ख़ुद मंटो ने कर लिया था। मगर तमाम ख़ूबियों के बावजूद मंटो उस विज़न से वंचित था जिसके बिना किसी साहित्यिक रचना में महानता के तत्व प्रकट नहीं होते। मंटो हमारा सबसे लोकप्रिय अफ़साना निगार है, बड़ा विज़नरी (visionary) नहीं है। यही वह मुक़ाम है जहाँ पर प्रेमचंद, क़ुर्रतुलऐन हैदर और इंतज़ार हुसैन का विज़न, रचनात्मक उद्देश्य और उनके वैचारिक सरोकार मंटो से आगे बढ़ जाते हैं। हालाँकि, मंटो की विशिष्टता और मर्तबे पर इससे कोई आँच नहीं आती।
यहाँ एक और अफ़साना निगार मोहम्मद हसन अस्करी का ज़िक्र करना ज़रूरी है, जिन्होंने मंटो की विशेषताओं की समझ को उर्दू अफ़साने के इस सुनहरे दौर में शायद सबसे ज़्यादा आम किया और मंटो की मौत पर भावुक हुए बिना आम किया। अस्करी ख़ुद भी एक असाधारण अफ़साना निगार थे, अपने तमाम समकालीनों से अलग नज़र आने वाले। उन्होंने मंटो की वैचारिक प्राथमिकताओं को भी सबसे ज़्यादा समझा था क्योंकि मंटो ही की तरह इंसान की मूल प्रवृत्ति और फ़ितरत में रचे-बसे रवैयों, अनुभवों और विचारों से उन्हें भी ख़ासी दिलचस्पी थी और वह उनके तर्क की समझ भी अपने दूसरे तमाम समकालीनों से ज़्यादा रखते थे। 'जज़ीरे' और 'क़यामत हम-रिकाब आए न आए' के अफ़साने आज भी अनोखे दिखाई देते हैं। मंटो की भावना-शैली से थोड़ी-बहुत समानता रखने के बावजूद, मंटो की तरह अस्करी भी इंसान की भीतरी उथल-पुथल और सामाजिक मूल्यों और रस्मों की तह में कुलबुलाते हुए जज़्बों को दर्शाने के मामले में निडर थे।
इसके अलावा, विभाजन और दंगों से पैदा हुए उन्माद, हिंसा की काव्यात्मकता और आपातकालीन हालात में मानवीय कर्म और भावना के असंतुलित रूपों के सिलसिले में उनकी जैसी गहरी अंतर्दृष्टि तक कोई और नहीं पहुँच सका। अस्करी की अफ़साना निगारी, उनके दूसरे वैचारिक कामों और अकादमिक गतिविधियों की तह में दब गई। वरना हक़ीक़त यह है कि विभाजन के दौर के साहित्य की संरचना और रचना के निहितार्थों को उन्होंने जितनी गहरी और संवेदनशील नज़रों से देखा था, कोई और नहीं देख सका।
एक ख़ास दौर के सामाजिक हंगामों से अलग, राजनीतिक और सामाजिक विज्ञान के जानकारों की मंटो में बढ़ती हुई दिलचस्पी से कभी-कभी यह डर ज़रूर पैदा होता है कि मंटो का अफ़साना विद्वानों के अनुचित अधिकार के अधीन होता जा रहा है। यह रवैया मंटो के रचनात्मक अहंकार और उसके कलात्मक कमाल से मेल खाता हुआ नहीं कहा जा सकता। प्रामाणिक जानकारी के अनुसार, मंटो ने अपने सीमित और छोटे रचनात्मक जीवन में कुल दो सौ अड़तीस अफ़साने लिखे जिनमें से तीन अभी तक लापता हैं, पैंसठ नाटक लिखे और चौबीस ख़ाके (रेखाचित्र), जिनमें से एक ग़ायब है (इस जानकारी के लिए मैं प्रोफ़ेसर शम्सुल हक़ उस्मानी का शुक्रगुज़ार हूँ)। इनमें उच्च स्तर की रचनाओं का अनुपात ज़्यादा नहीं है। लेकिन मंटो की चुनिंदा रचनाओं में एक अजीबोग़रीब स्वाभाविकता है जैसे वे बिना किसी बाहरी कोशिश के बस अपने आप फूट पड़ी हों, हरी डाल पर नई कोंपलों की तरह। हमारे फ़िक्शन की परंपरा को मंटो से ज़्यादा स्वाभाविक, बेबाक और एक अनोखी भीतरी, समझ से परे ताक़त से मालामाल अफ़साना निगार नहीं मिला।
इसीलिए, मंटो की कहानियों की ऐतिहासिकता, सामाजिक सार्थकता और सामाजिक संदर्भ पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देने और पूरी तरह से ग़ैर-रचनात्मक स्तर पर मंटो की व्याख्या करने की प्रक्रिया में मुझे ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है। मंटो का असली हुनर तो उसकी सादगी, उसके बर्ताव और उसकी अभिव्यक्ति की शैली में है। इतिहास और राजनीति की गढ़ी हुई सच्चाइयों को वह अपनी चेतना के रास्ते से परे धकेल कर किस तरह एक नई और स्थायी सच्चाई में बदल देता है, मानवीय अनुभव के आते-जाते और नश्वर रूपों को किस तरह हमेशा रहने वाले और स्थायित्व के रास्ते पर ले जाता है, इस प्रक्रिया में उसका कोई सानी नहीं है। उसके समकालीनों में यह हुनर और सलीक़ा मंटो के बाद, सबसे ज़्यादा शायद ग़ुलाम अब्बास के हिस्से में आया था, वरना तो अपनी दृष्टि और संवेदना की सबसे नाज़ुक थरथराहटों के बावजूद न तो बेदी इस दर्जे के कमाल तक पहुँच सके और न ही अपनी तमामतर हमदर्दी के बावजूद कृश्न चंदर इस हैरान करने वाली विशिष्टता की हद को पार कर सके।
'हत्क', 'बाबू गोपीनाथ', 'काली शलवार', 'मोज़ेल', 'धुआं', 'गुरमुख सिंह की वसीयत', 'टिटवाल का कुत्ता', 'टोबा टेक सिंह', 'राम खिलावन' और 'खोल दो' जैसे अफ़साने सिर्फ़ खुली आँखों की पकड़ में आने वाले नज़ारे नहीं हैं। ये सिर्फ़ मिसालें हैं, मंटो के शाहकार (बेहतरीन) अफ़सानों की फ़ेहरिस्त नहीं है। इस सिलसिले में यह बात भी अहम है कि समय और स्थान के एक ही दायरे में क़िस्सागोई (कहानी कहने) की स्वाभाविक और सहज क्षमता से मालामाल लिखने वालों का ऐसा जमावड़ा फिर कभी देखने में नहीं आया।
मंटो, इस्मत, ग़ुलाम अब्बास, हयातुल्लाह अंसारी, अस्करी अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं के साथ कमोबेश एक ही दौर के लिखने वाले थे। इनमें मंटो ने अपने बाद के कुछ लिखने वालों के लिए जो एक मॉडल की शक्ल इख़्तियार कर ली, तो इसका कुछ कारण मंटो का अफ़सानवी व्यक्तित्व भी था। व्यक्तित्व के इसी तत्व ने मंटो की स्वाभाविक मनमानी, सनसनीखेज़ी और अना (अहंकार) को भी बुनियाद मुहैया की। इस सिलसिले में यह बात भी ग़ौरतलब है कि मंटो की पैरवी करने वाले जोशीले लेखकों में ज़्यादातर दूसरे और तीसरे दर्जे या लोकप्रिय (popular) लिखने वाले शामिल थे।
मंटो के पास अपनी हर कमज़ोरी और टेढ़ेपन का तर्क मौजूद था। उसके ज़्यादातर आलोचकों ने उसे उसी के क़ायम किए हुए तर्क के नज़रिए से समझने की कोशिश की है। इसीलिए, मंटो के अफ़सानों में हम वही सब ढूँढते और देखते हैं जो मंटो की अपनी तलाश का नतीजा था। हमारा ज़ेहन अक्सर इस तरफ़ नहीं जाता कि मंटो के दौर की दुनिया में बहुत कुछ और भी था, जिसको देखने और समझने की मोहलत मंटो को न तो उसकी ज़िंदगी ने दी, न ज़माने ने, और अब तो मंटो के कुछ आलोचक इस कोशिश में लगे हैं कि मंटो की दुनिया को और ज़्यादा समेट दें। इसकी सबसे कमज़ोर बुनियाद वाली मिसाल मंटो पर फ़तेह मोहम्मद मलिक की किताब है। यानी कि हम मंटो से उसकी वह ख़ूबी भी छीन लेना चाहते हैं जिसे बँटवारे और फ़सादों के माहौल ने एक साहसिक और असाधारण मानवीय बुनियाद प्रदान की थी। हालाँकि पहले विश्व युद्ध के पैदा किए हुए माहौल में पश्चिम ने जिस स्तर का साहित्य रचा था, उसके मुक़ाबले में हमारा बँटवारे का प्रतिनिधि साहित्य कमतर दर्जे का है, फिर भी मंटो ने इस त्रासदी को रचनात्मक वस्तुनिष्ठता (objectivity) और स्वतंत्र चेतना के जिस नज़रिए से देखा था, उस तक, एक बेदी को छोड़कर मंटो के किसी और समकालीन की पहुँच न हो सकी।
यहाँ वस्तुनिष्ठता का मतलब तर्कशीलता (rationalism) हरगिज़ नहीं है। रचनात्मक आदमी के लिए तर्क की राह में हज़ार ख़तरे छिपे हुए होते हैं। तर्कशीलता एक ख़तरनाक हथियार है। कभी-कभी यह उस शख़्स का काम भी तमाम कर देती है जो इसे काम में लाना चाहता है। यह जितना कुछ देती है उससे ज़्यादा छीन लेती है। इसीलिए अपने कुछ मशहूर प्रगतिशील समकालीनों के विपरीत, मंटो ने तर्कशीलता के नुक़सान को तो समझ ही लिया था, इसी के साथ-साथ उसकी कलात्मक और रचनात्मक दृष्टि पर यह भेद भी खुल गया था कि आइडियोलॉग (ideologue) होने का मतलब, अपनी कल्पना की मौत को क़बूल कर लेना है। इस तरह की हार फ़नकार मंटो के अहंकार से मेल नहीं खा सकती थी, लिहाज़ा अभिव्यक्ति के स्तर पर मंटो ने प्रयोगशीलता का रास्ता भी अपने लिए खुला रखा। यूँ भी आम उर्दू फ़िक्शन की रफ़्तार के मुक़ाबले में हमारी ज़िंदगी और वक़्त की रफ़्तार ज़्यादा तेज़ थी।
मंटो ने 'बारिदा-ए-शुमाली' (प्रकाशन 1955), 'फुंदने' (प्रकाशन 1955) और 'काली कली' (प्रकाशन नवंबर 1960, नुक़ूश, लाहौर) जैसे कुछ अफ़साने, जो लिखे तो शायद सिर्फ़ मनोरंजन की ख़ातिर या ख़ुद को आज़माने के लिए, इसलिए हरगिज़ नहीं कि दौड़ती-भागती ज़िंदगी के बदलावों का साथ दिया जाए और व्यक्तिगत व सामूहिक ज़िंदगी के तजुर्बों में सामने आने वाले बदलावों को एक नई भाषाई संरचना के ज़रिए पकड़ में लिया जा सके।
इफ़्तिख़ार जालिब और अनीस नागी की बाल की खाल निकालने वाली बहसों और बारीक़ी के बावजूद, मंटो का यह प्रयोग, प्रयोग ही रहा, उर्दू अफ़साने की परंपरा में किसी नए मोड़, किसी मील के पत्थर की हैसियत इसे नहीं मिल सकी। अनवर सज्जाद का बयान है कि उन्होंने अफ़साना लिखना 'फुंदने' से सीखा (शऊर, चार, दिल्ली) लेकिन इस स्तर पर मंटो की पैरवी का रंग उनके यहाँ ज़्यादा स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा, यह बात भी ग़ौरतलब है कि मंटो को अपने एहसासों पर गुज़रने वाले किसी भी तजुर्बे के बयान में अपना हाल छिपाने की ज़रूरत नहीं थी। वह ततैया के छत्ते में हाथ डालने से घबराता नहीं था क्योंकि ख़ुद उसके अपने वजूद के ज़हरीलेपन ने उसे रचनात्मक बोध और अभिव्यक्ति के स्तर पर बड़े से बड़ा ख़तरा मोल लेने की राह दिखाई थी।
यूँ भी मंटो की चेतना के विकास में जिन लोगों, रवैयों और फ़िक्शन की परंपरा के जिन साधनों का रोल रहा था, उनमें कहीं भी इंसान को अमूर्त (abstraction) या प्रतीक के तौर पर देखने की गुंजाइश नहीं निकलती थी। अनीस नागी का यह कथन कि मंटो ने प्रभाववादी और यथार्थवादी (realistic) शैली में यौन कुंठा और सामाजिक डर को 'फुंदने' के हवाले से उभारा है, और यह कि इस तरह के अफ़साने उर्दू के नए अफ़सानानिगारों के लिए एक उच्च महारत की मिसाल हैं, शायद मंटो की एक तात्कालिक प्रेरणा और महज़ प्रयोगशीलता के शौक़ की एक लहर से ज़्यादा कुछ और नहीं है।
उर्दू के नए अफ़सानानिगारों में प्रतीक और अमूर्तता से लगाव ने जो बेतुका शोर खड़ा किया, वह अब अकादमिक शोध और समझ का विषय भी नहीं है। शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी के लफ़्ज़ों में नए अफ़साने के मुख्य निर्माता अनवर सज्जाद से लेकर समी आहूजा और नवीनतम पीढ़ी के लेखकों तक, कहीं भी प्रतीक और अमूर्तता का यह नियम अपने क़दम जमा न सका। इंतज़ार हुसैन के अनुसार, इस तरह के नए लिखने वाले बहुत जल्द पिचक गए। अनवर सज्जाद ने बेशक कुछ असाधारण अफ़साने लिखे मगर वह जल्द ही थक कर बैठ गए। प्रयोग वही अच्छा जो साँस लेने की तरह स्वाभाविक बन जाए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि मंटो के दौर ने यथार्थवादी अफ़साने और नेचुरलिज़्म (naturalism) का जो पैमाना क़ायम किया था, उससे प्रतीकात्मक और अमूर्त अफ़साने का टकराव मूल रूप से महज़ एक कल्पना था। या यह सारा टकराव सिर्फ़ बनावटी और ख़याली या फ़ेक (fake) था। अफ़साना या तो अफ़साना होगा या अफ़साना होगा ही नहीं। हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि बीसवीं सदी के छठे दशक के दौरान, प्रगतिशील आंदोलन पर छाने वाले पतन के साथ, आधुनिकता के रुझान की नुमाइंदगी का ऐलान करने वाले कुछ अफ़सानानिगारों ने कहानी की मौत का जो घोषणापत्र आम किया, उसके बैकग्राउंड में इतिहास की मौत, अक़ीदे (आस्था) की मौत, आइडियोलॉजी की मौत और शायरी की मौत, यहाँ तक कि इंसान की मौत के ऐलानों की गूँज भी थी।
कुछ नए अफ़सानानिगारों ने इस लगातार मौत के विस्तार की प्रक्रिया में अपने-आप को साबित करने के लिए अफ़साने को भी शामिल कर लिया था। एक मान्यता यह भी सामने आई कि अब शायरी और अफ़साने के बीच की लकीर ग़ायब हो चुकी है और नया अफ़साना एक नई परिभाषा की माँग कर रहा है, जो गद्य और पद्य के पारंपरिक बँटवारे को मिटा दे, ठीक उसी तरह जैसे नए समाज के अकेले व्यक्ति ने जीते-जागते किरदार और उसकी अमूर्तता या हीरो और एंटी-हीरो का फ़र्क़ ख़त्म कर दिया है।
ज़ाहिर है कि यह चलन नए अफ़साने को रास नहीं आया क्योंकि इसके नतीजे में अफ़साने का पाठक ग़ायब होता जा रहा था, और अफ़साना नया हो या पुराना, उसके बचे रहने की ज़मानत या उसकी survival kit उसका पाठक है। अफ़साना तो अफ़साना, ऐसी शायरी भी जो अपने पाठक के सामने एक बेमज़ा पहेली या puzzle के तौर पर सामने आए और इस्तेमाल की हिदायत के बिना किसी काम की न हो, ज़्यादा दिनों तक नहीं चलती। उसका वजूद न के बराबर है।
अगस्त 1971 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग ने उर्दू फ़िक्शन पर तीन दिन का सेमिनार आयोजित किया था। उर्दू के कई मशहूर नए अफ़साना निगार शायद पहली बार एक बाक़ायदा चर्चा के लिए इकट्ठा हुए थे। इस मौक़े पर कुछ ऐसे पर्चे भी पढ़े गए जिनकी अहमियत आज तक बाक़ी है। मसलन, सुरिंदर प्रकाश ने अपने आलेख में कहा था, आधुनिक अफ़साने का मक़सद यह बिल्कुल नहीं कि अफ़साना निगार कच्चे-पक्के तजुर्बात, अपने पूर्वाग्रहों और अपने complexes को पढ़ने वाले पर थोपे, बल्कि मैं अदब को अपनी ज़ात के इज़हार का ज़रिया नहीं समझता, Self-exploration का ज़रिया समझता हूँ और इसके तजुर्बे में अपने पाठक को participate करने के लिए उकसाता हूँ, ताकि जो नतीजे सामने आएँ उनका एक सा तजुर्बा दोनों को हासिल हो। मैं अदीब की हैसियत एक आम आदमी की सी मानता हूँ, उसे पैग़ंबर बनाने के रवैये पर एतराज़ करता हूँ। (उर्दू फ़िक्शन, संपादक आल अहमद सुरूर, प्रकाशन 1973, पेज 363)
हमारे रेडिकल अफ़साना निगार बलराज मेनरा ने बहुत दो टूक लहज़े में यह ख़याल पेश किया है कि, आधुनिकता की शुरुआत कुछ एक संवेदनशील, दुखी और नाराज़ नौजवानों का आंदोलन थी। इन चंद लिखने वालों की नाराज़गी जो ग़लत या सही तो हो सकती है, सच्ची थी। इसलिए नई तहरीर का मुश्किल और ख़तरनाक काम होता रहा है। आख़िरकार वही हुआ जो प्रगतिशील आंदोलन के साथ हुआ था। स्वार्थी लोग आए, क़रीब आए, घुल-मिल बैठे और जल्द ही वह वक़्त आ गया जब नई नस्ल की नाराज़गी का इज़हार जो एक सकारात्मक मूल्य है, एक बेढंगे, दिशाहीन घोषणापत्र में गुम हो गया। (हवाला वही, पेज 413)
याद कीजिए कि 'कछुए' (प्रकाशन 1981) में इंतज़ार हुसैन ने नए अफ़साना निगार के नाम जो खुला ख़त शामिल किया था, उसका संबोधन बलराज मेनरा से ही था। इंतज़ार साहब ने लिखा था, मेरे अज़ीज़! मेरे हरीफ़ (प्रतिद्वंद्वी)! नए अफ़साना निगार बलराज मेनरा! नया अफ़साना तुम्हें मुबारक हो। मगर मबाश मुनकिर-ए-ग़ालिब कि दर ज़माना-ए-तुस्त। तुमने बाक़र मेहदी को बीच में डालकर मुझसे जवाब-तलबी की है। तुम्हारे बयान के मुताबिक़, वह कहते हैं कि इंतज़ार हुसैन की दास्तान या कथा प्रतीकात्मक (अलामती) और अमूर्त (तजरीदी) अफ़साने के लिए बहुत बड़ा चैलेंज है। अभी मैंने उनके रिसाले (पत्रिका) में उनका मज़मून पढ़ा है जिसमें उन्होंने अपना बयान दोहराया और लिखा है, नए अफ़साने का मुक़ाबला प्रगतिशील अफ़साने से नहीं, बल्कि दास्तानवी कहानी से है जिसके नुमाइंदे इंतज़ार हुसैन हैं।
इंतज़ार साहब आगे लिखते हैं, ऐ नए अफ़साना निगार, ऐ मेरे अज़ीज़! मुझे पता है कि नए अफ़साना निगार के हिस्से में भी कुछ तकलीफ़ें आई हैं। ऐसा न होता तो नया अफ़साना कैसे वजूद में आता, उर्दू अफ़साना वही 36 वाली लकीर का फ़क़ीर बना रहता। अब भी कितने हैं जो इस लकीर को पीटे जा रहे हैं, हालाँकि साँप निकल चुका है, मगर जो छोटी सी तकलीफ़ इस फ़क़ीर के नसीब में लिखी गई है, वह तुम्हें नहीं मिली, यानी न मेनरा को, न सुरिंदर प्रकाश को, न अपने पाकिस्तान के अनवर सज्जाद को, बस इस तकलीफ़ ने मुझे काम का आदमी नहीं रहने दिया, वरना मैं भी अफ़साने की नई तकनीकें सीखकर नया अफ़साना निगार बनने की कोशिश करता।
यह एक दिलचस्प तहरीर है जिसमें नए-पुराने अफ़साने के छुपे हुए पहलुओं पर इंतज़ार साहब ने अपने ख़ास पेचीदा अंदाज़ में कई अर्थपूर्ण और बहस-तलब बातें कही हैं। यहाँ उन सबका अहाता करना (समेटना) तो मुमकिन नहीं, फिर भी चर्चा के अधीन विषय और मसले के मद्देनज़र इस तहरीर का एक और अंश दोहराना ज़रूरी है। कहते हैं, इस उपमहाद्वीप के हज़ारों बरसों में से मुख़्तलिफ़ 'कल' मेरे तसव्वुर (कल्पना) में रचने लगे, और भी 'कल' होंगे जो मेरे अंदर हैं मगर मुझे उनका शऊर (एहसास) नहीं। सब दिन और सब ज़माने हमारे अंदर हैं मगर हम अपनी तंगदिली से उन्हें मारकर अतीत बना देते हैं और अपने अंदर दफ़्न कर देते हैं। हमारे अंदर एक बड़ा क़ब्रिस्तान है जिसमें जाने कितने 'आज', 'कल' बनकर दबे पड़े हैं।
जब मैं सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि अलिफ़ लैला, आग का दरिया और कथा सरित सागर तीनों मेरे ही ज़माने की किताबें हैं, सो जैसे मेरा समकालीन बलराज मेनरा, वैसे मेरे समकालीन सोमदेव जी। सो मेरे भाई! यह तो नहीं हो सकता कि तुम्हारी ख़ातिर और तुम्हारे ज़रा से 'आज' की ख़ातिर सोमदेव जी के समकालीन होने से इनकार कर दूँ। आगे तुम सोचो! (हवाला वही, पेज 738)
यहाँ सामने की बात रहस्यवाद और मेटाफ़िज़िक्स (पराभौतिकी) की हदों में दाख़िल हो गई है। ज़ाहिर है कि इसकी अपनी अहमियत है और हर लिखने वाले के हिसाब से इसका अपना नज़रिया। इसकी तफ़सील में विषय से हटकर भटक जाने का अंदेशा है। इसलिए फ़िलहाल मैं सिर्फ़ इतना अर्ज़ करना चाहता हूँ कि नया अफ़साना इतिहास के ख़िलाफ़ नहीं, इतिहास को एक ख़ास नज़रिए से देखने के ख़िलाफ़ है। हमारा एक अतीत वह भी तो है जो महज़ आर्काइव्ज़ की मिल्कियत नहीं बन सका है और सदियों की ऊबड़-खाबड़ सतह को पार करता हुआ, हमारे 'आज' यानी वर्तमान के दायरे में दाख़िल हो गया है और इंतज़ार हुसैन समेत बहुत से नए लिखने वालों का मसला बना हुआ है।
इस अंश में इंतज़ार साहब का इशारा जिस अतीत की तरफ़ है, वह एक लिहाज़ से रचनात्मक स्तर पर नए सिरे से गढ़ा हुआ अतीत है और नए अफ़साना निगार की समझ और रचनात्मक ईजाद की खोज है। इस रवैये ने नए अफ़साने में बेशक एक नए आयाम का इज़ाफ़ा तो किया है मगर असल मसले से हमें दूर भी कर दिया है। बहरहाल यहाँ अपने वक़्त और इस बातचीत की हदों की वजह से इस मसले में उलझने के बजाय मैं आसिफ़ फ़र्रुख़ी के इन चंद जुमलों पर यह बात ख़त्म करना चाहता हूँ कि, अफ़साने का नक़्क़ाद (आलोचक) अगर ख़ुद भी अफ़साना निगार हो तो उसके साथ यह मुश्किल पेश आती है कि वह सचेत रूप से अपने अफ़सानवी अमल या तरजीहों की दलीलें पेश करता हुआ नज़र आता है। ख़ैर, यह कोई शरई ऐब (बुनियादी ख़राबी) भी नहीं, इसलिए कि इंतज़ार हुसैन की तनक़ीद में शिद्दत और चमक आती ही उस वक़्त है जब वह अपने ऐसे किसी पूर्वाग्रह का बचाव पेश कर रहे हों जो उनके अफ़सानवी अमल से फूटा हो। (प्रस्तावना - अफ़साने की तलाश, नैयर मसूद, प्रकाशन 2011, पेज 8)
मगर इंतज़ार हुसैन ने ऐसे अफ़साने भी लगातार लिखे हैं जिनकी जड़ें हमारे और ख़ुद इंतज़ार हुसैन के ख़ास वर्तमान में दूर तक फैली हुई हैं और उनके माध्यम से जो सच्चाई सामने आई है वह आज के साहित्यकार, कला, और जनसंचार माध्यमों (मास मीडिया) की साझा संपत्ति और पहचान है। यह संपत्ति और पहचान है क्या? रचनात्मक बेचैनी, उदासी, और नाराज़गी के वे तत्व जो इस दौर की चेतना को मौजूदा राजनीतिक संस्कृति, सत्ता के असंतुलन, उपभोक्तावाद, हाइपर टेक्नोलॉजी, धार्मिक और वैचारिक कट्टरपंथ और पर्यावरण प्रदूषण की देन हैं। प्राकृतिक जीवन के सार, राजनीति और नैतिकता या साहित्य और सामूहिक मूल्यों के विचार से दूरी ने हमारी दुनिया और ज़माने के लिए जिन ख़तरों को जन्म दिया है, उनको समझने-समझाने की ज़िम्मेदारी आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी से ज़्यादा सामाजिक और मानवीय विज्ञान के व्याख्याकारों पर आ पड़ी है। हमारे दौर का साहित्य और कला भी इससे अछूते नहीं हैं। साहित्यकार हमारे समाज का सबसे कमज़ोर और बेबसी के एहसास से ग्रस्त व्यक्ति ही सही, मगर इस ज़िम्मेदारी का बोझ अपनी क्षमता भर उसने भी उठा रखा है। वह अपने दौर की अंतरात्मा भी है। नैयर मसूद के शब्दों में,
इस मामले में अफ़साना जनसंचार माध्यमों का मुक़ाबला नहीं कर सकता लेकिन उसने मिसाल के तौर पर दंगों और हिंसा के विषय को छोड़ नहीं दिया है, अलबत्ता अफ़साना निगार (कहानीकार) इस तरह की घटनाओं का विवरण बयान करने और उनकी कैमरे वाली तस्वीरें दिखाने के बजाय यह दिखाने पर ज़ोर देता है कि यह बाहरी स्थिति व्यक्ति के भीतर उतर कर क्या असर कर रही है। (अफ़साने की तलाश, पृ. 62)
अपने समय और स्थान, अपने सामने की बनती, बदलती, बिगड़ती और बिखरती हुई तारीख़ (इतिहास) का गवाह शायरी से ज़्यादा, आज का अफ़साना है। होना भी यही चाहिए था, क्योंकि अफ़साना बहरहाल, इसी परेशान सोच और अपने हाल से दुखी ज़मीन की आवाज़ है, कोई आकाशवाणी (नवा-ए-सरोश) नहीं है। इसके सातों सुर ख़ुद इसको आधार मुहैया करने वाली ज़िंदगी के साज़ से पैदा होते हैं। और जैसा कि पहले ही अर्ज़ किया जा चुका है कि अफ़साना निगार के लिए लिखने से पहले अपने समय और स्थान के बारे में सोचने, चीज़ों और परिघटनाओं को समझने, फिर अफ़साने को तलाश करने, खोजने, और बयान करने की मंज़िल आती है।
लिहाज़ा ऐसे वक़्त में जब लिखने वाले का अनुभव मंटो और उनके समकालीनों का ही नहीं, बल्कि बाद के अफ़साना निगारों—इंतज़ार हुसैन, क़ुर्रतुल ऐन हैदर, इकरामउल्लाह, अब्दुल्लाह हुसैन, मोहम्मद सलीम उर रहमान, ज़मीरउद्दीन अहमद, मसूद अशअर, हसन मंज़र, ख़ालिदा हुसैन और अनवर सज्जाद से लेकर असद मोहम्मद ख़ां और नैयर मसूद—की कहानियों के सामने आने के बावजूद पहले से ज़्यादा सीमित होता जा रहा हो, और उसके सरोकार सिमटते जा रहे हों, तो उसकी मुश्किल और बढ़ जाती है। मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों) के बढ़ते हस्तक्षेप, राजनीति की गर्म-बाज़ारी, हिंसा के नित-नए रूपों और नैतिकता व मूल्यों के प्रति दिन-ब-दिन बढ़ती संवेदनहीनता और बेबसी ने नए अफ़साना निगार के सामने एक विशाल और रंगारंग वैचारिक परिदृश्य बिछा दिया है। दर्शन, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान द्वारा प्रदान किए गए इस परिदृश्य की व्याख्या और चित्रण की प्रक्रिया में किसी न किसी हद तक और किसी न किसी स्तर पर नया अफ़साना निगार भी शामिल है। यह जीते-जागते अनुभव का विकल्प तो नहीं मगर मानवीय जीवन, अस्तित्व और उसके संकट की रचनात्मक व्याख्या का एक प्रभावी साधन ज़रूर है।
अफ़साने और अफ़साना निगार की भूमिका की निर्भरता कभी भी सिर्फ़ सनसनीख़ेज़ी पर, करतबबाज़ी पर, या आम पाठक की दिलचस्पी का सामान पैदा करने पर नहीं रही है। और अब तो फ़िक्शन के साथ-साथ अनहोनी घटनाओं और अपराधों की रिपोर्टिंग से भरे हुए अख़बारों और न्यूज़ चैनलों का जाल बिछा हुआ है। यह एक लिहाज़ से पॉप-फ़िक्शन (pop-Fiction) का ही एक रूप है। इस स्थिति ने नए अफ़साना निगार के लिए और भी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। अपने अफ़साने का बीज उसे स्मृति की ज़मीन से फूटता हुआ शायद अब मुश्किल से ही दिखाई देता है। अपनी स्थिति के संदर्भ में चाहे मसूद अशअर अपने घर का हाल लिख रहे हों या आसिफ़ फ़र्रुख़ी शहर बीती बयान कर रहे हों, आज का रिश्ता गुज़रे हुए कल के बजाय आने वाले कल से जुड़ जाता है।
यह लय इंतज़ार हुसैन के हालिया अफ़सानों और दूसरी रचनाओं में भी तेज़ हो गई है। प्रतिरोध के एक ख़ास रवैये और भविष्यवाद (फ़्यूचरिज़्म) की एक लहर ने, इसीलिए, नए अफ़साने के एक ज़रूरी तत्व का रूप ले लिया है। ख़ालिद जावेद, सिद्दीक़ आलम, और सैयद मोहम्मद अशरफ़ के अफ़सानों में खुला राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाए बिना, इस तत्व ने एक ख़ास अर्थ ग्रहण किया है। इत्तेफ़ाक़ से ये तीनों अफ़साना निगार हिंदुस्तान के रहने वाले हैं। मगर उनके प्रसिद्ध समकालीन, एक और हिंदुस्तानी अफ़साना निगार, मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी ने नए अफ़साने की अविभाजित परंपरा के हिसाब से इस राय का इज़हार किया था कि,
फ़िक्शन के नए हस्ताक्षर साहित्य में ग़ायब हैं। पुराने हस्ताक्षर और कमोबेश जिन्हें आज भी नौजवान क़लमकार कहकर पेश किया जा रहा है, उनमें से ज़्यादातर लोग पचास नहीं बल्कि साठ से ज़्यादा की उम्र गुज़ार चुके हैं। यह लिखते समय तक मैं ख़ुद भी उम्र की बयालीस बहारों और बयालीस पतझड़ों का हिसाब ले चुका हूं और आप जानिए कि मंटो तो इस उम्र में अपने शाहकार (मास्टरपीस) छोड़कर विदाई का परवाना भी लेकर आ गया था। उर्दू साहित्य में इससे ज़्यादा अंधेरे का इससे पहले कभी एहसास नहीं हुआ था। (त्रैमासिक आइंदा, कराची, अंक 35/36, अक्टूबर से दिसंबर 2004)
नए अफ़साने के पाठक और उसके निर्माता, दोनों को कभी ईमानदारी के साथ इस मसले पर भी ग़ौर करना चाहिए कि इस ख़राबी का बुनियादी कारण क्या है? महमूद अयाज़ ने अपनी पत्रिका 'सौग़ात' में रचनात्मक क्षमता के इस अकाल से तंग आकर कह दिया था कि ऐसे लोग जो लिखने का सलीक़ा नहीं रखते, उन्हें कुछ और करना चाहिए। ख़ैर यह तो एक प्रशिक्षित पाठक की प्रतिक्रिया थी और यह मशवरा ऐसों के लिए था जो लिखने की प्रक्रिया को काग़ज़ काले करने से ज़्यादा एक पवित्र कर्तव्य निभाने के तौर पर देखते हों।
मगर अब ज़रा यह भी देखिए कि एक बाकमाल अफ़साना निगार का दृष्टिकोण इस मामले में क्या है,
अच्छे अफ़साने आज भी अच्छी तादाद में लिखे जा रहे हैं। इस लिहाज़ से तो स्थिति संतोषजनक है लेकिन अच्छे अफ़सानों के मुक़ाबले में बुरे अफ़सानों का अनुपात आज जितना ज़्यादा है उतना पहले नहीं था और बुरे अफ़साने भी आज जितने बुरे लिखे जा रहे हैं उतने बुरे कभी नहीं लिखे गए और यह बात इत्मीनान में ख़लल पैदा करती है। (नैयर मसूद, आज का अफ़साना और अफ़साने का भविष्य क्या है? अफ़साने की तलाश, पृ. 44)
रात से कहानी के संबंध की परंपरा पुरानी है, लेकिन अब हालत यह है कि अंधेरे के इस माहौल में जहां-तहां रोशनी के कुछ छींटे हमें ज़्यादा दूर तक तो नहीं ले जा सकते। यूं भी अंधेरा तरह-तरह की आशंकाएं और शक पैदा करता है। सो इस ख़स्ता-हाली से छुटकारे की सूरत क्या होगी, सिवाय इसके कि नया अफ़साना निगार अपने आप से उलझते रहने के अलावा पीछे मुड़कर उर्दू अफ़साने की परंपरा के कुछ सबक़ भी दोहरा लिया करे। हम कहां से चले थे और कहां आ पहुंचे? इस सवाल का जवाब अपने आप से पूछने की ज़रूरत आज शायद पहले से ज़्यादा है।
मुख्य भाषण, मंटो सेमिनार (नया उर्दू अफ़साना), लम्स (LUMS), लाहौर, अप्रैल 2012
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