मंटो और फ़ह्हाशी
मंटो एक घटना का शीर्षक है। हमारे कथा-साहित्य के इतिहास की शायद सबसे अहम, सार्थक और मुकम्मल घटना का। इस घटना की शुरुआत उनकी पहली कहानी के साथ हुई थी। अब अगर आप किसी साहित्यिक इतिहासकार से पूछें तो वह बताएगा कि इस घटना का अंतिम बिंदु 1955 के जनवरी महीने की अठारहवीं तारीख है। वह पल जो खुद मंटो के लिए इस घटना के सिलसिले से उकताहट का सबसे तीव्र पल था और जब मरने से पहले बार-बार उनके होंठों पर ये शब्द आए थे कि अब यह ज़िल्लत खत्म हो जानी चाहिए! लेकिन यह एक ऐसी ज़िल्लत थी जो मंटो की मौत के साथ भी खत्म न हो सकी।
इस पल ने मंटो को अपने मुकदमों की पैरवी से तो छुटकारा दिला दिया, मगर ऑनरेबल जस्टिस दीन मोहम्मद, जिन्होंने मंटो के वजूद को साहित्य के लिए कलंक करार दिया था, इस पल के बाद भी ज़िंदा रहे और मंटो की ज़िल्लत के साथ-साथ एक निंदक वर्ग का किस्सा भी चलता रहा। असल में व्यक्ति चाहे विदा हो जाएं, सोचने, जीने और ज़िंदगी को बरतने के वे तौर-तरीके जिन्हें हम किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ सकें, ज्यों के त्यों कायम रहते हैं। इसलिए एक तौर-तरीका मंटो का व्यक्तित्व था जो अपने भौतिक और समय के रिश्तों से कटने के बाद भी ज़िंदा है। इसी तरह एक और तौर-तरीका निंदा, गाली-गलौज और कड़ी निगरानी का वह असीम कहर है जिसका स्रोत कभी न्याय के तराजू का तमाशा करने वाले रहे, तो कभी प्रगतिशील और निर्माणवादी आलोचक और पाठक। तो यह तौर-तरीका भी किसी न किसी स्तर पर अब तक सांस लिए जा रहा है। दोनों एक-दूसरे से संघर्षरत हैं।
यह दुखद सिलसिला उस वक्त तक जारी रहेगा जब तक ज़िंदगी से आँखें चार करने और ज़िंदगी से आँखें चुराने का चलन आम रहेगा। ज़िंदगी की बुनियादी सच्चाइयों की तरह कुछ धोखे भी समय और स्थान की कैद से परे होते हैं और उनके एक-दूसरे से टकराने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। ऐसा न हो तो शायद उनकी पहचान भी बाकी न रह जाए। ज़िंदगी की कोख से जन्म लेने वाली हर सच्चाई, हर जज़्बे, हर मूल्य, हर रवैये की हैसियत सापेक्ष (एक-दूसरे पर निर्भर) होती है और उनकी पहचान कायम करने का सबसे विश्वसनीय ज़रिया वह आईना है जो किसी अलग, विपरीत और टकराने वाले रवैये का अक्स दिखाने का साधन बनता है।
मंटो की विशिष्टता और उसकी बनावट में शामिल तत्वों की खोज भी हम इन विरोधाभासों के हवाले से करते हैं, जिनका परिदृश्य मंटो की साहित्यिक परंपरा या उनके दौर की साहित्यिक स्थिति से अलग हटकर उनके सामाजिक माहौल ने तैयार किया था, जिसकी बुनियाद मंटो के वर्तमान के अलावा उनके अतीत पर भी कायम है। जिसके झरोखों से गुज़र कर हम तक पिछले ज़मानों की बिसात पर फैले हुए कई और विविध मानवीय अनुभवों के उजाले और अंधेरे की पहुँच होती है। जो एक साथ पुराना भी है और नया भी। इसलिए यह अतीत और वर्तमान को एक-दूसरे से अलग करने वाली टेढ़ी लकीर को मिटाता है और कम से कम मंटो की हद तक नए-पुराने के किस्से को संकीर्ण दृष्टि का प्रमाण ठहराता है।
शायद इसीलिए मंटो की हैसियत एक ऐसे मसले की है जो स्थायी और निरंतर है। इस मसले को अपने-अपने तरीके से हल करने की कोशिश बहुत से लोग करते रहते हैं। इन लोगों में मंटो के प्रकाशक, पाठक, आलोचक और निगरानी करने वाले सभी शामिल हैं। किसी के नज़दीक इस मसले का आर्थिक पहलू सबसे अहम बन जाता है। कोई इसे केस हिस्ट्री के तौर पर पढ़ता है और यौन मनोविज्ञान की शब्दावली में इसकी उलझनों का सिरा ढूँढता है। कुछ इसमें मज़ा लेने का सामान तलाश करते हैं। कुछ अपनी कलात्मक ज़रूरतों को पूरा करने का। इनमें सबसे दिलचस्प हाल निंदक वर्ग के उन महानुभावों का है जिनके लिए मंटो के साये का वजूद एक लगातार परेशानी का कारण है, क्योंकि उसके शरारती कदमों की आहट सुंदर नज़ारे के दर्शन की पवित्र और शुद्ध प्रक्रिया में बार-बार रुकावट बनती है। ज़ाहिर है कि इस मुसीबत का इलाज साहित्य की शब्दावली के बस का नहीं, इसलिए यह जोखिम उठाने पर उनका मन तैयार नहीं हुआ और उन्होंने हाथों में पत्थर सँभाल लिए।
पत्थरों की यह बारिश इसलिए खत्म नहीं होती क्योंकि उस ज़िल्लत का सिलसिला भी अभी तक कायम है जिसने मंटो के होश-ओ-हवास को थका डाला था। इसलिए हम यह सोचने में सही होंगे कि मंटो का वजूद जिस घटना से परिभाषित था, वह आज भी जारी है। उनकी मौत के साथ न तो जीने का वह तौर-तरीका खत्म हुआ है, न लिखने का। मेरे इस वाक्य का मतलब वह हरगिज़ नहीं जो व्याकरण और भाषा-विज्ञान के विशेषज्ञ समझेंगे। अस्करी ने मंटो के व्यक्तित्व को ज़िंदगी के एक तौर-तरीके का नाम दिया था। मेरा खयाल है कि मंटो उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं जिनके यहाँ जीने और लिखने के शाब्दिक अर्थ नहीं होते और आशय के लिहाज़ से वे एक हो जाते हैं। इसलिए हम उनके बारे में कोई भी बातचीत सिर्फ उनके आम मानवीय व्यक्तित्व के हवाले से नहीं कर सकते। उनका जीना और उनका लिखना एक-दूसरे के पूरक हैं और अपने आपसी विलय से उस इकाई को जन्म देते हैं जो एक लगातार गतिशील, विकासशील और समय व स्थान के स्तर से ऊँची, असीमित और अनिर्धारित घटना की हैसियत अख्तियार कर लेती है।
इस स्थिति ने मंटो को एक अनोखी, अटल और कुछ मायनों में एक अजेय ऊर्जा का प्रतीक बना दिया है। उनके हर पाठक पर यह शर्त लागू होती है कि मंटो के बारे में किसी सार्थक बातचीत का इरादा करने से पहले वह उन तकाज़ों को समझे, जिन्हें उनकी कहानियों से अलग किसी भी वैचारिक, नैतिक या भावनात्मक स्तर पर समझना मुमकिन नहीं है। बुनियादी तौर पर मंटो की चुनौती एक साहित्य रचने वाले की चुनौती है। इस चुनौती की सच्चाई से इनकार करने वाला न मंटो की पहचान का दावेदार हो सकता है, न ज़िंदगी के उन शाश्वत दायरों का, जिनका पहचान-पत्र मंटो की रचनाएँ हैं। अपनी इस हैसियत का अंदाज़ा खुद मंटो को भी था।
इसलिए उन्होंने कभी भी किसी मूल्य, विचारधारा, नैतिक या सांस्कृतिक अवधारणा या सुधारवादी जोश और जज़्बे को अपनी बैसाखी बनाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। वह इस भेद से वाकिफ थे कि एक साहित्यकार की हैसियत से जिन हकों को अदा करने का बोझ उन्होंने सँभाल रखा है, एक व्यक्ति की ज़िंदगी उससे ज़्यादा का बोझ नहीं उठा सकती। लेकिन ज़ाहिर है कि मंटो जैसे साहित्यकार की तरह ज़िंदगी भी अपनी कुछ शर्तें रखती है और हर व्यक्ति से, चाहे वह मंटो ही क्यों न हो, कुछ तकाज़ों को पूरा करने की माँग करती है। इसलिए मंटो के नाखूनों पर भी कुछ गांठें खोलने का कर्ज़ लदा रहा।
ठंडा गोश्त का मुकदमा करीब-करीब एक साल चला। निचली अदालत ने मुझे तीन महीने की कठोर कैद और तीन सौ रुपये जुर्माने की सज़ा दी। सेशन में अपील की तो बरी हो गया। (इस आदेश के खिलाफ सरकार ने हाई कोर्ट में अपील दायर कर रखी है। मुकदमे की सुनवाई अभी तक नहीं हुई है।)
इस दौरान मुझ पर जो गुज़री, उसका कुछ हाल आपको मेरी किताब, 'ठंडा गोश्त', की भूमिका में 'ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख्शां' शीर्षक के तहत मिल सकता है। दिमाग की कुछ अजीब ही हालत थी। समझ में नहीं आता था कि क्या करूँ। लिखना छोड़ दूँ या सेंसरशिप से बिल्कुल बेपरवाह होकर कलम चलाता रहूँ। सच पूछिए तो मन इस कदर खट्टा हो गया था कि जी चाहता था कि कोई चीज़ अलॉट हो जाए तो आराम से किसी कोने में बैठकर कुछ साल कलम और साहित्य से दूर रहूँ। दिमाग में खयाल पैदा हों तो उन्हें फाँसी के तख्ते पर लटका दूँ। अलॉटमेंट मयस्सर न हो तो ब्लैक मार्केटिंग शुरू कर दूँ या अवैध रूप से शराब बनाने लगूँ।
आख़िरी काम मैंने इसलिए नहीं किया क्योंकि मुझे इस बात का डर था कि सारी शराब मैं ख़ुद पी जाया करूँगा। ख़र्च ही ख़र्च होगा। आमदनी एक पैसे की भी न होगी। ब्लैक मार्केटिंग इसलिए न कर सका कि पूँजी पास न थी। एक सिर्फ़ अलॉटमेंट थी जो काम की साबित हो सकती थी। आपको हैरानी होगी मगर यह सच है कि मैंने इसके लिए कोशिश की। पचास रुपये हुकूमत के ख़ज़ाने में जमा कराके मैंने दरख़्वास्त दी कि मैं अमृतसर का शरणार्थी हूँ। बेरोज़गार हूँ इसलिए मुझे किसी प्रेस या सिनेमा में कोई हिस्सा अलॉट फ़रमाया जाए।
दरख़्वास्त के फ़ॉर्म छपे हुए थे। एक अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की प्रश्नावली थी। हर सवाल इस क़िस्म का था जो यह माँग करता था कि दरख़्वास्त देने वाला पेट भर के झूठ बोले। अब यह ऐब मुझमें शुरू से रहा है कि झूठ बोलने का सलीक़ा नहीं है। मैंने अलॉटमेंट कराने वाले बड़े-बड़े घाघों से मशवरा किया तो उन्होंने कहा कि तुम्हें झूठ बोलना ही पड़ेगा। मैं राज़ी हो गया। लेकिन जब छपे हुए फ़ॉर्म की ख़ाली जगहें भरने लगा तो रुपये में सिर्फ़ दो या तीन आने झूठ बोल सका। और जब इंटरव्यू हुआ तो मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि साहब जो कुछ दरख़्वास्त में है, बिल्कुल झूठ है। सच्ची बात यह है कि मैं हिंदुस्तान में कोई बहुत बड़ी जायदाद छोड़कर नहीं आया, सिर्फ़ एक मकान था और बस। आपसे मैं ख़ैरात के तौर पर कुछ नहीं माँगता।
मैं अपने गुमान में बहुत बड़ा अफ़साना-निगार था, लेकिन अब मुझे महसूस हुआ कि यह काम मेरे बस का नहीं। अल्लाह मियाँ, मियाँ एम. असलम और भारती दत्त को सलामत रखे। मैं उनके हक़ में अपनी अफ़साना-निगारी से किनारा करता हूँ और सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि हुकूमत मुझे कोई ऐसी चीज़ अलॉट कर दे जिसके लिए मुझे काम करना पड़े और उस काम के मेहनताने के तौर पर मुझे पाँच-छह सौ रुपये माहवार मिल जाया करें।
सआदत हसन मंटो
लाहौर। 11 जनवरी 1952
(गंजे फ़रिश्ते)
(2)
मंटो ने ज़िंदगी का जो ढंग अपनाया था वह ख़तरनाक हद तक पेचीदा और फ़रेब से भरा है। इस ज़िंदगी की सच्चाइयों के इर्द-गिर्द एक ऐसा धूल भरा घेरा हर वक़्त हमें चक्कर काटता हुआ दिखाई देता है कि कई बार सच्चाइयाँ नज़रों से ओझल हो जाती हैं और हमारी नज़र सिर्फ़ इस घेरे में उलझ कर रह जाती है। यह घेरा एक साथ उसकी ज़िंदगी और उसकी रचनाओं, दोनों के चारों तरफ़ फैला हुआ है। मंटो को छोड़कर उसके दोस्तों और सीधे-सादे आलोचकों ने भी ख़ासी धूल उड़ाई है। शायद मंटो की अपनी मर्ज़ी का भी इस मामले में ख़ासा दख़ल था। दूसरों से अलग, अनोखा और जिसकी उम्मीद न हो ऐसा दिखाई देने की एक शरारत भरी ख़्वाहिश, एक मामूली सी बात को किसी नए, रहस्यमयी नज़रिए से इस तरह कहने की चाहत कि सुनने वाला चौंक पड़े और हैरानी में पड़ जाए, यह रवैया बुनियादी तौर पर एक सौंदर्यशास्त्रीय (aesthetic) आयाम रखता है।
ज़ाहिर है कि इंसानी तजुर्बों के ज़्यादातर रूप ज़िंदगी के रोज़मर्रा के कामों का ही हिस्सा होते हैं। अक्सर लिखने वाले इन रोज़मर्रा की बातों को गरिमा देने के लिए उनके बयान में वह आसानी से मिलने वाला और आज़माया हुआ नुस्ख़ा इस्तेमाल करते हैं, जिसे एक सतही क़िस्म की भावुकता से पैदा होने वाले खोखले चिंतन या नैतिक दिखावे का नाम दिया जा सकता है। हैरानी इस बात पर होती है कि ख़ासे पढ़े-लिखे लोग भी इस काम के बाज़ारूपन को पहचानने में नाकाम रह जाते हैं और सच्चाई पर फ़रेब को, कला पर मुलम्मासाज़ी (दिखावे) को और हक़ीक़त सामने लाने पर एक बेजान लफ़्फ़ाज़ी को तरजीह देने के सतही रवैये का शिकार हो जाते हैं। यह सारी ख़राबी इसलिए पैदा होती है कि मसले के कलात्मक और सौंदर्यशास्त्रीय पहलुओं को नज़रअंदाज़ करके वे उसकी जज़्बाती, वैचारिक और नैतिक व्याख्याओं के रेगिस्तान में हक़ीक़त के ख़ज़ाने की तलाश करते हैं। ऐसी सूरत में मंटो की असल शख़्सियत का निगाह से ओझल हो जाना स्वाभाविक है।
अदब में इस रवैये के पिछड़ेपन को एक फ़ख़्र की बात का दर्ज़ा देने की ज़िम्मेदारी उन तरक़्क़ीपसंदों (प्रगतिशीलों) पर आती है जिन्होंने कला और शख़्सियत के रिश्तों को समझने में ग़लती की और उनके बीच के फ़ासले की हक़ीक़त से भी बेपरवाही से गुज़र गए। असल में उनका मसला अदब था ही नहीं। एक जादुई नुस्ख़े की लगातार तलाश का कुछ अंदाज़ा आप इस वाक़ये से लगा सकते हैं कि कुछ दिग्गज क़िस्म के तरक़्क़ीपसंद जाफ़र ज़टल्ली के कुल्लियात (समग्र रचनाओं) में सामाजिक बग़ावत के चंद निशानों की खोज को अपनी तलाश का हासिल समझ बैठे, एक लम्हे के लिए भी यह सोचे बिना कि अदब से गाली का काम लेना और गाली को अदब बनाना दो बिल्कुल अलग बल्कि एक-दूसरे के विरोधी रवैये हैं। एक की बुनियाद जज़्बाती और ज़हनी उत्तेजना पर है, दूसरे की अदब के सौंदर्यशास्त्रीय और कलात्मक अमल पर। यही वजह है कि मंटो को ख़ारिज और निंदनीय क़रार देने वालों में मौलवी और मुंसिफ़ (जज), सेहतमंद ख़यालात के फैलाव को अदब का मक़सद समझने वाले पत्रिकाओं के संपादक और ईश्वर प्रदत्त राज्य (पाकिस्तान) के सामाजिक सुधारक और निर्माता, अल्लामा ताजवर नजीबाबादी और तरक़्क़ीपसंद आलोचक, सब के सब एक साथ लामबंद दिखाई देते हैं।
प्रतिक्रिया की कमोबेश एक ही सतह का इज़हार इन तमाम लोगों के यहाँ हुआ है। इनमें ज़्यादातर अदब के ककहरे से भी अनजान थे और जिन्हें अदब की समझ का दावा था, उन तक यह इत्तला पहुँच नहीं सकी थी कि जदीद (आधुनिक) अदब के बुनियादी ख़यालात में से एक ख़याल यह जानी-पहचानी हक़ीक़त भी है कि कोई भी इंसानी तजुर्बा, जो एक सौंदर्यशास्त्रीय पहलू से जुड़ाव की गुंजाइश पूरी तरह खो न बैठा हो, एक अदीब का तजुर्बा बन सकता है। कोई भी ऐसा तजुर्बा कला के इलाक़ों से बाहर नहीं है जो एक कलात्मक अमल के ज़रिए एक ज़्यादा बड़े सौंदर्यशास्त्रीय रूप में ढलने की ताक़त रखता हो। अदब में 'फ़हाशी' (अश्लीलता) भी उसी तरह अपना वजूद रखती है जिस तरह फ़हाशी से पूरी तरह पाक और पवित्र अदब। अपने एतराज़ करने वालों के सीधेपन का मंटो को बख़ूबी इल्म था। इसलिए अदालतों में अपनी सफ़ाई के बयानों के अलावा मंटो ने अपने रवैयों के स्पष्टीकरण और व्याख्या के सिलसिले में जो मज़ामीन (लेख) लिखे हैं, उनमें उसका अंदाज़ कमोबेश वही है जो मंदबुद्धि छात्रों की भीड़ में एक सब्र करने वाले और नरम मिज़ाज उस्ताद का होता है।
उसकी सेंसरशिप का शिकार कहानियों पर उसके विरोधियों का भड़कना बिना वजह नहीं था, ख़ुद मंटो ने इरादतन इसकी वजह मुहैया कराई थी। मेरा ख़याल है कि इन हलक़ों की तरफ़ से अगर प्रतिक्रिया का इज़हार भड़कावे की इस सतह पर न हुआ होता तो मंटो को मायूसी हुई होती। जिस लिखने वाले के नज़दीक अपने पढ़ने वालों को भड़काने का काम एक ज़रूरी सौंदर्यशास्त्रीय और रचनात्मक प्रतिक्रिया को दावत देने के मक़सद से भरा हो, उसके काम की कामयाबी का दारोमदार ही इस हक़ीक़त पर है कि उसके पढ़ने वाले उम्मीद के मुताबिक़ असर क़बूल करने में असमर्थ न रह जाएँ। इस सिलसिले में यह धारणा बहुत हास्यास्पद है कि बुराई या मज़ा लेने का काम कलात्मक तजुर्बे का हिस्सा बनने के बाद अपनी असलियत से पूरी तरह अलग हो जाए और गुनाह एक नेकी के काम की शक्ल अख़्तियार कर ले। इस क़िस्म की कायापलट रचनात्मक तजुर्बे की सतह पर समझ से परे तो नहीं है, लेकिन इसे किसी आख़िरी उसूल का दर्ज़ा देना भी ग़लत है।
अब रही उस पाठक की बात जो फ़िक्शन के हर तजुर्बे को अपने अमल (व्यवहार) की बिसात पर नए सिरे से रचने की कोशिश करता है, और हक़ीक़त की आम अवधारणा को उसी की रचनात्मक कल्पना से अलग करने की क्षमता से वंचित है, तो इसमें क़ुसूर अफ़साना-निगार (कहानीकार) से ज़्यादा उसकी अपनी मानसिक और सांस्कृतिक परवरिश और समझ का है। इंसानी समाज में ऐसे साहसी और रोमांच-पसंद लोग भी मिल जाएँगे जो मज़हबी और चिकित्सा किताबों के पन्नों पर भी अपनी यौन भावनाओं को ऊर्जा देने वाले तत्व तलाश कर लेंगे। अब से बहुत पहले 1833 में नूह वेबस्टर नाम के एक सज्जन ने पवित्र बाइबिल की ज़बान और कुछ शब्दावली में संशोधन और काँट-छाँट की ज़रूरत महसूस की थी और अपनी समझ से अश्लील शब्द उससे निकाल दिए थे। सुधारवाद के इस उपदेशक जोश की बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई सूरत यह वाक़या है कि पिछली सदी के एक अज्ञात समीक्षक ने बाइबिल पर समीक्षा करते हुए एक पत्रिका में यह राय ज़ाहिर की कि इस पवित्र किताब की ज़बान बेहद अश्लील है और इस लायक़ नहीं कि इसे किसी सभ्य महफ़िल में दोहराया जा सके।
जब एक ऐसी किताब के सिलसिले में, जिसे हमारी ज़मीन पर बसने वाले लाखों लोग इंसानी समाज की भलाई और मुक्ति का एकमात्र ज़रिया मानते हैं, इस तरह की प्रतिक्रिया का इज़हार मुमकिन है तो हमें अल्लामा ताजवर नजीबाबादी के इन शब्दों पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि, ठंडा गोश्त किसी मस्जिद में या किसी मजलिस में सामूहिक रूप से सुनना पसंद नहीं किया जा सकता। अगर कोई पढ़े तो अपना सिर सलामत लेकर न जा सके। चालीस साला साहित्यिक ज़िंदगी में ऐसा घटिया और गंदा लेख मेरी नज़र से नहीं गुज़रा है।
यह बात तो मंटो की कल्पना में भी न आई होगी कि उसका कोई अफ़साना जुमे की नमाज़ का प्रवचन भी बन सकता है। फिर अगर सामूहिक रूप से उसे अपनी बात के सुने जाने का गुमान भी होता तो उसने एक अफ़साना-निगार के बजाय सड़क किनारे दवा बेचने वाले उन नीम-हकीमों की शैली अपनाई होती जो किसी आम सड़क के किनारे अपनी दुकानें सजाते हैं या रचनात्मक कलाकार के बजाय किसी चमत्कारी वक्ता के लहज़े में बात करते हैं। उसने अपने पाठक से वह रिश्ता क़ायम करने की कोशिश की थी जो एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से होता है। जो महफ़िल सजाने के बजाय अपने एकांत कक्ष में एक संन्यासी की तरह अपने तजुर्बात को एक नई सच्चाई का रूप देता है और उसे रोज़मर्रा की बातों की सतह से उठाकर एक रहस्योद्घाटन में बदल देता है। मंटो ने इस सच्चाई की सुरक्षा की ख़ातिर, अस्करी के शब्दों में, अहंकार का एक घेरा अपने अस्तित्व के चारों ओर खींचा कि यही सच्चाई उसकी वैयक्तिकता और संपत्ति थी।
मगर इस सच्चाई की प्राप्ति के लिए, ज़िंदगी की आम और स्पष्ट सतह पर उसने उन तमाम लोगों, चीज़ों और दृश्यों से संपर्क स्थापित किया जिनके संगम से इंसानी तजुर्बात का रंगमंच तैयार होता है और इन तजुर्बात की विविधता, उनके आपसी टकराव, और संघर्ष के नतीजे में पैदा होने वाली चिंगारियों का बोध होता है। सच्चाई की प्राप्ति की इस तलाश में उसकी आत्म-मुग्धता भी बाधक न हो सकी क्योंकि एक कहानीकार के रूप में मंटो इस रहस्य से परिचित था कि सच्चाई की खोज और उस तक पहुँच के लिए तजुर्बे की किसी एक विशेष और तयशुदा सतह की पाबंदी, किसी एक दिशा की पहचान, किसी एक दायरे में चक्कर लगाना काफ़ी नहीं हो सकता। इस सच्चाई को पाने की संभावना सबसे ज़्यादा उन लोगों के बीच हो सकती थी जो स्थापित मान्यताओं की परवाह किए बग़ैर, आम सामाजिक और नैतिक पाबंदियों की क़ैद से आज़ाद ज़िंदगी को उसके तमाम शोर-शराबे और उसकी सारी विनाशकारिताओं के साथ क़ुबूल करते हैं।
नेकी की हक़ीक़त को समझने के लिए बुराई का और बुराई के रहस्य से परिचय के लिए उसकी तह में छिपी सच्चाइयों का ज्ञान ज़रूरी है। इसीलिए मंटो ने किसी बंधे-टके उसूल या नज़रिए या मूल्य या सामाजिक दर्शन के बजाय ज़िंदगी को उस पेचीदा और हज़ार रूप वाले तर्क के ज़रिए समझने की कोशिश की जिसकी सामग्री इंसान का पूरा संवेदना तंत्र प्रदान करता है। उसके तजुर्बे महज़ बौद्धिक तजुर्बे नहीं थे, इन तजुर्बों का केंद्र सिर्फ़ रूह भी नहीं थी। चुनाँचे मंटो ने न तो किताबों को अपना मार्गदर्शक बनाया, न किसी बाहरी अवधारणा को। उसे सरोकार इंसानों से था, अमूर्तताओं (abstract concepts) से नहीं। और जो ताक़तें जीती-जागती हस्ती को एक अमूर्तता की शक्ल देने में सबसे ज़्यादा कारगर होती हैं, वे वही हैं जिन्हें इंसानी समाज नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का नाम देता है। एक नज़रिए से देखा जाए तो यह रवैया चाहे कितना ही सद्भावनापूर्ण क्यों न हो, इसकी बुनियाद व्यक्ति-हत्या बल्कि मानव-हत्या के एक देखने में हानिरहित उसूल पर क़ायम है।
पहली नज़र में यह बात अजीब मालूम होती है मगर हक़ीक़त यही है कि मंटो के यहाँ अपने बुरे से बुरे किरदार के लिए नफ़रत या घृणा की भावना का संकेत तक नहीं। वह क़ातिलों, व्यभिचारियों, शराबियों और ठुकराए हुए लोगों का ज़िक्र भी इस तरह करता है जैसे उनके कर्म यौन, भावनात्मक या शारीरिक हिंसा के तत्व से पूरी तरह मुक्त हैं। जैसे कि हर कर्म एक इंसानी आम कर्म की हैसियत से ज़िंदगी की किसी न किसी हक़ीक़त का रहस्योद्घाटन करता है और बस। मंटो ने अपनी हद यहीं क़ायम कर ली थी,
मैं सभ्यता-संस्कृति की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूँगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़ा पहनाने की कोशिश भी नहीं करता इसलिए कि यह मेरा काम नहीं, दर्जियों का है। लोग मुझे सियाह-क़लम (काली क़लम वाला) कहते हैं लेकिन मैं ब्लैकबोर्ड पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तेमाल करता हूँ कि ब्लैकबोर्ड का कालापन और भी ज़्यादा उजागर हो जाए। मंटो (अदब-ए-जदीद)
(3)
मंटो ने अपनी कहानियों को जज़्बात की अनुचित दख़लंदाज़ी से जिस तरह महफ़ूज़ रखा है, वह अपने आप में एक ग़ैर-मामूली वाक़या है। जज़्बाती होना शर्म की बात नहीं है क्योंकि यह गुण भी इंसान के मिज़ाज और स्वभाव का एक स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब कोई साहित्य रचने वाला जज़्बात की लगाम पर अपनी पकड़ मज़बूत रखने की क्षमता से वंचित हो जाता है तो बदनामी जज़्बात की भी होती है और उसके रचनात्मक चरित्र की भी। ऐसी सूरत में वह कलाकार नहीं रह जाता और इंसानी तजुर्बात के बोध की एक ऐसी सतह पर आ गिरता है जो व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि की रोशनी से पूरी तरह वंचित हो जाती है और अपने छिछोरेपन को छिपाने की ख़ातिर जज़्बात का तिलिस्म बाँधती है। इस रवैये को हम एक तरह के भावनात्मक सस्तेपन का नाम दे सकते हैं। मंटो ने जिन ज्वालामुखी जैसी सांस्कृतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों के संदर्भ में अपने तजुर्बात का इज़हार किया है, उसके मद्देनज़र यह कोई अनहोनी बात न होती अगर वह अपने कुछ नैतिकता के मारे समकालीनों की तरह उपदेशात्मक तड़क-भड़क और सुधारवादी जोश का घेरा अपने अस्तित्व के चारों ओर खींच लेता।
इस विचार-शैली को आप साहित्यिक अश्लीलता का नाम न दें, तब भी इस सच्चाई से इनकार नहीं कर सकते कि अपने उद्देश्य के लिहाज़ से फ़ायदेमंद और सेहतमंद होने के बावजूद यह रवैया रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर घटिया है। आम घटनाओं और भावनाओं से खुला लगाव और उनमें भीतरी अनुशासन से पूरी तरह खाली गंदगी भी एक तरह की असमर्थता और फूहड़पन है, ख़ास तौर से फ़िक्शन लिखने वाले के लिए। यह नज़रिया नेक इरादों के इज़हार को भी मसखरापन बना देता है। इसकी अधिकता का ज़रूरी नतीजा यह होता है कि लिखने वाला इंसानी सोच और फ़ितरत की प्राकृतिक माँगों या इंसान की आम शारीरिक क्रियाओं में हर पल क़ायम और मौजूद रिश्तों के एहसास से अनजान होकर खोखली कल्पनाओं के स्तर पर उसके कामों और इरादों की व्याख्या ढूँढने लगता है। अपने पसंदीदा किरदारों की ज़बान से वह कुछ कहलवाने में मगन हो जाता है, जो लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ उसकी नंगी चेतना की तख़्ती पर लिखा हुआ है।
आख़िरकार वह उस रहस्यमयी ख़ूबी से हाथ धो बैठता है जिसे हम फ़नकार की भीतरी ऊर्जा और उसकी व्यक्तिगत ताक़त का नाम दे सकते हैं, यानी यह कि वह इंसानी फ़ितरत से जुड़ी बासी ख़बरों का ढिंढोरची बन जाता है और ख़ुद उसका वजूद उसके पढ़ने वाले के लिए किसी नए रहस्य, गहरी समझ के किसी अनदेखे निशान, या ज्ञान की किसी अप्रत्याशित खोज का प्रतीक नहीं रह जाता।
मंटो ने इस मसले को भी इज़हार के उसी स्तर पर हल करने की कोशिश की है जिसे हम एक अदीब या फ़नकार का बुनियादी स्तर कह सकते हैं, यानी कि इज़हार का रचनात्मक और कलात्मक स्तर। यहाँ भी मंटो की रचनात्मक सोच और उसके आम कामों और ज़िंदगी के आम ढंग में हमें ज़बरदस्त तालमेल का एहसास होता है। जादूगरों और बाज़ीगरों से मंटो की दिलचस्पी किसी आम इंसान की दिलचस्पी नहीं थी। यह एक तरह का रचनात्मक तालमेल था या दूसरे के वजूद के आईने में अपनी पहचान और बतौर फ़नकार अपने मुक़ाम की पहचान की प्रक्रिया। उसे आम ज़िंदगी में अपने दोस्तों को और अपनी रचनाओं के ज़रिए अपने पाठकों को चौंकाने की जो तलब परेशान रखती थी, वह एक फ़नकार की तलब थी। सच्चाई अगर सिर्फ़ रोज़मर्रा के स्तर पर सामने आए तो ज़िंदगी के आम कामों और आम नियति का हिस्सा बनकर अपनी रही-सही चमक भी खो बैठती है।
इसलिए मंटो इसकी समझ और इज़हार में ऐसा कोई न कोई पहलू हमेशा ढूँढ निकालता था जो उसे अपरिचित और नया बना दे। उसकी ज़्यादातर कहानियों के अंत का पल, परिचित में इसी अपरिचित तत्त्व तक एक रचनात्मक छलाँग की कामयाबी का पल है। उसके वे तमाम पाठक, आलोचक और निरीक्षक जो इस पल के रहस्य खुलने पर झुँझला उठते हैं और इस प्रकटीकरण के सौंदर्यपरक मूल्य का एहसास किए बिना इसके नैतिक निहितार्थों में उलझ जाते हैं, वैचारिक लिहाज़ से दरिद्र और रचनात्मक लिहाज़ से बंजर और बे-रूह लोग हैं। मंटो अपनी इस रहस्य खोलने की ताक़त के साथ-साथ ऐसे तमाम लोगों की बुनियादी कमज़ोरी और कमी से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। इसलिए अपनी उन कहानियों के मामले में भी जिन पर क़ानूनी जाँच का घेरा तंग था, न तो उसने समाज के दबाव को क़बूल किया, न लॉरेंस की तरह अपने प्रकाशकों की सहूलियतों को देखते हुए किसी मामूली सुधार और बदलाव पर राज़ी हुआ।
लॉरेंस के विपरीत, मंटो एक बेहद मनमौजी और ज़िद्दी स्वभाव का मालिक था और यह समझता था कि अगर उसके अल्फ़ाज़ या इज़हार के कुछ ढंग पाठकों के एक वर्ग की परेशानी का कारण बनते हैं, तो यह क़सूर ख़ुद उन पाठकों का है। सच्चाई के इज़हार से मानसिक परेशानी में मुब्तला होने वाले लोग साहित्य के मामले में बेवकूफ़ ही नहीं, नैतिक स्तर पर भी सेहतमंद नहीं होते। मंटो की कहानियाँ उनके होश-ओ-हवास के लिए एक कोड़े का और बे-रूह मान्यताओं के लिए एक सज़ा का दर्जा रखती हैं। लेकिन साहित्य के मंदबुद्धि पाठक या रचनात्मक तौर पर दरिद्र शख़्स की एक पहचान यह भी होती है कि वह अपनी कमज़ोरियों को छिपाने के लिए गौण बल्कि ग़ैर-ज़रूरी मसलों पर बातचीत के बहाने तलाश कर लेता है। मंटो पर एतराज़ करने वालों को इस मामले में यह सहूलियत भी मिल गई कि मंटो ने अपनी शैली पर किसी बाहरी सजावट का ग़िलाफ़ चढ़ाने की कभी भी कोशिश नहीं की। उसकी कहानियों में सौंदर्य के तमाम तत्त्व ख़ुद उन कहानियों के भीतर से प्रकट हुए हैं। भावनाओं के ख़ोल, अतिशयोक्ति की चाशनी, ख़ूबसूरत और अनोखे प्रतीकों और रंगीन, जादू जगाने वाले अल्फ़ाज़ के जादू से मंटो की कहानियाँ पूरी तरह ख़ाली हैं।
वह किसी बाहरी सहारे के बिना अपने अनुभवों का ख़ुलासा इस धीमेपन के साथ करता है कि यह धीमापन ही उसकी विशिष्ट पहचान बन जाता है। लेकिन यही धीमापन मंटो का पर्दा है। रचनात्मक इज़हार का यह रास्ता कठिन भी है और भीतरी लिहाज़ से पेचीदा भी। इसमें वह सांकेतिकता है जो ग़ज़ल के अच्छे शेर में पाई जाती है, एक ही वक़्त में अर्थ के कई स्तरों को छूती हुई। सच्चाई सिर्फ़ वह नहीं जो दिखाई देती है, बल्कि अल्फ़ाज़ के पीछे भी अनुभव के कई आयाम रोशन हैं। मंटो की नस्र (गद्य) फ़्लॉबेयर की तरह पारदर्शी और फ़ालतू शब्दों से पूरी तरह मुक्त न सही, तब भी उर्दू के ज़्यादातर महान कहानीकारों के लिए एक अच्छी-ख़ासी चुनौती ज़रूर है। इसमें एहसास की वह पवित्रता, सच्चाई और स्वाभाविकता मिलती है जो अनुभव की सच्ची, सीधी और प्राकृतिक समझ से पैदा होती है। मंटो अपने अनुभवों का बयान इस तरह करता है जैसे कि उसके इज़हार का साँचा भी दरअसल उसी प्रभाव का हिस्सा हो जो एक घटना के रूप में उस तक पहुँचा है।
'मोज़ेल' जैसी कहानी एक बैठक में मंटो ही लिख सकता था। और यह स्थिति उसकी कई कहानियों के साथ है कि बारीकियों और समय-स्थान के हवालों के साथ होने के बावजूद उनका प्रभाव पाठक पर एक मुकम्मल नज़्म या एक गुँथे हुए शेर की तरह होता है, जिसमें न ज़बान का वह घटियापन है न जज़्बे का, जो भीतरी व्यवस्था के बिखराव का नतीजा होता है। मंटो ने कभी किसी ऐसे जज़्बे का दिखावा नहीं किया जो उसके अनुभव की शाख़ से एक कोंपल की तरह बिना किसी बनावट और शोर-शराबे के अपने-आप ही प्रकट न हुआ हो। इस बात से उसे बिल्कुल सरोकार न था कि किसी ख़ास अनुभव या घटना की तरफ़ भलेमानसों का जज़्बाती रवैया क्या होता है, या क्या होना चाहिए और अगर उसकी कोई निश्चित शक्ल तय की जा सकती है तो ज़बरदस्ती उसे अपनाने की कोशिश की जाए। कोई भी जज़्बा अगर आपकी फ़ितरत के उतार-चढ़ाव से ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं उभरता, तो उसका इज़हार एक मामूली दर्जे की साहित्यिक जालसाज़ी के सिवा और कुछ भी नहीं।
मंटो करतबबाज़ था मगर झूठ बोलना या बनावट का समां बांधना उसके लिए मुमकिन न था। इसलिए उसके आलोचकों की प्रतिक्रिया भी आमतौर पर एक कड़वे सच को बर्दाश्त न कर सकने का नतीजा है। ज़ाहिर है कि हर सच्चाई ईमानदारी की ही कोख से जन्म लेती है। और ईमानदारी की एक शर्त यह भी है कि आदमी फ़र्ज़ी और उधार लिए गए या कम-अज़-कम बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए जज़्बात की सतह से ख़ुद को दूर रखे। जज़्बाती होने की पहली सज़ा जो किसी अदीब (लेखक) को मिलती है, वह यह है कि अपनी रही-सही ज़हानत (बुद्धिमत्ता) से भी वह हाथ धो बैठता है। और मंटो का मामला यह था कि वह अपनी ज़हानत के खोल का पाबंद न सही, फिर भी दरअसल वह अपनी ज़हानत ही के वसीले (माध्यम) से अपने एहसासात के हक़ीक़ी और वाक़ई उसलूब (शैली) की पहचान क़ायम करता था। मंटो के ज़हनी और तख़्लीक़ी (रचनात्मक) रवैयों में जो ख़ौफ़ज़दा कर देने वाली ईमानदारी नज़र आती है और जिसने मंटो की ज़ात पर झूठ से समझौते के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए थे, वह जज़्बाती अधिकता से पैदा हुए फूहड़पन को रद्द करने के कारण ही उसके किरदार का हिस्सा बन सकी थी।
हर शहर में गटर और मोरियाँ (नालियाँ) मौजूद हैं जो शहर की गंदगी बाहर ले जाती हैं। हम अगर अपने संगमरमर के ग़ुसलख़ानों (बाथरूम) की बात कर सकते हैं, अगर हम साबुन और लैवेंडर का ज़िक्र कर सकते हैं तो उन मोरियों और गटरों का ज़िक्र क्यों नहीं कर सकते जो हमारे बदन का मैल पीती हैं।
मंटो
(सफ़ेद झूठ)
काली शलवार के बयान में
(4)
मंटो ने 'अफ़साना निगार और जिंसी मसाइल' (कहानीकार और यौन समस्याएँ) के शीर्षक से बातचीत में यह कहा था कि नीम के पत्ते कड़वे सही मगर ख़ून ज़रूर साफ़ करते हैं। इसी बातचीत में उसके यह अल्फ़ाज़ भी शामिल थे कि हम मर्ज़ बताते हैं लेकिन दवाख़ानों के इंचार्ज नहीं हैं। इस बात को दरकिनार करते हुए कि जिंसी मसाइल पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र का एक पहलू एक अभौतिक बल्कि रूहानी और मज़हबी दायरे से आख़िरकार जा मिलता है, मंटो ज़िंदगी से जुड़े तमाम कामों और एहसासात, यहाँ तक कि अपने इज़हार और तजुर्बात की समझ के स्तर पर भी एक गहरे अख़लाक़ी (नैतिक) रवैये का पाबंद नज़र आता है। उसकी सच्चाई और साफ़गोई भी उसकी इसी अख़लाक़ियात (नैतिकता) का हिस्सा है। मुमताज़ शीरीं ने लिखा है कि मंटो का रवैया अगर सनकी नहीं तो एक हद तक सैडिस्ट (परपीड़क) ज़रूर है। ज़िंदगी और इंसान को, और इंसान के वहशियाना और उग्र जज़्बात को उजागर करने में और अपनी तहरीरों में झटका पहुँचाने में मंटो का रवैया मोपासां की तरह तक़रीबन सैडिस्ट है। यह सैडिज़्म मंटो के यहाँ हालाँकि बुनियादी तौर पर एक जमालियाती (सौंदर्यशास्त्रीय) बुनियाद रखता है, मगर इसके मायने हम मंटो की अख़लाक़ियात के संदर्भ को जाने बग़ैर तय नहीं कर सकते।
उसकी अख़लाक़ियात का ताना-बाना एक ही वक़्त में इंसान के प्रति एक संजीदा और दुख भरे चिंतन, एक गहरी हमदर्दी और इंसानी तजुर्बात के प्रति एक पाक और पारदर्शी वस्तुनिष्ठता (ऑब्जेक्टिविटी) से तैयार हुआ है। वह अपने किरदारों के दुख और उनके दहशत भरे तजुर्बों में शरीक भी है और उनसे अलग भी। वह इंसान की वहशियाना उग्रता, उसकी तबाही मचाने की फ़ितरत, दूसरों को तकलीफ़ देने की प्रवृत्ति और कामुकता की पहचान भी रखता है और उन कोमल जज़्बात की भी जिन पर कठोर और संगीन वाक़यात का खोल चढ़ा हुआ है।
अपने किरदारों के अंतर्मन तक मंटो की पहुँच महज़ ज़ेहन के वसीले से नहीं होती, वरना उसके अफ़साने 'केस हिस्ट्रीज़' बन जाते और इस तरह सिर्फ़ एक समाजशास्त्रीय अध्ययन के विषय की हैसियत अख़्तियार कर लेते। लेकिन एक तो यह कि मंटो सामाजिक हक़ीक़त और कलात्मक हक़ीक़त के फ़र्क़ की गहरी समझ रखता था और यह जानता था कि ख़ालिस हक़ीक़त इंसानी नफ़्सियात (मनोविज्ञान) या उसके सामाजिक माहौल के अध्ययन में चाहे जितनी ही मूल्यवान और उपयोगी क्यों न हो, अदब (साहित्य) में उसका गुज़ारा थोड़े-बहुत खोट (मिलावट) के बग़ैर मुमकिन नहीं। इसलिए अपने एक मज़मून (कसौटी) में उसने कहा था कि,
अदब ज़ेवर है और जिस तरह ख़ूबसूरत ज़ेवर ख़ालिस सोना नहीं होते, उसी तरह ख़ूबसूरत साहित्यिक रचनाएँ भी ख़ालिस हक़ीक़त नहीं होतीं। उनको सोने की तरह पत्थरों पर घिस-घिसा कर परखना बहुत बड़ी बदज़ौक़ी है।
दूसरे यह कि मंटो का बुनियादी मसला एक अदीब का मसला था और वह इस भेद से वाक़िफ़ था कि अदीब की ज़िम्मेदारियों और भूमिकाओं का स्वरूप सामाजिक विज्ञान के माहिरों के मुक़ाबले में अलग ही नहीं होता, बल्कि अपेक्षाकृत ज़्यादा पेचीदा और नाज़ुक भी होता है। अदब या तो अदब है वरना बहुत बड़ी बेअदबी है। ज़ेवर तो ज़ेवर है वरना एक बहुत ही भद्दी चीज़ है। अदब और ग़ैर-अदब, ज़ेवर और ग़ैर-ज़ेवर में कोई दरमियानी इलाक़ा (बीच का रास्ता) नहीं। इसलिए जैसा कि ऊपर अर्ज़ किया गया, मंटो अपने किरदारों के अंतर्मन तक अपने तमाम हवास (इंद्रियों) की मदद से पहुँचता था और उन किरदारों की पहचान के लिए भी उसने उनके बाहरी या ज़हनी अमल के बजाय उनके समग्र एहसास की प्रणाली के स्तर का चुनाव किया था। इस तरह किरदार और उनसे जुड़े वाक़यात अपने तमाम आयामों, अपने विरोधाभासों, अपनी अंदरूनी कशमकश, और अपनी मनोवैज्ञानिक और नर्वस पेचीदगियों के साथ उसके हवास पर प्रकट हुए थे।
मंटो के यहाँ इंसान, इंसानियत और अफ़राद (व्यक्तियों) के अंतर्मन में छुपी और दबी हुई नैतिक पवित्रता के प्रति जो जुड़ाव दिखाई देता है, वह इस बात का गवाह है कि मंटो का रवैया अपने किरदारों के मामले में सकारात्मक था और वह उन्हें पहले से कोई शर्त क़ायम किए बग़ैर उनकी समग्रता के साथ क़ुबूल करता था। जभी तो मंटो के किरदार उसकी कहानियों में डरे-सहमे और सिमटे हुए दिखाई नहीं देते और आज़ादी से अपना तआरुफ़ (परिचय) कराते हैं। पर्दों और झिझक से ऐसी आज़ादी मंटो की तख़्लीक़ी (रचनात्मक) शख़्सियत की सबसे नुमायाँ (प्रमुख) ख़ूबी है। अस्करी ने ग़लत नहीं कहा था कि,
जो बातें और अदीब कहने की हिम्मत न कर सकते थे, वह मंटो बेधड़क कह डालता था, लेकिन इससे भी बड़ी चीज़ यह है कि मंटो की क़िस्म का फ़नकार हम जैसे लोगों के लिए एक ढाल का काम देता है। ज़िंदगी की जिन दिल दहला देने वाली हक़ीक़तों का बोध हासिल किए बग़ैर हम ठीक तरह ज़िंदा नहीं रह सकते, उन्हें हमारे बजाय इस क़िस्म का फ़नकार महसूस करके हमें बताता है। यानी वह हमारी तरफ़ से एहसास की तकलीफ़ उठाता है। अगर ऐसा फ़नकार हमारे बीच न रहे तो फिर यह ज़िम्मेदारी अपनी-अपनी हैसियत भर हम सबको क़ुबूल करनी पड़ती है। मंटो के बाद यह बोझ हमारे कंधों पर आ पड़ा है। हमें चेतना की बलाओं से महफ़ूज़ रखने वाली दीवार हमारे सामने से हट गई है।
उर्दू अफ़साने की त्रासदी यह है कि मंटो के समकालीनों में भी किसी ने एहसास की इस व्यापकता और ज़ेहन के इस खुलेपन के साथ इस बोझ को उठाने में उसका साथ नहीं दिया था और उसके बाद तो ख़ैर लिखने वालों का रवैया ही बड़ी हद तक तब्दील हो गया और नए घोषणापत्र (मंशूर) तरतीब दिए जाने लगे। फ़नकार की 'अना' (अहंकार) और व्यक्तिगत तजुर्बे से वफ़ादारी का चर्चा तो बहुत हुआ, मगर किसी दूसरे अफ़साना निगार ने मंटो की तरह अपनी ज़ात से बाहर दूसरे किरदारों की 'अना' और तजुर्बे की वैयक्तिकता का इस दर्जे एहतराम (सम्मान) नहीं किया। यही वजह है कि तन-तन्हा मंटो ने उर्दू अफ़साने को जितने ज़िंदा और गतिशील किरदारों से रूबरू कराया है, शायद उर्दू के तमाम अफ़साना निगार मिलकर भी यह भार न उठा सकें।
इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि मंटो के अलावा किसी और ने अच्छे अफ़साने नहीं लिखे या यह कि मंटो ने बुरे, बल्कि बहुत बुरे और बेजान अफ़साने नहीं लिखे। मैं तो सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मंटो ने चूंकि सिर्फ़ अपनी चेतना या किसी ख़ास और तयशुदा मूल्य को अपना मार्गदर्शक नहीं बनाया था, इसलिए अपने किरदारों का चित्रण करते हुए भी उसने उनके वजूद के टुकड़े नहीं किए। वह दवाख़ाने का प्रबंधक बनने की सनक में ग्रस्त न सही, फिर भी उसकी उंगलियां अपने समाज की नब्ज़ पर थीं और उसका वजूद एक थर्मामीटर की मिसाल था।
उसने उपदेश, भाषण और अपनी पवित्रता के दिखावे को अपना तरीक़ा बनाने से परहेज़ भी शायद इसलिए किया कि वह नैतिकता की एक गहरी और व्यापक समझ रखता था। उसे अपने आप को गंदगी का गोताख़ोर कहने में शर्म नहीं आई, सिर्फ़ इसलिए कि उसकी खोज का मक़सद उस पर पूरी तरह स्पष्ट था और एक मौक़े पर अदालत में अपना बयान देते हुए उसने कहा था कि वह शायरी (साहित्य) जो अपने आप में अपना उद्देश्य है और जिसका काम सिर्फ़ एक सतही खुशी और शारीरिक आनंद के एहसास को बनाने और फैलाने तक सीमित है, ऐसी शायरी दिमागी हस्तमैथुन है। लिखने और पढ़ने वाले दोनों के लिए मैं इसे नुकसानदेह समझता हूँ।
मंटो ने अपने लक्ष्य की तलाश के लिए इंसानी तजुर्बे की उन आबादियों का दौरा किया जिन पर एक औसत दर्जे की नैतिकता ने बेख़बरी के पर्दे डाल दिए थे, यह बेख़बरी एक तो सामाजिक और नैतिक मामलों में रवैये के एकतरफ़ापन का नतीजा थी, दूसरे इसलिए भी कि मंटो के समकालीनों को अपने आप पर वह रचनात्मक विश्वास, दिल और नज़र की वह निडरता हासिल न थी जो मंटो के यहाँ हमें भरपूर दिखाई देती है। लेकिन इसका सबसे अहम कारण वह सच्चाई है जिसका रिश्ता मंटो की नैतिकता से जुड़ा हुआ है। इस सच्चाई को हम एक तरह की नैतिक समानता का नाम दे सकते हैं। इस समानता का एहसास मंटो को एक ऐसे स्तर पर ले जाता है जहाँ उसके किरदारों और ख़ुद उसके अपने वजूद के बीच मानसिक, नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर का कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता।
उसकी नज़र में कोई इंसान महत्वहीन नहीं था। वह हर आदमी से इस उम्मीद के साथ मिलता था कि उसकी हस्ती में भी ज़रूर कोई न कोई सार्थकता छिपी होगी जो एक न एक दिन सामने आ जाएगी। मैंने उसे ऐसे-ऐसे अजीब आदमियों के साथ हफ़्तों घूमते देखा है कि हैरानी होती थी कि मंटो उन्हें बर्दाश्त कैसे करता है। लेकिन मंटो बोर होना जानता ही न था। उसके लिए तो हर आदमी ज़िंदगी और इंसानी फ़ितरत की एक अभिव्यक्ति था, इसलिए हर शख़्स दिलचस्प था। अच्छे और बुरे, बुद्धिमान और मूर्ख, सभ्य और असभ्य का सवाल मंटो के यहाँ ज़रा भी न था। उसमें तो इंसानों को स्वीकार करने की क्षमता इतनी ज़बरदस्त थी कि जैसा आदमी मंटो के साथ हो, मंटो वैसा ही बन जाता था। — मुहम्मद हसन अस्करी, (मंटो)
(5)
यहाँ सवाल उठता है कि फिर मंटो को अश्लीलता का क़ुसूरवार क्यों ठहराया गया? बेहतर होगा कि इस मसले पर बातचीत से पहले हम अश्लीलता की उस अवधारणा पर भी एक नज़र डालते चलें जिसका संबंध साहित्य से है और जो एक अरसे से बहस का विषय बना हुआ है। कलात्मक अभिव्यक्ति की जितनी भी शैलियां इंसान ने अब तक खोजी हैं, इस बात से परे कि उनका स्रोत इंसानी तजुर्बों के जिन क्षेत्रों से संबंध रखता है, वे सामाजिक नैतिकता के लिए वर्जित हैं या स्वीकार्य, बुनियादी तौर पर सौंदर्यशास्त्र का मसला हैं और इस दायरे में रहकर ही उन पर कोई सार्थक बातचीत की जा सकती है।
इस सिलसिले में मंटो का दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट है और इसकी तरफ़ पहले भी इशारा किया जा चुका है कि मंटो के नज़दीक वह साहित्यिक रचना जिसका पहला मक़सद यौन शक्ति को बढ़ाना या इस शक्ति के प्रदर्शन का कोई आसान नुस्ख़ा ढूँढ निकालना हो, दरअसल साहित्य है ही नहीं। लेकिन ज़ाहिर है कि ऐसे लोग जिनकी कल्पना की उड़ान चिकित्सा की किताबों और धार्मिक पत्रिकाओं में भी यौन आनंद के साधन खोजने में सक्षम हो, उनकी चेतना किसी भी साहित्यिक रचना से अपना मनचाहा मतलब निकाल ही सकती है।
'ऊपर, नीचे और दरमियान' में मंटो ने इस रवैये पर व्यंग्य के बहुत सूक्ष्म वार किए हैं। इस कहानी के दो किरदार 'लेडी चैटरलीज़ लवर' को पढ़ना अपनी औलाद के लिए तो नुकसानदेह समझते हैं मगर ख़ुद इस किताब के चुनिंदा अंशों के ज़रिए उस लम्हे की तलाश करते हैं जो उनकी सोई हुई ताक़तों को जगा सके। उनकी नसों की कमज़ोरी का हाल यह है कि किताब के कुछ वाक्यों पर नज़र पड़ते ही उनकी नब्ज़ की रफ़्तार तेज़ हो जाती है। ऐसे लोग न सेक्स के मसले समझ सकते हैं, न उस साहित्य के जिसमें यौन अनुभवों के माध्यम से इंसानी वजूद की आंतरिक दुनिया के किसी पहलू पर रौशनी डाली गई हो।
इसलिए किसी साहित्यिक रचना में यौन उत्तेजना के तत्व का होना या न होना बेमानी है। इस मसले की बुनियाद पर हम न तो उस रचना का सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यांकन कर सकते हैं और न ही उस पर कोई सौंदर्यशास्त्रीय फ़ैसला लागू कर सकते हैं। बहस सिर्फ़ इस बात पर होनी चाहिए कि इस उत्तेजना के बिंदु तक पहुँचने या इस तत्व की पहचान के लिए पाठक ने क्या रास्ता अपनाया है। मुमताज़ शीरीं ने मंटो पर अपने लेख में उनकी शैली का विश्लेषण करते हुए लिखा है,
ठंडा गोश्त, एक ऐसा अफ़साना है जिसे हम मंटो की कला के मुकम्मल नमूने के तौर पर ले सकते हैं। मंटो की लेखन शैली में ग़ज़ब की चुस्ती है। 'ठंडा गोश्त' इतना गठा हुआ, चुस्त और मुकम्मल अफ़साना है कि इसमें एक लफ़्ज़ भी घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता। ईशर सिंह के टूटे-फूटे जुमलों में उस बेचैन दिल-ओ-दिमाग़ की सारी पीड़ादायक कैफ़ियत खिंच आई है। पहले मंटो को कोई किरदार उभारना होता था तो वह कई घटनाओं के ज़रिए और ख़ुद अपनी तरफ़ से उनकी विशेषता बयान करके यह किरदार उभारता था। 'ठंडा गोश्त' के दो-तीन शुरुआती पैराग्राफ़ों में सिर्फ़ शारीरिक बनावट और कुछ हरकतों के बयान से ही ईशर सिंह और कुलवंत कौर के ग़ैर-मामूली किरदार उभर आए हैं। मोपासां के बारे में कहा गया है कि जब वह किसी ग़ैर-मामूली गर्म और कामुक औरत का ज़िक्र करता है तो उस तहरीर का काग़ज़ तक ताज़ा गर्म गोश्त की तरह फड़कने लगता है। कुछ यही कैफ़ियत कुलवंत कौर के बयान में है। (मंटो का तग़य्युर और इर्तिका)
दूसरी तरफ़ 'ठंडा गोश्त' के मुक़दमे में बचाव पक्ष के एक गवाह डॉक्टर सईदउल्लाह का यह बयान है कि अफ़साना 'ठंडा गोश्त' पढ़ने के बाद मैं ख़ुद ठंडा गोश्त बन गया। एक और पाठक (मौलाना अख़्तर अली) की प्रतिक्रिया मुक़दमे की सुनवाई के दौरान यह थी कि अब ऐसा साहित्य पाकिस्तान में नहीं चलेगा और उन्हीं के वर्ग के दूसरे बुज़ुर्ग (चौधरी मुहम्मद हुसैन) ने फ़रमाया कि इस कहानी की थीम यह है कि हम मुसलमान इतने बेग़ैरत हैं कि सिखों ने हमारी मुर्दा लड़की तक नहीं छोड़ी। वैसे मंटो ने अपनी तरफ़ से इस कहानी के ज़रिए दूसरों तक एक पैग़ाम पहुँचाने का काम किया था।
यूँ तो यह कहानी ज़ाहिर तौर पर यौन मनोविज्ञान के एक बिंदु के इर्द-गिर्द घूमती है लेकिन असल में इसमें इंसान के नाम एक बहुत ही सूक्ष्म पैग़ाम दिया गया है कि वह ज़ुल्म, हिंसा और बर्बरता व हैवानियत की आख़िरी हदों तक पहुँच कर भी अपनी इंसानियत नहीं खोता। अगर ईशर सिंह अपनी इंसानियत खो चुका होता तो मुर्दा औरत का एहसास उस पर इतनी शिद्दत से कभी असर न करता कि वह अपनी मर्दानगी से वंचित हो जाता।
वे बुज़ुर्ग जिन्होंने इस अफ़साने के सिलसिले में मंटो को तीन महीने की सख़्त क़ैद और तीन सौ रुपये जुर्माने की सज़ा दी थी, उनका नज़रिया इस बारे में यह था कि पाकिस्तान के प्रचलित नैतिक पैमाने क़ुरआन पाक की शिक्षा के सिवा और कहीं से ज़्यादा सही तौर पर मालूम नहीं हो सकते। असभ्यता और हवस शैतान की तरफ़ से है। एक प्रगतिशील आलोचक (मुमताज़ हुसैन) की टिप्पणी यों है कि मंटो नेकी की तलाश में निकलता है और उसकी किरण एक ऐसे इंसान के पेट से निकालता है जिसके बारे में आप इस क़िस्म की उम्मीद नहीं रखते। यह है मंटो का कारनामा! लेकिन ज़ाहिर है कि मंटो का असल कारनामा बतौर अदीब (लेखक) यह हरगिज़ नहीं है। रही इस मुक़दमे के जज और सरकारी पक्ष के कुछ गवाहों की बात, तो उनके बारे में मंटो का यह ख़याल ग़लत न था कि उनके सामने अपनी सफ़ाई में बयान देना भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर था।
किसी के नज़दीक अश्लीलता का मसला सियासत की हदों तक जा पहुँचा, किसी ने इसे इस्लाम के लिए ख़तरे का निशान समझा। एक साहब इसे मंटो के बजाय शैतान का कारनामा क़रार दे बैठे तो दूसरी तरफ़ एक हमदर्द आलोचक ने इसे नेकी की तलाश के एक सफ़र का नाम दिया। मुझे इस सवाल से मतलब नहीं कि प्रतिक्रिया के इन तमाम रूपों में कौन सा रूप ज़्यादा तार्किक आधार रखता है और हम ख़ुद को उससे सहमत पाते हैं या नहीं। मेरा मसला वह पैग़ाम भी नहीं जो इस कहानी के ज़रिए मंटो ने आम करना चाहा है, क्योंकि यह काम तो मामूली क़िस्म के उपदेशक भी कर सकते हैं। अदब के एक पाठक की हैसियत से हमारा सरोकार इस मसले से होना चाहिए कि यह पैग़ाम या नैतिक उद्देश्य अदब बन सका है या नहीं। इस ज़िल्लत और शैतानियत के एतबार की बुनियादें नैतिकता की ज़मीन पर न सही, कलात्मक एहसास और इज़हार की सतह पर क़ायम हो सकी हैं या नहीं। अख़लाक़ (नैतिकता) फ़िराक़ के शब्दों में, पापों की नदी के किनारे का पेड़ है या भलाई की छींटों से पनपने वाला छायादार पेड़, यहाँ ये तमाम सवाल गौण हैसियत रखते हैं और महज़ इनसे मंटो के साहित्यिक दर्जे में इज़ाफ़ा होता है न कि कमी।
अदब में यौन अनुभवों को शामिल करने के सवाल पर बहस करते हुए हमें जमालियाती (सौंदर्यात्मक) फ़र्क़ को हर हाल में सामने रखना चाहिए। चुनाँचे मुमताज़ शीरीं की इस राय पर नज़र डालते वक़्त भी कि मंटो के कामुक महिला किरदार सौगंधि, नीलम और कुलवंत कौर अपने तेज़ जज़्बात के साथ जानदार और फड़कते हुए दिखाई देते हैं, इस कैफ़ियत के साथ कि इस तहरीर का काग़ज़ तक, जिन पर उनका ज़िक्र हो ताज़ा गर्म गोश्त की तरह फड़कने लगता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मंटो अपने किरदारों के अमल के मक़सद में इंसानी सतह पर चाहे जिस हद तक शरीक रहा हो, बतौर अफ़साना निगार वह तटस्थता (objectivity) के एहसान की क़द्र-ओ-क़ीमत की भी गहरी समझ रखता है। इस सिलसिले में ख़ुद मंटो के अपने स्पष्टीकरण और सफ़ाई के बयानों को ज़्यादा अहमियत नहीं देनी चाहिए क्योंकि एक तो उनके मक़सद महदूद थे, दूसरे मंटो जैसी ज़हानत रखने वाले शख़्स से यह बात कुछ दूर न थी कि अपनी ग़लतफ़हमियों को सही साबित करने के लिए भी वह इधर-उधर से दलीलें इकट्ठा करके एक अच्छा-ख़ासा मुक़दमा तैयार कर ले।
'लज़्ज़त-ए-संग' में मंटो ने कहा था कि मेरे नज़दीक कसाइयों की दुकानें अश्लील हैं क्योंकि उनमें नंगे गोश्त की बहुत भद्दी और खुले तौर पर नुमाइश की जाती है। ये अल्फ़ाज़ अहम हैं क्योंकि इनका ताल्लुक़ उसी बुनियादी मसले से है जिसे हम मंटो के जमालियाती (सौंदर्यात्मक) और कलात्मक अमल के संदर्भ में देख सकते हैं और इनसे मंटो के रचनात्मक रवैये को तय करने में कुछ रोशनी हासिल कर सकते हैं। मंटो ने 'ठंडा गोश्त' की क़िस्म के अफ़सानों में जहाँ कहीं अपने किसी किरदार के गर्म और तेज़ जज़्बात की तस्वीरें खींची हैं, ऐसे तमाम मौक़े कहानी के विकास की चंद कड़ियों से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते, चुनाँचे वे अपने आप में मक़सद नहीं हैं। ये मौक़े उस शिद्दत भरे लम्हे की तरफ़ सफ़र की रफ़्तार को तेज़ कर देते हैं जो मंटो के सफ़र की असल मंज़िल या उसकी कहानियों का चरम बिंदु (climax) और अंत है। और ज़ाहिर है कि इस लम्हे तक पहुँचते-पहुँचते निचले जज़्बात की सतहों को झकझोरने वाली शोख़ और रंगीन तस्वीरें इस लम्हे के मलाल और इसकी हैरत-अंगेज़ कैफ़ियत में डूब जाती हैं और उनका अपना अलग असर ख़त्म हो जाता है। कहानी के कुल ढाँचे और इसकी रचनात्मक एकता से हमेशा ग़लत रास्ते पर ले जाने का सबब बनती है।
मंटो की कहानियों के कुल संदर्भ में इन तस्वीरों को देखा जाए तो अंदाज़ा होगा कि उसकी ज़्यादातर कहानियों के टेक्सचर का तर्क इन तस्वीरों को एक ज़रूरत अता करता है। अश्लील ज़ेहनियत का दोषी वह उस सूरत में होता जब ये तस्वीरें उसकी कहानियों के फ़्रेम में मुख्य बिंदु के तौर पर एक अपने-आप में मुकम्मल और आज़ाद हैसियत रखतीं और यह बिंदु एक फैलते हुए दायरे की सूरत में कहानी के पूरे असर को अपनी गिरफ़्त में ले लेता। मंटो ने हाली, इक़बाल और 'बहिश्ती ज़ेवर' की ज़ेहनी ग़िज़ा पर परवरिश पाने वाले, देखने में पाक-साफ़ और आदर्श इंसान के मुक़ाबले में, इंसान को उसकी समग्रता में, उसके अंदरूनी टकरावों और उसके बातिन (भीतर) की सतह पर जारी रहने वाली अँधेरे और उजाले की लगातार कशमकश के आईने में देखने की जुर्रत की है। इन कहानियों को यूरोप की Erotica के तौर पर पढ़ना भी मुनासिब न होगा, न ही इन्हें जाफ़र ज़टल्ली के कुल्लियात (समग्र रचनाओं) और शरीयत-पसंद बुज़ुर्गों की उन मसनवियों के साथ रखा जा सकता है जिनमें इज़हार का खुलापन गाली का, और माशूक़ से मिलन के नज़ारे Blue Films का रूप अख़्तियार कर लेते हैं।
वह बोकेशियो या बाल्ज़ाक की तरह यौन मुहिमों की तस्वीर-कशी अगर करता भी है तो इस तरह कि एक निहायत ज़ाती अमल एक व्यापक सामाजिक तसव्वुर की कुंजी बन जाता है और पुरानी दास्तानों के किसी जादुई कलमे की तरह एक रहस्यमयी, अनदेखे और नए खोजे गए मंज़र-नामे का दरवाज़ा खोलता है। यह रवैया मंटो को कुछ मायनों में बोदलेयर और लॉरेंस की तरह एक ज़बरदस्त नैतिक विज़न रखने वाले अदीब की हैसियत देता है, मगर एक बहुत बड़े फ़र्क़ के साथ कि मंटो की हक़ीक़त-पसंदी यौन कर्मों के मायनों में समाज से जुड़े चंद सवालों के जवाब तक तो पहुँचती है, लेकिन उनमें किसी रहस्यमयी, सूफ़ियाना या परा-भौतिक (metaphysical) तर्क का सिरा नहीं ढूँढती। कुल मिलाकर यही नज़रिया मंटो की नैतिकता को प्रगतिशीलों और एक धार्मिक या सूफ़ियाना ज़ेहनी माहौल की नुमाइंदगी करने वाले लेखक-नुमा उस्तादों के आइडियलिज़्म (आदर्शवाद) के तसव्वुर से अलग करता है और इसे ज़्यादा व्यापक, बा-मायने और फ़ितरी (स्वाभाविक) बनाता है।
उसके आईने में जो अक्स दिखाई देते हैं, वे न सिर्फ़ सामाजिक इंसान के हैं, न धार्मिक इंसान के, बल्कि एक मुकम्मल इंसान के रूप-रंग से सजे हैं। मंटो उनके कामों के मक़सद को समझने के लिए न किसी सामाजिक दर्शन का मोहताज होता है, न धर्म, सूफ़ीवाद और पारलौकिक दुनिया के रहस्यमयी जहानों की सैर का इच्छुक होता है। उसका साहसिक यथार्थवाद किसी बाहरी सहारे की तलाश नहीं करता और अपने भयानक और दर्दनाक खुलासों के ज़रिए इस आम धारणा का खंडन भी करता है कि यौन अनुभव की हदें अपनी तेज़ी और सच्चाई के कारण आख़िरकार एक अर्ध-धार्मिक अनुभव से जा मिलती हैं। ऐसा न होता तो मंटो भी आचार्य रजनीश की तरह किसी कल्ट का पैरोकार बन जाता और उसकी रचनाएँ किसी धर्मग्रंथ का रूप ले लेतीं। वह मानवीय अनुभवों के ऐसे स्तरों तक जा पहुँचता है जो बहुत सादे और दो-टूक नहीं हैं। फिर भी, वह किसी भी स्तर पर शरीर के अस्तित्व को एक धोखा या अपने किरदारों को एक कल्पना के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं होता।
मंटो की कहानियों में इसीलिए कलात्मक शिल्प की चेतना से पैदा होने वाली प्रतीकात्मकता और चुस्ती के बावजूद, सतह का खुरदुरापन और बयान का बिना किसी बनावट वाला, सहज और स्वाभाविक बहाव बहुत स्पष्ट है। वह अपने बयान को दिलचस्प बनाने के लिए किसी भी तरह की भाषाई और शैलीगत बनावट से काम नहीं लेता, न ही अभिव्यक्ति के समग्र रूप में पूर्णता तक पहुँचने का इच्छुक होता है, फिर भी उसकी कहानियाँ पढ़ने वाले पर एक अनुभव की तरह गुज़रती हैं। ऐसा सिर्फ़ इसलिए है कि मंटो की नज़र परिचित घटनाओं की औपचारिकता से पैदा हुई धुंध में भी रोशनी के उन तमाम बिंदुओं को पहचान लेती है, जिनके क्रम से उसकी कहानियों का बाहरी ढाँचा वजूद में आता है। लॉरेंस के बारे में उसके एक जीवनी-लेखक का कहना है कि वह तराशी हुई, साफ़, निर्मल कलाकृतियों, नख-शिख से दुरुस्त नपी-तुली हुई आकृतियों और ख़ूबसूरत, सजी हुई, भव्य इमारतों से इसलिए ऊब महसूस करता था क्योंकि उनमें सादगी का वह तत्व ग़ायब होता है जिसका एक स्तर खुरदुरापन भी है।
संगीत में उसे एहतियात, सलीक़े और बेहद मेहनत से तैयार की गई सिम्फ़नीज़ के मुक़ाबले लोकगीत ज़्यादा आकर्षित करते थे, क्योंकि उनका जन्म एक त्वरित और स्वतः प्रेरणा के माध्यम से होता है। वह अपनी भावनाओं के हवाले से अनुभव का जो भी रूप खोजता था, उसे ज्यों का त्यों कागज़ पर उतार देता था और इस प्रक्रिया में चेतना के अनुचित हस्तक्षेप से हमेशा डरता और बचता था। उसकी तलाश बस यह होती थी कि जो कुछ भी वह रचे, उसका स्रोत पूरी तरह से उसके भीतर छिपी रहस्यमयी और अतार्किक ऊर्जाएँ हों, जो हर तरह के बाहरी दबाव, प्रलोभन और समझौते से पूरी तरह आज़ाद और मुक्त हों।
लॉरेंस के यहाँ इंद्रियों की पवित्रता को क़ायम रखने की इस लगन ने एक सूफ़ियाना तल्लीनता की स्थिति पैदा कर दी थी। वह किसी संन्यासी की तरह अपने एकांत के सन्नाटे में गंभीर और उदास ज्ञान (इल्हाम) के उन पलों का इंतज़ार करता था, जो उस तक शरीर की आध्यात्मिकता के राज़ों की ख़बर ला सकें। इस रवैये के प्रभाव ने लॉरेंस के यहाँ एक अलौकिक, कुछ हद तक जज़्बाती और रहस्यमयी स्थिति को जन्म दिया है। यह स्थिति सेक्स को इबादत और शरीर को आख़िरकार एक अमूर्त चीज़ बना देती है, मिसाल के तौर पर 'लेडी चैटरलीज़ लवर' के ये उद्धरण:
और उसे फ़ौरन उसके पास आना था, उसके कोमल-शांत शरीर की उस दुनियावी शांति में प्रवेश करने के लिए...
क्योंकि अपने भीतर गहराई में उसने एक नई हलचल, एक नए नंगेपन को उभरते हुए महसूस किया...
और ऐसा लगा जैसे वह समंदर हो, जहाँ सिर्फ़ अँधेरी लहरें उठ रही थीं और मचल रही थीं, एक बड़े उफ़ान के साथ मचल रही थीं, ताकि धीरे-धीरे उसका पूरा अँधेरा गतिमान हो जाए, और वह एक ऐसा महासागर बन जाए जो अपने अँधेरे, ख़ामोश वजूद को घुमा रहा हो। ओह, और उसके भीतर बहुत गहराई में गहराइयाँ बँट गईं और अलग हो गईं, उस कोमल गोते के केंद्र से, और गोता लगाने वाला और भी गहराई में उतरता गया, उसकी लहरें जितनी भारी होती गईं, वे किसी तट की ओर लुढ़कती गईं, उसे अनावृत करती हुईं, और वह महसूस होने वाला अज्ञात और भी क़रीब, और क़रीब उतरता गया, और उसके अपने वजूद की लहरें उससे और दूर, और दूर होती गईं, उसे छोड़ती हुईं, यहाँ तक कि अचानक, एक कोमल काँपती हुई ऐंठन में, उसके पूरे वजूद का मूल हिस्सा छू लिया गया, उसे एहसास हुआ कि उसे छू लिया गया है, वह चरम पूर्णता उस पर छा गई थी, और वह सुध-बुध खो चुकी थी।
लीजिए क़िस्सा ख़त्म! रोज़मर्रा की ज़िंदगी की एक जीती-जागती हक़ीक़त उदात्तीकरण के एक पारलौकिक चरण को पार करती हुई कहाँ जा पहुँची? सीधे-सादे लफ़्ज़ों में इसे हम हक़ीक़त के उस सफ़र का नाम दे सकते हैं जिसकी मंज़िल रूपक का बिंदु है, यानी यह रगों में दौड़ता, चहकता, बोलता लहू आख़िरकार एक ऐंद्रिक स्थिति में तब्दील हो गया। इसके विपरीत मंटो की चित्रशाला की ये चंद तस्वीरें:
कुलवंत कौर अपने बाज़ू पर उभरे हुए लाल धब्बे को देखने लगी, 'बड़ा ज़ालिम है तू ईशर सियां!' ईशर सिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्कुराया, 'होने दे आज ज़ुल्म!' और यह कहकर उसने और ज़ुल्म ढाने शुरू किए। कुलवंत कौर का ऊपरी होंठ दाँतों तले कचकचाया, कान की लौओं को काटा, उभरे हुए सीने को भंभोड़ा, भरे हुए कूल्हों पर आवाज़ पैदा करने वाले चाँटे मारे, गालों के मुँह भर-भर के बोसे लिए, चूस-चूस कर उसका सारा सीना थूक से लथेड़ दिया। कुलवंत कौर तेज़ आँच पर चढ़ी हुई हाँडी की तरह उबलने लगी, लेकिन ईशर सिंह इन तमाम कोशिशों के बावजूद ख़ुद में हरारत (गर्मी) पैदा न कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थे, सब के सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिए, पर कोई कारगर न हुआ। कुलवंत कौर ने, जिसके बदन के सारे तार तन कर ख़ुद-ब-ख़ुद बज रहे थे, ग़ैर-ज़रूरी छेड़छाड़ से तंग आकर कहा, 'ईशर सियां, काफ़ी फेंट चुका है, अब पत्ता फेंक!'
दीवार का सहारा लेकर मसूद ने अपने जिस्म को तोला और इस अंदाज़ से आहिस्ता-आहिस्ता कुलसूम की रानों पर अपने पैर जमाए कि उसका आधा बोझ कहीं ग़ायब हो गया। हौले-हौले बड़ी होशियारी से उसने पैर चलाने शुरू किए। कुलसूम की रानों में अकड़ी हुई मछलियाँ उसके पैरों के नीचे दब-दब कर इधर-उधर फिसलने लगीं। मसूद ने एक बार स्कूल में तने हुए रस्से पर एक बाज़ीगर को चलते हुए देखा था। उसने सोचा कि बाज़ीगर के पैरों के नीचे तना हुआ रस्सा इसी तरह फिसलता होगा।
सारी रात रणधीर को उसके बदन से अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की बू आती रही थी। इस बू को जो एक साथ ख़ुशबू और बदबू थी, वह तमाम रात पीता रहा। उसकी बग़लों से, उसकी छातियों से, उसके बालों से, उसके पेट से, हर जगह से, यह जो बदबू भी थी और ख़ुशबू भी, रणधीर की हर साँस में मौजूद थी। तमाम रात वह सोचता रहा कि यह घाटन लड़की बिल्कुल क़रीब होने पर भी हरगिज़-हरगिज़ इतनी ज़्यादा क़रीब न होती, अगर उसके नंगे बदन से यह बू न उड़ती। यह बू जो उसके दिल-ओ-दिमाग़ की हर सिलवट में रेंग गई थी, उसके तमाम पुराने और नए ख़यालों में रच गई थी। इस बू ने इस लड़की को और रणधीर को एक रात के लिए आपस में घोल दिया था। दोनों एक-दूसरे के अंदर दाख़िल हो गए थे। सबसे गहरी गहराइयों में उतर गए थे जहाँ पहुँचकर वे एक ख़ास इंसानी लज़्ज़त (आनंद) में तब्दील हो गए थे, ऐसी लज़्ज़त जो पल भर की होने के बावजूद स्थायी थी, उड़ान भरने को तैयार होने के बावजूद स्थिर और शांत थी। वे दोनों एक ऐसा पंछी बन गए थे जो आसमान की नीलाहटों में उड़ता-उड़ता स्थिर दिखाई देता है।
इनमें पहली दो तस्वीरें हक़ीक़त के भौतिक स्तर से एक पल के लिए भी ऊपर नहीं उठतीं और उनके किरदार अपने गोश्त-पोस्त (हाड़-माँस) के साथ पढ़ने वाले को चलते-फिरते दिखाई देते हैं। तीसरी तस्वीर हक़ीक़त के प्रत्यक्ष अनुभव को एक अदृश्य प्रभाव के स्तर तक ले जाती है और घटना को एक कैफ़ियत (भाव) में बदल देती है, इसके बावजूद अनुभव की ज़मीनी बुनियादें ध्वस्त नहीं होतीं और इसके किरदार किसी कल्पना से परे, अनदेखी और रहस्यमयी फ़िज़ा में विलीन नहीं होते। इसलिए उनकी मौजूदगी और इंसानियत की हदों का प्रभाव क़ायम रहता है। इंसानी चेतना का एक स्तर यह भी है कि इंसानी वजूद को उसकी समग्रता के संदर्भ में स्वीकार किया जाए और अच्छे-बुरे कामों की बहस से अलग होकर इंसान को समझने की तलाश की जाए।
बोदलेयर ने रूमानी विचारकों के आत्म-पूर्णता के सिद्धांत को इस विचार की बुनियाद पर ख़ारिज किया था कि इंसान पेशाब की थैली के नीचे नौ महीने गुज़ारता है, इसलिए उसका पूरी तरह पवित्र और दोषरहित होना असंभव है। इसी के साथ वह यह भी समझता था कि नेकी का उभरना गुनाह के एहसास के बिना मुमकिन ही नहीं हो सकता। एक अरसे तक इस तरह के विचारों को लोग शैतानी ताक़तों की अभिव्यक्ति मानते रहे, लेकिन अब जबकि इस मामले में आम नज़रिया काफ़ी बदल चुका है, बोदलेयर के अध्ययन की एक नई दिशा भी खोजी जा चुकी है और न सिर्फ़ यह कि उसके यहाँ एक बाक़ायदा नैतिक व्यवस्था की मौजूदगी का ज़िक्र पूरी गंभीरता और श्रद्धा के साथ किया जाता है, बल्कि इस व्यवस्था के तार बोदलेयर के कैथोलिकवाद से भी मिला दिए गए हैं।
मंटो की नैतिकता, जैसा कि पहले अर्ज़ किया जा चुका है, इस क़िस्म के किसी भी संदर्भ की गुंजाइश नहीं रखती। उसके यहाँ शब्दों की जो किफ़ायत, शैली में जो चुस्ती और कहानियों की समग्र लय में जो ग़ैर-जज़्बातीपन (भावुकता से दूरी) नुमायाँ है, वह इंसान की तरफ़ उसके ख़ास रवैये की उपज है। यह रवैया बोदलेयर या लॉरेंस या पहले के रचनाकारों के रवैयों से अलग ही नहीं, उन सबसे ज़्यादा हक़ीक़तपसंद (यथार्थवादी) भी है। शायद इसीलिए हम मंटो की सोच को अपने ज़माने की सोच से तुलनात्मक रूप से ज़्यादा तालमेल में पाते हैं। और उसे बोदलेयर या लॉरेंस की तरह एक नैतिक विज़न रखने वाले अदीब (साहित्यकार) की हैसियत देने के बावजूद, उसे हम इन महान कलाकारों से इस हद तक अलग भी देखते हैं।
यूँ मंटो ने कभी-कभी इस सिलसिले में ऐसी दार्शनिकता भी दिखाई है जो उसके वस्तुनिष्ठ और यथार्थवादी नैतिक विचार को एक नए वैचारिक संदर्भ में देखने की माँग करती है। मिसाल के तौर पर उसके ये शब्द, दो रूहों का सिमटकर एक हो जाना और एक होकर दीवानगी भरा विस्तार अपना लेना। दो रूहें सिमटकर उस नन्हे-से बिंदु पर पहुँचती हैं, जो फैलकर ब्रह्मांड बनता है। उसके आम रवैये से मेल नहीं खाते और मंटो को अनुभव की असलियत के बजाय उसकी संभावना को दर्शाने वाला साबित करते हैं। मेरा ख़याल है कि इस तरह के बयानों की हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि मंटो निंदा और धिक्कार की बारिश में कुछ धारणाओं को ढाल बनाने का जतन भी करता था। इसीलिए उसके उन लेखों में जो अपना पक्ष साफ़ करने के लिए लिखे गए, कुछ जगहों पर सफ़ाई पेश करने का अंदाज़ भी बहुत साफ़ नज़र आता है।
इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें, तो मंटो के यहाँ यौन घटनाओं के बयान या अश्लीलता के विचार के बारे में एक स्पष्ट और ग़ैर-जज़्बाती साफ़गोई मिलती है। जिस तरह वह आम ज़िंदगी में भी ज़ाहिर तौर पर ग़ैर-शरीफ़ाना ज़िंदगी गुज़ारने वालों से बेझिझक मिलता था, उसी तरह अपनी कहानियों में लुच्चों, लफ़ंगों, भड़वों, तवायफ़ों, क़ातिलों, शराबियों, यानी नैतिक अपराध करने वालों के बयान में भी वह साफ़गो नज़र आता है। उसका लहज़ा किसी भी क़िस्म के नैतिक और दार्शनिक दिखावे से कोई वास्ता नहीं रखता। यह साफ़गोई मंटो के यहाँ उसकी नैतिक प्रतिबद्धता के नतीजे में ही पैदा हुई है। वरना यौन भावनाओं या यौन घटनाओं को दर्शाने में उसकी साफ़गोई मोराविया की तरह एक दिलचस्प फूहड़पन की शक्ल भी अख़्तियार कर सकती थी।
मोराविया और मंटो दोनों यौन भावनाओं को बयान करने में असाधारण महारत रखते हैं। दोनों इन भावनाओं के मनोवैज्ञानिक पहलुओं के जानकार हैं। हालाँकि मंटो का मामला इस लिहाज़ से अलग है कि उसका मक़सद यौन स्थितियों और घटनाओं की कोरी तस्वीरकशी नहीं है। यह सही है कि वह ऊपर से किसी नैतिक फ़ैसले को नहीं थोपता, फिर भी उसके किरदारों का काम आख़िरकार अपने सामाजिक संदर्भ की तरफ़ हमारा ध्यान खींचता है। उसकी कहानियों के बाहरी ढाँचे से एक नैतिक लहर ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ाहिर होती है और उनके अंत पर पाठक मज़ेदार घटनाओं की तस्वीरों के बजाय ख़ुद को कहानी के समग्र प्रभाव या उस मुख्य बिंदु के सामने पाता है जिसकी हैसियत मंटो के बुनियादी विज़न का ताला खोलने वाली चाबी की है। ज़ाहिर है कि साहित्य का मक़सद यौन घटनाओं का ज्यों-का-त्यों बयान करना है भी नहीं। यह काम समाजशास्त्र के विशेषज्ञ बेहतर तरीक़े से कर सकते हैं। मंटो अपने अनुभवों को एक चेतना के स्तर पर खोजता है, फिर उन्हें ठोस और सजीव रूपकों की मदद से फिर से रचता है,
उसके खुजली वाले कुत्ते ने भौंक-भौंककर माधो को कमरे से बाहर निकाल दिया। सीढ़ियाँ उतारकर जब कुत्ता अपनी ठूँठ जैसी पूँछ हिलाता सौगंधी के पास वापस आया और उसके क़दमों के पास बैठकर कान फड़फड़ाने लगा तो सौगंधी चौंकी, उसने अपने चारों तरफ़ एक भयानक सन्नाटा देखा, ऐसा सन्नाटा जो उसने पहले कभी न देखा था। उसे ऐसा लगा कि हर चीज़ ख़ाली है। जैसे मुसाफ़िरों से लदी हुई रेलगाड़ी सब स्टेशनों पर मुसाफ़िर उतारकर अब लोहे के शेड में बिल्कुल अकेली खड़ी है। यह ख़ालीपन जो अचानक सौगंधी के अंदर पैदा हो गया था, उसे बहुत तकलीफ़ दे रहा था। उसने काफ़ी देर तक इस ख़ालीपन को भरने की कोशिश की मगर बेकार। वह एक ही समय में बेशुमार ख़याल अपने दिमाग़ में ठूँसती थी। मगर बिल्कुल छलनी का-सा हिसाब था, इधर दिमाग़ को भरती थी, उधर वह ख़ाली हो जाता। बहुत देर तक वह बेंत की कुर्सी पर बैठी रही। सोच-विचार के बाद भी जब उसको अपना दिल बहलाने का कोई तरीक़ा न मिला तो उसने अपने खुजली वाले कुत्ते को गोद में उठाया और सागौन के चौड़े-से पलंग पर उसे पहलू में लिटाकर सो गई।
त्रिलोचन वापस आ गया। उसने आँखों ही आँखों में मोज़ेल को बताया कि पाली कौर जा चुकी है। मोज़ेल ने इत्मीनान की साँस ली। लेकिन ऐसा करने से बहुत सा खून उसके मुँह से बह निकला, 'ओह डैम् इट।' यह कहकर उसने अपनी महीन-महीन बालों से अटी हुई कलाई से अपना मुँह पोंछा और त्रिलोचन से मुख़ातिब हुई, 'ऑल राइट डार्लिंग.. बाय-बाय।' त्रिलोचन ने कुछ कहना चाहा मगर लफ़्ज़ उसके गले में अटक गए। मोज़ेल ने अपने बदन पर से त्रिलोचन की पगड़ी हटाई, 'ले जाओ इसको... अपने इस मज़हब को।' और उसका बाज़ू उसकी मज़बूत छातियों पर बेजान होकर गिर पड़ा।
'खोल दो' के आख़िरी जुमलों की तरह इन अंशों में भी कहानी की रग-रग में दौड़ता हुआ लहू एक बिंदु पर खिंच आया है; वाक़िया असर बन गया है और किरदारों के सोचने की प्रक्रिया उनके कामों का हिस्सा। इस स्तर पर मंटो का रचनात्मक रवैया हमें उसके तमाम समकालीनों के मुक़ाबले में बहुत जानदार दिखाई देता है और यह महसूस होता है कि मंटो अपनी रचनात्मक ज़िम्मेदारी की जैसी ज़बरदस्त समझ रखता था, उसकी मिसाल हमें उसके समकालीनों को छोड़ भी दें तो पश्चिम के उन महान कहानीकारों के यहाँ भी कम ही मिलेगी जो अश्लील लेखकों की श्रेणी से ताल्लुक़ रखते हैं।
साहित्य में अश्लीलता के तत्व पर टिप्पणी करते हुए एक आलोचक ने कहा था कि किसी अश्लील रचना की एक पहचान यह भी होती है कि उसके अश्लील हिस्सों को आम पाठक बार-बार पढ़ता है ताकि मज़ा लेने का एहसास क़ायम रहे। इस मज़े का सामान वाक़िये के अलावा बयान का ढाँचा तैयार करने वाले अल्फ़ाज़ और रूपक मुहैया कराते हैं। निचले दर्जे की किताबें शुरू से आख़िर तक इस माहौल को पाठक के सामने से ओझल नहीं होने देतीं। अमरीकियों की भाषा में इसे हम Hardcore Pornography कह सकते हैं। यह अश्लीलता अच्छे लिखने वालों के यहाँ एक रचनात्मक आयाम इख़्तियार कर लेती है। मिसाल के तौर पर जॉन बार्थ के नॉवेल The Sot-weed Factor (1960) में या हेनरी मिलर की कुछ किताबों में, जिस पर पाउंड ने हेमिंग्वे के नाम अपने एक ख़त में यह गहरी टिप्पणी की थी (1924) कि मैंने अभी-अभी एक दिलचस्प अश्लील किताब ख़त्म की है जिसका लेखक हेनरी मिलर नाम का एक शख़्स है।
इस मौक़े पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ न कहने के तरीक़े साहित्य में कभी भी दिलचस्प नहीं होते। कोरी लफ़्फ़ाज़ी या भाषाई दाँव-पेंच शैली के माहिरों के लिए ध्यान देने लायक़ हो सकते हैं, मगर साहित्य पढ़ने वालों की माँगों का सिलसिला इससे आगे भी जाता है। उनका मसला वह अनोखी इकाई होती है जो लफ़्ज़ और ख़याल के आपसी मेल के नतीजे में सामने आती है और हालाँकि उसका मक़सद पाठक तक सिर्फ़ कोई ख़बर ले जाना नहीं होता, मगर वह इस तत्व से ख़ाली भी नहीं होती। अश्लीलता के स्तर पर इस रवैये की शायद सबसे बेहतर मिसाल जेम्स जॉयस की 'यूलिसिस' में मौली ब्लूम की ख़ुद-कलामी (अपने आप से बातचीत) है। इसका एक अंश भी देखते चलें,
….I saw he understood or felt what a woman is and I knew I could get round him and I gave him all him all the pleasure I could leading him on till he asked me to say yes…and I thought well as well him as another and then I asked him with my eyes to to ask again yes and then he asked me would I yes to say yes my mountain flower and first I put my arms around him yes and drew him down to me so he could feel my brests all perfume yes and his heart was going like mad and yes I said yes I will yes.
यहाँ वारदात का सारा मज़ा ज़बान के कलात्मक इस्तेमाल से पैदा हुआ है और बयान की मद्धम-मद्धम, हल्की रौशनी वाली शैली ने काम की तीव्रता पर एक धुंध-सी फैला दी है। मंटो कई बार ज़बान का इस्तेमाल इस तरह करता है कि लफ़्ज़ दहकते हुए अंगारे बन जाते हैं। इस तरह उसकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ भी देखने में सादा होने के बावजूद एक मुश्किल कलात्मक लय रखता है। मगर मंटो की मीनाकारी जॉयस से बहुत अलग है, इसलिए उसकी प्रतिक्रिया भी तुलनात्मक रूप से ज़्यादा तीखी हुई। यूँ जॉयस की किताब को भी साहित्य की हैसियत से क़ुबूल करने पर लोग ख़ासी बहस और तकरार के बाद तैयार हुए थे और गंदी किताबों का कारोबार करने वाले उसे शुरू में अपने काम का लेखक समझ बैठे थे, लेकिन पर्दों की गर्द छँटने के बाद उसे अपने ही मानसिक माहौल में साहित्य के विद्रोही और विश्लेषणात्मक रुझानों का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कहा गया और उसकी किताब अवाँगार्द (avant-garde) रवैये के शुरुआती निशानों में गिनी जाने लगी।
मंटो के सिलसिले में भी ग़लत सोच का शोर अब धीमा पड़ चुका है लेकिन उसे उसके सही संदर्भ में देखने की परंपरा हमारे यहाँ अब तक आम नहीं हो सकी है। इसका कारण यही है कि साहित्य और अश्लीलता के संबंधों और उनके फ़र्क़ पर संजीदगी से ग़ौर करने की कोशिशें हमारे साहित्यिक माहौल में भी सिर्फ़ अपवाद की हैसियत रखती हैं। विडंबना यह है कि उर्दू बल्कि पूरे पूर्व की साहित्यिक परंपरा में सेक्स के तत्व को कमोबेश एक मुख्य विषय के तौर पर बरता गया है।
अस्करी ने इससे यह नतीजा निकाला था कि पूर्व का चिंतन सच्चाई की एक बहुत विस्तृत और असीम अवधारणा से जुड़े होने के कारण सच्चाई को ऊँचे और नीचे के ख़ानों में इस तरह नहीं बाँटता कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी दिखाई दें। इसके उलट, वह ज़िंदगी के हर रूप को, चाहे उसकी फितरत भलाई से जुड़ी हो या बुराई से, इंसानी अनुभवों की एक ही ज़ंजीर का हिस्सा समझता है और इस सिलसिले में किसी भी पूर्वाग्रह या संकोच को जायज़ नहीं मानता। पूर्व के क्लासिकी साहित्य में इस विचार की पुष्टि का सामान बहुत ज़्यादा है। मगर एक तथ्य के तौर पर यह कहना ग़लत न होगा कि भले ही वैचारिक स्तर पर हमने इस सच्चाई को बहुत खुले दिल से क़ुबूल कर लिया हो, हमारा समाज इस मामले में ख़ासा सख़्त रहा है और एक स्थायी दोहरापन उसके मिज़ाज का हिस्सा रहा है।
आम लोग जिन्हें दुआओं की किताब में मर्दाना ताक़त और यौन क्षमता के नुस्ख़ों की मौजूदगी पर कभी एतराज़ न हुआ, वही यौन प्रसंगों के इज़हार में एक तरह की पवित्रता को सज्जनता का पहचान-पत्र समझते रहे। पुराने लेखकों को तो ख़ैर जाने दीजिए कि उनके गद्य और पद्य में पर्दों का वजूद न होने के बराबर है और शेर और अफ़साने के पर्दे में वे अच्छी तरह खुल खेले हैं, मंटो के दौर तक हमारा सामाजिक माहौल इस मामले में ख़ासे दोग़लेपन का शिकार रहा है। आनंद लेने की प्रवृत्ति ने इस समाज में एक धार्मिक मूल्य का रुतबा पाया है और एक सांस्कृतिक विशेषता की हैसियत भी उसे हासिल रही है, मगर यौन क्रिया के सिलसिले में पाप छिपाने या जुर्म की पर्दादारी का रवैया भी यहाँ ख़ासा आम रहा है। इस रवैये की सामाजिक उपयोगिता मानी हुई बात है, फिर भी साहित्य में या सांस्कृतिक चिंतन में इसकी बेजा दख़लंदाज़ी ने न सिर्फ़ यह कि हमारे समाज की साहित्यिक अवधारणाओं को चोट पहुँचाई है, सच्चाई की तलाश के कुछ रास्ते भी हम पर बंद कर दिए हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर संजीदा और सार्थक कलात्मक रचना बुनियादी तौर पर नैतिक होती है, शायद नैतिकता से ज़्यादा नैतिक, लेकिन फ़नकार का नैतिक बोध चूँकि रस्मी नैतिकता को सदमा पहुँचाता है, इसलिए लोग उसे क़ुबूल करने से डरते हैं।
और मंटो का तो लगातार काम ही यही था। उनकी कहानियों के कुछ अंशों या चंद लापरवाह शब्दों के इस्तेमाल की बुनियाद पर उन्हें अश्लील कहने वालों को साहित्य के सौंदर्यशास्त्र का यह स्पष्ट सिद्धांत नहीं भूलना चाहिए कि मंटो की ज़्यादातर कहानियाँ एक पूरी घटना के रूप में अपनी अभिव्यक्ति का रूप तय करती हैं। फिर जहाँ तक लापरवाह और अशिष्ट शब्दों के इस्तेमाल का ताल्लुक़ है, इस संदर्भ में 'फैनी हिल' के लेखक का यह कथन भी एक सच्चाई को बयान करता है कि मैं शर्त लगाकर सबसे अश्लील किताब इस तरह लिख सकता हूँ जिसमें एक भी अश्लील शब्द इस्तेमाल न किया गया हो। इसे छोड़कर किसी शब्द के अश्लील या ग़ैर-अश्लील होने की बुनियादें क्या हैं? सामाजिक पर्दे या उस शब्द से पैदा होने वाली स्थिति और रचना के कुल प्रभाव के निर्माण में उस स्थिति की भूमिका? ज़ाहिर है कि इस सिलसिले में कोई भी साहित्यकार उन पैमानों को अपना मार्गदर्शक नहीं बना सकता जिनका आधार सिर्फ़ प्रचलित मुहावरे पर क़ायम हो। चॉसर और शेक्सपियर ने तो यहाँ तक कहा था कि,
टू गेन द लैंग्वेज
टिज़ नीडफुल दैट द मोस्ट इममॉडेस्ट वर्ड
बी लुक्ड अपॉन एंड लर्न्ट।
हेनरी 4 (पार्ट 2)
अब अगर इस मामले में उन्होंने समाज के दबाव को क़बूल कर लिया होता तो नतीजे किस हद तक भयानक होते। इसका अंदाज़ा हम सिर्फ़ इस घटना से लगा सकते हैं कि अमेरिकी प्यूरिटनिज़्म के प्रभाव में उन्नीसवीं सदी के मध्य तक वहाँ यह हाल रहा कि महिलाओं की मौजूदगी में ज़बान पर लेग्स (Legs) का शब्द लाना भी बुरा समझा जाता था। एक यात्री की डायरी में तो यह क़िस्सा भी मिलता है कि उस ज़माने में किसी दावत के मौक़े पर एक महिला ने मुर्ग़ की टाँग माँगी तो अपने मन की बात मुर्ग़ के 'फ़र्स्ट एंड सेकंड जॉइंट्स' (First & Second Joints) कहकर ज़ाहिर की। ख़ैर यह तो आम लोगों का हाल था, शब्दकोश तैयार करने वाले भी अपनी किताब में अश्लील शब्दों को शामिल करने से डरते थे। इस सेंसरशिप के नतीजे में साहित्य यौन घटनाओं के बयान से तो किसी न किसी हद तक बच गया, मगर उसकी जगह हिंसक क़िस्सों की लोकप्रियता ने ले ली। फोड़े को अगर कृत्रिम रूप से दबाने की कोशिश की जाए तो ज़हर सारे शरीर में फैल सकता है। चुनाँचे मौजूदा अमेरिकी समाज की स्थिति सामने है। यहाँ मैं सेक्स और हिंसा के आपसी रिश्तों के मसले में नहीं उलझना चाहता क्योंकि यह काम मनोवैज्ञानिकों का है, लेकिन साहित्य के एक आम पाठक की हैसियत से हम यह जानते हैं कि साहित्यकार का काम न तो मूल प्रवृत्तियों को दबाना है, न किसी ऐसी भावना की अभिव्यक्ति पर रोक लगाना है जो उसके अनुभव में शामिल हो और जिसकी बुनियाद पर वह किसी रचना के सृजन का दबाव महसूस कर रहा हो।
फिर मंटो ने हर कहानी में न तो आपबीती बयान की है, न ही उसने अपने रचनात्मक जीवन का मक़सद सेक्स या अश्लीलता के किसी विचार का प्रचार करना तय किया था। वह तो इस ख़ुशफ़हमी में भी मुब्तिला नज़र नहीं आता जो इस वर्ग के कुछ लेखकों के यहाँ ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा हो जाती है, यानी उसे यह सनक भी नहीं रही कि वह हेनरी मिलर की तरह सामाजिक दबाव से मुक्ति या इंद्रियों की आज़ादी का कोई घोषणापत्र तैयार कर रहा है। उसे यह एहसास ज़रूर था कि वह झूठ बोलने के हुनर से अनजान है। लेकिन वह उस झूठ से कभी भी मुनकिर (इनकार करने वाला) नहीं हुआ जो कलात्मक यथार्थवाद के ख़मीर का ज़रूरी हिस्सा होता है। 'गंजे फ़रिश्ते' के उपसंहार में उसने लिखा था कि मेरे सैलून (हज्जाम की दुकान) में कोई कंघी नहीं, कोई शैम्पू नहीं, कोई घुंघराले बाल बनाने वाली मशीन नहीं है। मैं बनाव-सिंगार करना नहीं जानता, इस किताब में जो फ़रिश्ता भी आया है उसका मुंडन हुआ है और यह रस्म मैंने बड़े सलीक़े से अदा की है।
दिलचस्प बात यह है कि मंटो ने इस रस्म अदायगी में ख़ुद अपनी ज़ात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया है और बारह गंजे फ़रिश्तों के साथ इसमें एक और गंजा फ़रिश्ता ख़ुद मंटो है। वह न दूसरों से झूठ बोल सकता था, न अपने आप से, चुनाँचे अपनी कहानियों में भी उसने झूठ को सिर्फ़ उस हद तक जायज़ रखा है जिसका बोझ ये कहानियाँ उठा सकें।
त्रासदी यह है कि इंसान सबसे ज़्यादा झूठ का आदी यौन मामलों के बयान में होता है। हेनरी मिलर के एक आलोचक ने कहा था, हेनरी मिलर पर क़ानूनी पाबंदी इसलिए लागू हुई कि उस पर पाबंदी लगाने वाले उसकी बातों पर यक़ीन भी रखते थे और यह जानते थे कि वह सच बोल रहा है। मंटो के साथ भी मामले की स्थिति कमोबेश यही रही है। उसके सबसे सख़्त आलोचक ने भी अब तक यह कहने की हिम्मत नहीं की है कि मंटो की कल्पना मानवीय अनुभवों की जिन दुनियाओं की यात्री है, वे महज़ वहम या एक बिगड़े हुए दिमाग़ की उपज हैं। चुनाँचे हर सच्चाई अपनी अभिव्यक्ति की पकड़ में आने के बाद अपने प्रभाव के सभी आयामों को सुरक्षित रखती है। उसकी कहानी अपने बयान के विवरणों के बजाय अपने समग्र प्रभाव, बल्कि उस प्रभाव के केंद्र बिंदु के ज़रिए पाठक की इंद्रियों पर हावी होती है, चुनाँचे मंटो को हम उस क़िस्म का दिलचस्प लेखक नहीं कह सकते जिसकी मिसाल हेनरी मिलर है।
हेनरी मिलर के बयान में साहित्यिकता का तत्व इस हद तक हावी है कि कभी-कभी दिमाग़ उसके अनुभव के बजाय अनुभव की यांत्रिक व्यवस्था और उसके भाषाई रूप के उलझाव में फँस जाता है, हालाँकि मिलर अपने गुमान में हमेशा इस भ्रम में मुब्तिला रहा कि पारंपरिक मायनों में वह साहित्यकार नहीं है और उसका असली कारनामा साहित्य और जीवन से जुड़ी दूसरी प्रचलित क़दरों (मूल्यों) के ख़िलाफ़ एक वैचारिक और भावनात्मक बग़ावत है। उसने अपनी किताबों को ख़ुदा, मुक़द्दर, ज़माने, इश्क़, हुस्न और कला—इन सबके लिए एक तोहमत, एक रुसवाई, एक गंदी गाली और नफ़रत की एक ठोकर क़रार दिया था। सोच के इस तरीक़े के नतीजे आख़िरकार मिलर की नैतिकता से ही जा मिलते हैं।
मंटो ने अपनी कहानियों में बयान का जो अंदाज़ अपनाया है, उसे भी हम एक तरह के नैतिक चुनाव का नतीजा कह सकते हैं, ख़ास तौर पर इसलिए भी कि मंटो की खुली-डुली शैली उसकी ख़तरनाक हद तक बेपर्दा और निष्कपट शख़्सियत का ही अक्स है। मंटो ने जिन दिशाओं में अपनी शख़्सियत का विकास किया था, कमोबेश उन्हीं के मुताबिक़ अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूपों को भी तय किया। इस प्रक्रिया में मंटो की अपनी ज़ात के साथ-साथ उसके दौर का बदलता हुआ मानसिक माहौल भी बराबर का हिस्सेदार है। मंटो ने सिर्फ़ अपने देश, अपनी क़ौम, अपनी धार्मिक मान्यताओं और अपने ख़ास सामाजिक विश्वासों या सांप्रदायिक बचावों को अपनी रचनात्मक चेतना की पृष्ठभूमि नहीं बनाया। वह समय के एक परिवर्तनशील, गतिशील और मौजूद दायरे की रोशनी में अपनी चेतना के विकास की सामग्री इकट्ठा करता है। इसलिए मंटो को सिर्फ़ उसकी अपनी साहित्यिक, राष्ट्रीय या सांस्कृतिक परंपरा के तराज़ू पर तौलने के नतीजों का ग़लत और अधूरा साबित होना स्वाभाविक था।
(6)
पाकिस्तान के प्रचलित नैतिक पैमाने क़ुरआन पाक की शिक्षा के हवाले से बहुत सही तौर पर मालूम हो सकते हैं। कहा जा सकता है कि अशिष्टता, कामुकता, वासना और बाज़ारूपन जीवन में मौजूद है। अगर साहित्यिक रुचि के उस पैमाने को स्वीकार कर लिया जाए जिसे बचाव पक्ष के गवाहों ने बयान किया है, तो जीवन के पहलुओं की यथार्थवादी अभिव्यक्ति अच्छा साहित्य हो सकती है, लेकिन फिर भी यह हमारे समाज के नैतिक पैमानों का उल्लंघन करेगा।
कहानी शीर्षक 'ठंडा गोश्त' को ध्यान से पढ़ने के बाद मुझे इत्मीनान हो गया है कि इसमें पाठकों का नैतिक स्तर बिगाड़ने की प्रवृत्ति मौजूद है और यह हमारे देश के प्रचलित नैतिक पैमानों का उल्लंघन करती है। इसलिए मैं आरोपी सआदत हसन मंटो को एक अश्लील रचना पेश करने का ज़िम्मेदार ठहराता हूँ और उसे धारा 292, पी.सी. के तहत तीन महीने की सश्रम क़ैद और तीन सौ रुपये जुर्माने की सज़ा देता हूँ। जुर्माना न चुकाने की सूरत में उसे इक्कीस दिन की और सज़ा भुगतनी पड़ेगी।
ए. एम. सईद।
मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, लाहौर
यह अंश 'ठंडा गोश्त' पर चले मुक़दमे के फ़ैसले से लिया गया है और इस पर 16 जनवरी 1950 की तारीख़ दर्ज है। यह तारीख़ 16 जनवरी 1980 भी हो सकती थी (और सज़ा में सौ कोड़ों का इज़ाफ़ा भी हो सकता था)। साहित्य में अश्लीलता की धारणा के प्रति महज़ आम सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर रवैयों का बदलाव काफ़ी नहीं है, जब तक कि क़ानून की धाराओं पर भी जीवन की शैलियों और मूल्यों में समय के साथ-साथ होने वाले बदलावों ने सीधा असर न डाला हो। यह बात अनहोनी नहीं है, मगर सिर्फ़ उन समाजों के लिए जिनकी सामूहिक सूझबूझ बदलाव की प्रक्रिया से गुज़रने की क्षमता रखती है और मानवीय अनुभवों के किसी तयशुदा रूप को हर ज़माने के लिए एक जैसा और बदलावों से परे नहीं समझती। इसलिए दुनिया के ज़्यादातर देश जिनका सामाजिक ढाँचा विकासशील रहा है, प्रकृति के इस आम नियम को मानते आए हैं कि जीवन की बाहरी दिशा और रफ़्तार का असर समाज की भीतरी व्यवस्था पर भी पड़ता है और हर ज़माना अपने मूल्यों और विचारों का ढाँचा अपनी मनोवैज्ञानिक स्थिति, उस स्थिति से पैदा हुए दबाव और उस दबाव के साये में पनपने वाले नैतिक स्वभाव के अनुसार तैयार करता है।
लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ज़माना आगे बढ़ जाता है मगर राष्ट्रीय और देशी क़ानूनों के स्तर पर हलचल के निशान पूरी तरह ग़ायब होते हैं। मंटो को अपनी रचनाओं के सिलसिले में पाकिस्तान के मौजूदा क़ानूनों और नैतिक नियमों की रोशनी में किन हालात की आज़माइश से गुज़रना पड़ता, यह सोचकर आज हम काँप जाते हैं। एक ज़माने में वॉल्ट व्हिटमैन को अपने दौर के सबसे अश्लील दरिंदे का ख़िताब दिया गया था। एक अरसा हुआ, मंटो का ज़िक्र करते हुए एक प्रगतिशील आलोचक ने कहा था कि मंटो जैसे गंदगी लिखने वाले गोर्की के रूस में भी पैदा हुए थे। लेकिन आज, दोस्तोयेव्स्की की हैसियत रूसी साहित्य के शायद सबसे बड़े गौरव की है और ख़ुद प्रगतिशील आलोचना ने मंटो से हार मान ली है। कुछ समय पहले तक अमेरिका के कुछ पुस्तकालयों में जॉयस की किताब 'A Portrait of the Artist as a Young Man' उस कमरे में ताले में बंद करके रखी जाती थी जहाँ ख़तरनाक क़िस्म की सामग्री का ढेर लगा दिया जाता था, ताकि आम लोगों तक इसके कीटाणु न पहुँच सकें।
कहीं-कहीं इस रस्म का चलन भी था कि मशहूर चित्रकारों की बनाई हुई निर्वस्त्र औरतों की तस्वीरों में नग्नता का प्रभाव पैदा करने वाले हिस्से काग़ज़ की कतरनों या पुस्तकालय की मोहरों से छिपा दिए जाते थे (जापानी जो कि एक उद्देश्यवादी क़ौम हैं, यह रस्म अब तक निभाते जा रहे हैं, इस एहसास से पूरी तरह बेपरवाह होकर कि नग्नता को छिपाने का यह तरीक़ा उसे और ज़्यादा उजागर कर देता है)। कम्युनिस्ट देशों में बुर्जुआ (पूँजीवादी) देशों के लेखकों की ऐसी किताबें जिनसे कम्युनिस्ट विचारों या उद्देश्यों पर चोट पहुँचती है, अक्सर अश्लील क़रार दी जाती हैं।
मनोविज्ञान के एक विद्वान का कथन है कि गंभीर उद्देश्य रखने वाली मगर आम नैतिकता की डगर से हटी हुई किताबों को अश्लील कहने वाले अक्सर अधेड़ उम्र के बदचलन लोग होते हैं, जिनके नज़दीक अश्लील रचनाएँ यौन भावनाओं को भड़काने वाले सामान के समान होती हैं। इस नज़रिए के सही या ग़लत होने पर बहस यौन मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मैदान है, फिर भी गंभीर फ़िक्शन के बारे में यह ख़याल ग़लत नहीं है कि अपनी नैतिक माँगों को पूरा करने के लिए इस तरह की रचनाओं में नकार (निषेध) का एक तत्व ज़रूरी हिस्से की हैसियत रखता है। इस नकार की चोटें प्रचलित परंपराओं, स्थापित मान्यताओं, मूल्यों, विश्वासों, पूर्वाग्रहों और यक़ीनों, इन सब पर पड़ती हैं।
मंटो ने कहा था, साहित्य तापमान है अपने देश का, अपनी क़ौम का... साहित्य अपने देश, अपनी क़ौम की बीमारी की ख़बर देता रहता है। पुरानी अलमारी के किसी ख़ाने में हाथ बढ़ाकर कोई धूल भरी किताब उठाइए, बीते हुए ज़माने की नब्ज़ आपकी उँगलियों के नीचे धड़कने लगेगी। इसी लेख ('कसौटी') में उसने यह भी कहा था कि, यह ज़माना नए दौरों और नई टीसों का ज़माना है। एक नया दौर पुराने दौर का पेट चीरकर पैदा किया जा रहा है। पुराना दौर मौत के सदमे से दो-चार है। नया दौर ज़िंदगी की ख़ुशी से चिल्ला रहा है। दोनों के गले रुंधे पड़े हैं। दोनों की आँखें नम हैं। इस नमी में अपनी क़लम डुबोकर लिखने वाले लिख रहे हैं।
साहित्य की रचनात्मक धारणा पर जान देने वाला (पारिभाषिक रूप से) आलोचक पलटकर यह पूछ सकता है कि साहित्य आख़िर बीमारी की ही ख़बर क्यों देता है? आख़िर साहित्य के दस्तरख़्वान पर स्वास्थ्यवर्धक नेमतों की भी कमी नहीं है और अपनी उपयोगिता के लिहाज़ से ये नेमतें दवाओं की मिसाल हैं। मंटो के नज़दीक ऐसी दवाओं के इस्तेमाल का औचित्य एक तरह की नैतिक कब्ज़ पैदा करता है। फिर उसे तो हमेशा इस बात पर ज़ोर रहा है कि अदीब (लेखक) का दर्जा दवाख़ाने के इंतज़ाम और संचालन से कहीं ऊपर है। ख़ुद को डॉक्टर समझने का साफ़ मतलब यह है कि दूसरों को मरीज़ समझा जाए। मंटो अपने समाज की बीमारियों की समझ तो रखता है, मगर इस तरह कि वह ख़ुद अपनी ज़ात को भी इसके दुखों से अलग नहीं समझता। इसी के साथ-साथ वह यह भी जानता है कि एक लेखक की हैसियत से समाज को उसकी बीमारियों का एहसास दिलाकर वह झिंझोड़ तो सकता है, लेकिन इलाज के मामले में वह एक हक़ीक़त से भरी बेबसी का शिकार भी है। समाज की व्यवस्था और निर्माण व विकास की बागडोर जिन हाथों में है, वे उसके हाथों से ज़्यादा ताक़तवर हैं। ऐसा न होता तो मानव समाज अपने दुखों के जंजाल से कब का आज़ाद हो चुका होता। उसे इन बीमारियों से नफ़रत है क्योंकि इनकी तबाही से वह आम इंसानों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा वाक़िफ़ है।
उसका मानवीय अस्तित्व के विभिन्न स्तरों और आयामों का बोध भी आम इंसानों के मुक़ाबले ज़्यादा गहरा और सुसंगत है। इसीलिए बुरे से बुरे इंसान की तरफ़ भी उसका रवैया बराबरी का है और वह इस बात पर उदास है कि उसके समाज ने दुखों का जो बोझ उठा रखा है, उससे ख़ुद उसके कंधे भी दबे जा रहे हैं। इसलिए मंटो का रचनात्मक चरित्र अपनी ज़िल्लत के एहसास से उभरा है। उसने अँधेरे को अँधेरे के तौर पर देखा और इस ग़िलाफ़ (आवरण) से कुछ चिंगारियाँ ढूँढ निकालीं, जो अस्तित्व को झुठलाए बिना रोशनी की तलाश का पता देती हैं। मंटो के समाज की नैतिक बुनियादें अभी इतनी मज़बूत नहीं थीं कि उन हक़ीक़तों को भी बर्दाश्त कर सकतीं जो ख़ुशी देने वाली नहीं हैं। फिर उसका क़सूर यह भी था कि उसने उम्मीद बाँधने के दौर में अपने प्रगतिशील समकालीनों की तरह इंसान की महानता और उम्मीद के राग क्यों नहीं अलापे। मंटो ने सिर्फ़ सच्चाई की महानता पर भरोसा किया और उन तकलीफ़ों को एक मूल्य माना जिनके अंकुर सच्चाई की शाख़ से फूटते हैं।
'ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शां' में मंटो ने विश्व साहित्य के कई हवालों से अपने दावों की पुष्टि के लिए कई बिंदु निकाले हैं। 'मादाम बोवारी' पर अश्लीलता के मुक़दमे का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बचाव पक्ष के वकील की बहस का एक अंश भी पेश किया है। अंश यूं है,
सज्जनों! यह किताब जो सरकारी वकील के अनुसार कामुक भावनाओं को भड़काती है, मोसियो फ़्लाबेयर के विस्तृत अध्ययन और सोच-विचार का नतीजा है। उन्होंने अपना ध्यान अपनी गंभीर प्रकृति के माध्यम से ऐसे ही गंभीर और उदास विषयों की तरफ़ मोड़ा है। वह ऐसा आदमी नहीं है जिसके ख़िलाफ़ सरकारी वकील ने उत्तेजक तस्वीरों के चित्रण के आरोप में जगह-जगह अपने भाषणों में ज़हर उगला है। मैं फिर दोहराता हूं कि फ़्लाबेयर के स्वभाव में बेइंतिहा संगीनी, गहरी संजीदगी और बेपनाह मलाल भरा पड़ा है।
मंटो ने इस अंश के साथ यह दावा नहीं किया कि वह ख़ुद फ़्लाबेयर के स्तर के लेखक हैं। उनके यहां निचले स्तर पर ही सही, मगर शब्दों का वही संयम, भावनाओं का वही नियंत्रण, बारीकियों के बयान में वही ज़मीनी सच्चाई और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति में वही वस्तुनिष्ठता (मारूज़ियत) मिलती है जिससे फ़्लाबेयर की रचनाएं पहचानी जाती हैं। मंटो ने बस रवैये की समानता पर ज़ोर दिया है, इन शब्दों में कि 'ठंडा गोश्त' में फ़्लाबेयर के स्वभाव की बेइंतिहा संगीनी और गहरी संजीदगी शायद न हो, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि यह बेपनाह मलाल से भरा पड़ा है। इस मलाल की अभिव्यक्ति ईशर सिंह के किरदार की स्वाभाविक पीड़ा से भी होती है और कहानी के अंत से फूट निकलने वाले भाव से भी। इससे पहले ईशर सिंह और कुलवंत कौर की आपसी छेड़-छाड़ और रोमांस का जो दृश्य मंटो ने पेश किया है, वह अपनी रंगीनी के कारण विरोधाभास का माहौल पैदा करता है, इसलिए मलाल का प्रभाव किसी भावनात्मक अतिशयोक्ति के बिना घटना के स्तर से ख़ुद-ब-ख़ुद प्रकट हुआ है।
मंटो की अश्लील बयानी को उसके संदर्भ में देखा जाए तो वह एक प्रकार की कलात्मक ज़रूरत बन जाती है और उसका अर्थ वह नहीं रह जाता जिस पर उनके निरीक्षकों या आपत्ति करने वालों ने अपनी नैतिकता के पैमाने लागू किए हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मंटो की शैली में फ़्लाबेयर जैसी शालीनता और कोमलता तो नहीं, फिर भी उनका रवैया कारोबारी मानसिकता रखने वाले अश्लील लेखकों से पूरी तरह अलग है। वह अपनी शोख़-बयानी से पाठक की घटिया भावनाओं को हवा नहीं देते, न ही अश्लील रवैयों के बाज़ार में विलासिता के साधन उपलब्ध कराने वाली शाब्दिक तस्वीरों के ढेर सजाते हैं। अपरिपक्व पाठक अगर इससे ग़लत निष्कर्ष निकालता है तो उसका कारण पाठक की अपनी कमियों के अलावा यह भी है कि इसमें क़ुसूर पाठक की समझ का है। उनकी शैली के खुरदरेपन से झलकने वाला पाशविक प्रभाव भी पाठक की ग़लतफ़हमियों को बल पहुंचाता है।
मंटो की शैली उनके किरदारों की तरह अपने भीतर की कोमलता को बाहरी सतह की कठोरता के नीचे छिपाए रखती है। आम पाठक की नज़र बाहरी रूपों में उलझ कर रह जाती है, इसलिए उनके पर्दे में छिपी हक़ीक़त तक पहुंच मुमकिन नहीं होती। लॉरेंस ने 'लेडी चैटरलीज़ लवर' का बचाव करते हुए कहा था कि तमाम आक्रामकता के बावजूद मैं इस उपन्यास को एक ईमानदार, स्वस्थ किताब कहता हूं जो आज के समाज के लिए ज़रूरी है। वे शब्द जो शुरू-शुरू में पढ़ने वाले को इस हद तक चौंकाते हैं, कुछ पलों बाद इस क्षमता से ख़ाली दिखाई देते हैं। वजह यह है कि इन शब्दों ने सिर्फ़ आंखों को चौंकाया था, दिमाग़ को नहीं। समझदार लोग यह जानते हैं कि इन शब्दों ने उन्हें चौंकाया नहीं था। इसके विपरीत उन्हें एक तरह के सुकून का एहसास होता है।
मंटो की शैली पढ़ने वाले को आश्चर्य और उत्तेजना दोनों का अनुभव देती है, मगर इसके कारणों का संबंध कहानियों की बाहरी संरचना से ज़्यादा घटनाओं की अनोखी बुनावट और उनके अप्रत्याशित अंत से है। फिर लॉरेंस के विपरीत मंटो पाठक को भावनाओं के शुद्धिकरण (कैथार्सिस) का हुनर नहीं बताते, बल्कि उसे मानसिक और संवेदी बेचैनी की एक स्थायी और जटिल स्थिति से दो-चार करते हैं। यह स्थिति साहित्य के गंभीर पाठक के लिए एक लंबी और कष्टदायक खोज का फल होती है, जबकि आम लोगों के लिए सिर्फ़ घबराहट और सच्चाई को गले से नीचे न उतार सकने की खीझ का सामान। अस्करी ने इस वर्ग के पाठकों के लिए एक प्रश्नचिह्न लगाया है, यह कि,
अगर हमें झिंझोड़ कर जगाने के बाद मंटो ने हमें मानव स्वभाव और मानव समाज का कोई तमाशा नहीं दिखाया, अगर उसने हमारे अंदर ज़िंदगी की कोई नई चेतना पैदा नहीं की, तो फिर हम उसे गालियां देने में सही होंगे कि उसने हमें चैन से सोने भी न दिया। जो लोग किसी क़ीमत पर जागना ही नहीं चाहते उन्हें तो उनके हाल पर छोड़िए, लेकिन क्या आप 'नया क़ानून', 'हत्क' या 'बाबू गोपीनाथ' जैसी कहानियां पढ़ कर ईमानदारी के साथ कह सकते हैं कि मंटो ने हमें चौंका कर बेकार में हमारी नींद ख़राब की।
यह एक अत्यंत मुश्किल सवाल है, ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए जो स्वभाव के एकांगीपन और हठधर्मी को चरित्र की दृढ़ता का नाम देते हैं। और हम में से अधिकतर लोगों के मिज़ाज का ढंग यही होता है। सच्चाई की ग़लत या सही जैसी भी अवधारणा हम एक बार क़ायम कर लेते हैं, उसे आसानी से बदलने पर तैयार नहीं होते। और मंटो का तो काम ही यह था। उनके एहसास की ज़मीन से स्पर्श होने के बाद सच्चाइयां भी बदलती हैं और उनको देखने और समझने के नज़रिए भी। लेकिन सामाजिक क़ानूनों की परवरिश जिन सच्चाइयों की ख़ुराक पर होती है, उनका रूप-रंग लगभग हमेशा एक जैसा रहता है। ये सच्चाइयां बरसों-बरस की परखी हुई होती हैं, प्रचलित अवधारणाओं और भ्रमों की पाली हुई। उनका संबंध समय के उस हिस्से से होता है जो अतीत है, यानी कि जीवित अनुभवों की चोट से पूरी तरह सुरक्षित और बदलती हुई सच्चाइयों के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त। अस्थिरता के कष्ट सिर्फ़ वर्तमान उठाता है, इसलिए उसकी बिसात पर हर पल सच्चाइयां बनती और बिगड़ती रहती हैं। 'ऊपर, नीचे और दरमियान' के मुक़दमे का फ़ैसला करने वाले मजिस्ट्रेट ने कहा था,
क़ानून यह नहीं चाहता कि साहित्य अपनी मांगों या उद्देश्यों को पूरा न करे। क़ानून यही चाहता है कि इन उद्देश्यों को इंसान के लिए उपयोगी होना चाहिए। अगर उद्देश्य उपयोगी न हो, यानी केवल कामुक भावनाओं को उत्तेजित करना उद्देश्य तो न हो, मगर विषय और शब्द ऐसे हों जिनसे कमज़ोर, बीमार या अपरिपक्व दिमाग़ कामुक आनंद में ग्रस्त हो जाएं, तो क़ानून उस लेख को अनुपयोगी और अश्लील क़रार देता है।
यह लतीफ़ा भी 'शेर-मरा-ब-मदरसा-के-बुर्द' (मेरे शेर को मदरसे कौन ले गया) के समान है। क़ानून की नज़र में साहित्य की अनुपयोगिता और अश्लील लेखन पर्यायवाची हैं। समाजवादी क़ानूनों की नज़र में हर वह रचना अश्लील है जो समाजवादी समाज के आदर्शों से मेल न खाती हो। कैथोलिक सरकारों ने उन किताबों और लेखकों को अश्लील माना जो चर्च के लागू किए गए नैतिक मानदंडों और नियमों के उल्लंघन के दोषी हुए हों। बोदलेयर उन्नीसवीं सदी के फ्रांस के लिए अश्लील है, बीसवीं सदी तक आते-आते वह मानवीय अनुभव की सबसे दूर की सरहदों का संदेशवाहक बन गया। विचारधारा, नैतिकता और सामाजिक संरक्षण की राजनीति जब सौंदर्यशास्त्र की भूल-भुलैया में क़दम रखती है, तो उससे ऐसे ही लतीफ़े जन्म लेते हैं। मंटो ने 'पस-मंज़र' में इसी रवैये को व्यंग्य का निशाना बनाया है,
ये जितने लेखक और शायर बने फिरते हैं, अब इनको चाहिए कि होश में आएं और कोई शरीफ़ाना पेशा अपनाएं।
लीडर बन जाएं...
सिर्फ़ मुस्लिम लीग के?
जी हां! मेरा मतलब यही था, किसी और लीग का लीडर बनना फ़हश (अश्लील) है।
बेहद फ़हश...
यह साहित्य के मामले में रवैये की अश्लीलता का एक और नमूना है। इंसानी समाज की रंगा-रंगी के लिए मूर्खों का वजूद ज़रूरी ही सही, मगर यह लतीफ़ा मुसीबत उस वक़्त बन जाता है जब गंभीर मसलों पर विचार व्यक्त करने और फ़ैसले के अधिकारों की बागडोर भी उनके हाथों में आ जाती है। यह सही है कि क़ानूनों का निर्माण आम इंसानों के अमल और प्रतिक्रिया की बुनियादों पर किया जाता है, लेकिन साहित्य या ललित कलाओं से जुड़े मसले किसी भी सूरत में आम लोगों के मसले नहीं हैं। ये मसले अपनी समझ के लिए कुछ ख़ास शर्तें तय करते हैं और पाठक से चेतना के एक अलग स्तर की मांग करते हैं, मगर इंसानी समाज और उससे जुड़े क़ानूनों की व्यवस्था जिन रेखाओं पर हुई है, उनके निर्धारण में आम इंसानों का दख़ल इस हद तक रहा है कि इंसानी इंद्रियों की सबसे नाज़ुक हलचलों की दुनिया भी उनके अधिकारों से आज़ाद नहीं रह सकी है। 'यूलिसिस' के मुक़दमे के फ़ैसले में ये अल्फ़ाज़ भी शामिल थे,
एक ख़ास किताब ऐसे (कामुक) जज़्बात और ख़यालात पैदा कर सकती है या नहीं, इसका फ़ैसला अदालत की राय में यह देखकर होगा कि औसत दर्जे की यौन प्रवृत्तियां रखने वाले आदमी पर इसका क्या असर होता है, ऐसे आदमी पर जिसे फ्रांसीसी 'मामूली क़िस्म की संवेदनाएं रखने वाला इंसान' कहते हैं और जिसकी हैसियत क़ानूनी तफ़्तीश की इस शाखा में एक फ़र्ज़ी कारक की होती है जैसे छोटे-मोटे मुक़दमों में 'समझ-बूझ वाले आदमी' की हैसियत होती है या रजिस्ट्रेशन के क़ानून में आविष्कार के मसले से जुड़े किसी कला के माहिर की।
यानी यह कि किसी मशीन के काम को समझने के लिए तो हम उस क्षेत्र के माहिर के पास जाने पर मजबूर होंगे, मगर साहित्य के मामलों में हर ऐरे-ग़ैरे की राय अहम हो सकती है। उन ज़मानों में जब साहित्य और ललित कलाओं को एक आम सांस्कृतिक मूल्य की हैसियत हासिल थी और विशेषज्ञता के क़हर से इंसानी समाज महफ़ूज़ था, इस विचारधारा की तार्किकता का औचित्य पेश किया जा सकता है। मंटो ने अपनी कहानियों की सामग्री आम ज़िंदगी के ख़ज़ानों और आम इंसानों के तजुर्बों से हासिल की थी, मगर वो किरदार जिनके माध्यम से उसने ज़िंदगी की दिल दहला देने वाली हक़ीक़तों का सुराग़ लगाया, उसके पाठक नहीं थे। मंटो ने आग़ा हश्र की तरह अपनी तहरीरें तांगे वालों को नहीं सुनाईं कि आम इंसानों की प्रतिक्रिया का अंदाज़ा करके वह उनकी कमर्शियल हैसियत तय कर सके। वह तो उम्र भर इस यक़ीन को सीने से लगाए रहा कि कहानियां लिखना उसके लिए सिर्फ़ पेशा नहीं, एक आंतरिक ज़रूरत का दबाव है। वह इसलिए लिखता है कि उसे कुछ कहना होता है।
ज़िंदगी में अर्थ की तलाश से पहले ज़रूरी है कि ख़ुद अपने रवैये के अर्थ तय किए जाएं। मंटो इस फ़र्ज़ से कभी लापरवाह नहीं रहा, इसीलिए उसका बुरे से बुरा अफ़साना भी हमारे लिए कुछ न कुछ अर्थ ज़रूर रखता है। अश्लीलता की एक परिभाषा यह भी है कि वह लिखने वाले और पढ़ने वाले दोनों को ख़ुदग़रज़ बनाती है। दोनों के मक़सद पूरी तरह निजी, सतही और तयशुदा होते हैं, मगर मंटो ने अहंकार का नक़ाब पहनने के बाद भी अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को क़ायम रखा। ऐसा न होता तो मंटो की तहरीरों के ख़िलाफ़ लेखक के सामाजिक जुड़ाव और साहित्य के सामाजिक रोल पर ज़ोर देने वाले हल्क़ों की तरफ़ से इतनी कड़ी प्रतिक्रिया का इज़हार न होता। मंटो ने सामाजिक प्रतिबद्धता के अर्थ ही बदल दिए, चुनांचे अपने प्रगतिशील समकालीनों से उसके मतभेदों के बावजूद ख़ुद प्रगतिशील आलोचक भी मंटो पर न तो सामाजिक चेतना से ख़ाली होने की तोहमत लगा सकते हैं, न उसे मीरा जी की क़िस्म के लेखकों की सफ़ में रखा जा सकता है।
उसने कहा था, हम लिखने वाले पैग़ंबर नहीं। हम एक ही चीज़ को, एक ही मसले को अलग-अलग हालात में अलग-अलग नज़रियों से देखते हैं और जो कुछ हमारी समझ में आता है, दुनिया के सामने पेश कर देते हैं और दुनिया को कभी मजबूर नहीं करते कि वह उसे क़ुबूल भी करे। यह तो मंटो का अपना नज़रिया था जिसमें विनम्रता की शालीनता भी है और लेखक के कर्तव्य की पहचान भी। उसने अपनी तरफ़ से कोई दबाव अपने समाज पर या अपने पाठक पर नहीं थोपा। लेकिन दुश्वारी यह थी कि मंटो की कल्पना की उर्वरता ने जिन सच्चाइयों के निशान ढूंढ निकाले थे, ख़ुद उनकी हैसियत एक ऐसे स्थायी दबाव की थी जो ज़िंदगी की संरचना में शामिल है और जिसकी पीड़ा उठाने की क्षमता हर एक में न थी। आम इंसानों की तरह ज़्यादातर सामाजिक क़ानून कठोर भी होते हैं और उनके रक्षक अपनी अक्षमता को स्वीकार करने पर तैयार भी नहीं होते। मंटो ने उनसे ऐसी कोई मांग भी नहीं की। ऐसी सूरत में समझदारी की बात तो यही थी कि वे मंटो को भी अपनी जवाबदेही और मांगों से आज़ाद छोड़ देते, यह सोच कर कि दुनिया की हर चीज़ हर शख़्स के लिए नहीं होती। मगर इसे एक आम इंसान की हैसियत से मंटो की ख़ुशनसीबी समझा जाए या बदक़िस्मती कि बतौर लेखक उसे नज़रअंदाज़ करना मुमकिन ही न था, सो यह संकट उसे भुगतना ही पड़ा। मंटो की हैसियत इसीलिए उर्दू फ़िक्शन के इतिहास में एहसास और फ़िक्र की एक शैली की भी है और एक हंगामाखेज़ घटना की भी।
अपने अफ़सानों के सिलसिले में मुझ पर चार मुक़दमे चल चुके हैं, पांचवां अब चला है जिसका विवरण मैं बयान करना चाहता हूं। पहले चार अफ़साने जिन पर मुक़दमा चला, उनके नाम निम्नलिखित हैं: 'काली शलवार', 'धुआं', 'ठंडा गोश्त', और पांचवां 'ऊपर नीचे और दरमियान'। पहले तीन अफ़सानों में तो मेरी ख़लासी हो गई, 'काली शलवार' के सिलसिले में मुझे दिल्ली से दो-तीन बार लाहौर आना पड़ा। 'धुआं' ने मुझे बहुत तंग किया, इसलिए कि मुझे मुंबई से लाहौर आना पड़ता था, लेकिन 'ठंडा गोश्त' का मुक़दमा सबसे बाज़ी ले गया। उसने मेरा भुरकस निकाल दिया। यह मुक़दमा हालांकि यहां पाकिस्तान में हुआ, मगर अदालतों के चक्कर कुछ ऐसे थे जो मुझ जैसा संवेदनशील आदमी बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि अदालत एक ऐसी जगह है जहां हर अपमान बर्दाश्त करना ही पड़ता था। ख़ुदा करे, किसी को, जिसका नाम 'अदालत' है, उससे वास्ता न पड़े। ऐसी अजब जगह मैंने कहीं भी नहीं देखी। पुलिस वालों से मुझे नफ़रत है। इन लोगों ने मेरे साथ हमेशा ऐसा सुलूक किया है जो घटिया क़िस्म के नैतिक अपराधियों से किया जाता है।
निगरानी और सेंसरशिप की सीमाओं पर विचार व्यक्त करते हुए पश्चिम के एक उच्च न्यायालय के जस्टिस ब्रेनन (जिन्होंने उस ज़माने के प्रसिद्ध Roth case का फ़ैसला किया और जिसके बाद ज़्यादातर पश्चिमी देशों के सेंसरशिप के निज़ाम में ज़बरदस्त तब्दीलियां सामने आईं) ने कहा था कि किसी लेखक पर अश्लीलता का जुर्म लगाने से पहले कम से कम तीन बातों की पुष्टि होनी चाहिए। एक तो यह कि संबंधित तहरीर का बुनियादी प्रभाव समग्र रूप से यौन घटनाओं में एक घटिया दिलचस्पी को बढ़ावा देता है, दूसरे यह कि इस तहरीर का मक़सद समकालीन सामाजिक रवैयों और नियमों को जान-बूझकर आहत करना है, और तीसरे यह कि लेखक ने अपनी तहरीर में जो सामग्री पेश की है, उसका सामाजिक मूल्य कुछ भी नहीं है।
इस विचारधारा से अंदाज़ा होता है कि हमारे ज़माने तक आते-आते साहित्य में अश्लीलता की अवधारणा की व्यापकता का एहसास सिर्फ़ साहित्य लिखने वालों या साहित्य से पेशेवर संबंध रखने वालों तक सीमित नहीं रह गया था। इसके सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारकों का क़िस्सा बहुत लंबा है, बहरहाल, संक्षेप में यहाँ इस बात की तरफ़ इशारा ज़रूरी है कि साहित्य की समझ और रचना दोनों के बारे में हमारे दौर के आम दृष्टिकोण में बहुत धुंधला और खामोश ही सही, मगर कुछ न कुछ बदलाव ज़रूर हुआ है। इसका कारण यह है कि अब साहित्य की दुनिया भी विशिष्टता के दायरे में सिमटती जा रही है। दूसरे यह कि हमारे समाज में अब साहित्यकार पहले जैसी ख़तरनाक हैसियत रखने वाला नागरिक नहीं रह गया है। समाज की व्यवस्था और इसके विकास और निर्माण के अधिकार अब जिस तरह के व्यक्तियों के नाम लगभग सुरक्षित हो चुके हैं, वे साहित्यकार को सामाजिक स्तर पर अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझते।
अब 'फैनी हिल' जैसी किताबें खुलेआम छपती और बिकती हैं और फ्रैंक हैरिस, या हेनरी मिलर जैसे लेखकों को सामाजिक संस्थाएं डर, नफ़रत और तिरस्कार की नज़र से नहीं देखतीं। आम लोगों की नज़र में साहित्यकार एक हानिरहित प्राणी है और बस। इसीलिए जन-स्तर पर अब किसी साहित्यिक रचना के सिलसिले में प्रतिक्रिया या तो व्यक्त ही नहीं होती और अगर होती भी है तो उसके परिणाम दूरगामी नहीं होते। पश्चिम के ज़्यादातर देशों में खुले विचारों की इस परंपरा का सिलसिला काफ़ी समय पहले शुरू हो चुका था। हालाँकि साम्यवादी समाज या ऐसे देश जहाँ व्यक्तिगत सत्ता की रस्म अब तक चली आ रही है, इस तरह के खुले विचारों को अब भी स्वीकार करने पर तैयार नज़र नहीं आते, कारण बहुत स्पष्ट है। सत्ता चाहे व्यक्तिगत हो या इसकी बागडोर किसी विशेष विचारधारा या राजनीतिक अवधारणा और धार्मिक आस्था के प्रचारकों के हाथ में हो, वह हर उस सच्चाई को शक और डर की निगाह से देखती है जिससे उसकी अपनी बुनियादों पर चोट पड़ती है, या अगर सीधे तौर पर चोट नहीं भी पड़ती तो कम से कम जिससे सत्ताधारियों के अपने राष्ट्रीय, सांप्रदायिक, राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रहों की पुष्टि न होती हो।
ऐसे समाजों का नैतिक दायरा इतना सीमित और चेतना की बुनियादें इस हद तक कमज़ोर होती हैं कि असहमति की मामूली सी लहर भी उन्हें अपने लिए एक ख़तरा दिखाई देती है। इस स्थिति के तमाशे व्यक्तिगत या वैचारिक सत्ता के अधीन समाजों में आए दिन दिखाई देते हैं। ऐसे समाजों में सेंसरशिप के नियमों और क़ानूनों का निर्धारण जितनी दोषपूर्ण और कमज़ोर मान्यताओं की बुनियाद पर होता है, उनकी कल्पना भी सभ्य दुनिया के लिए सबक़ का ख़ासा सामान प्रदान करती है। मंटो पर क़ानून की जिस धारा के तहत मुक़दमे चलाए गए, उसका विवरण ख़ुद मंटो ने ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ में बयान किया है,
अश्लीलता की जाँच का पैमाना वहाँ यह तय किया गया है कि क्या अश्लीलता के तहत आरोपित लेख में उन लोगों का चरित्र बिगाड़ने और उनको बुरी प्रेरणा देने की प्रवृत्ति है, जिनके दिमाग़ ऐसे अनैतिक प्रभाव स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, और जिनके हाथों में इस तरह की, नैतिकता के लिए नुकसानदेह रचना है, अंदाज़ा किया जाए, उनके दिमाग़ में बदचलनी और बदकारी का असर पैदा करेगी; (अगर ऐसा है) तो यह एक अश्लील प्रकाशन होगा। क़ानून का उद्देश्य है कि इस (की बिक्री) को रोका जाए। अगर कोई लेख वास्तव में किसी एक भी लिंग के नौजवान या ज़्यादा उम्र के लोगों के दिमाग़ को अत्यंत गंदे और कामुक क़िस्म के विचार सुझाए तो इसका प्रकाशन ग़ैर-क़ानूनी है, भले ही आरोपी के ध्यान में कोई छिपा हुआ मक़सद ही क्यों न हो, जो मासूम यहाँ तक कि प्रशंसनीय हो। कोई चीज़ जो कामुक भावनाओं को भड़काए, अश्लील है।
यानी यह कि इस मामले में क़ानून ने अगर-मगर की गुंजाइश भी नहीं छोड़ी। ऐसा महसूस होता है कि यह क़ानून नहीं बल्कि बर्बरता के दौर के किसी क़बाइली सरदार का फ़रमान है। हो सकता है कि मंटो को आज भी अपने विशेष सामाजिक माहौल में इसी स्तर के अनुभव से गुज़रना पड़ता, लेकिन यह तय है कि समाज की तरफ़ से इस तरह के क़ानूनों को आज पहले जैसी छूट नहीं मिल सकती। राजनीतिक विचारधारा या व्यक्तिगत सत्ता के अधीन देशों में सेंसरशिप की व्यवस्था की चोट सिर्फ़ ऐसे साहित्यकार नहीं सहते जो वर्तमान के माहौल में साँसें ले रहे होते हैं, इसका शिकार अतीत की वह साहित्यिक धरोहर भी होती है जिसमें मौजूदा स्थिति से टकराव या उसे नकारने के निशानों का पता चलता है। ऐसे देश जो व्यक्तिगत या किसी स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, वहाँ भी साहित्य की सेंसरशिप की बुनियादें हास्यास्पद और तर्कहीन हैं, हालाँकि एक बदले हुए स्तर पर। दिलचस्प बात यह है कि सेंसरशिप ने क़ानून की हैसियत उस दौर में अपनाई जिसे पश्चिम के लोग तर्क और विवेक के दौर (Age of Reason) का नाम देते हैं।
अश्लीलता की बुनियाद पर साहित्य की बाक़ायदा सेंसरशिप की शुरुआत इंग्लैंड और अमेरिका दोनों देशों में 1868 में हुई और अश्लीलता की पहचान यह तय की गई कि वह साहित्यिक रचना जो कच्चे (नाबालिग़) दिमाग़ों पर अनैतिक प्रभाव डाले, अश्लील और आपत्तिजनक है। बीसवीं सदी तक आते-आते इस पैमाने ने इतनी तरक़्क़ी कर ली कि अब नाबालिग़ दिमाग़ों की जगह आम सूझ-बूझ रखने वाले व्यक्तियों को दे दी गई। इसमें भी कोई हर्ज़ नहीं था, अगर किसी साहित्यिक रचना के बारे में आम सूझ-बूझ रखने वाले की प्रतिक्रिया जानने से पहले उन्हें साहित्य की सीमाओं और इसकी रचना की प्रक्रिया से संबंधित कुछ बुनियादी बिंदुओं से अवगत करा दिया जाता। मंटो के अनुसार, जिस तरह साहित्य और ग़ैर-साहित्य के बीच किसी खुले हुए इलाक़े का वजूद नहीं है, उसी तरह साहित्य को समझने वालों और न समझने वालों के दायरे भी निर्धारित हैं।
मंटो का पाला अपनी कहानियों की सेंसरशिप के सिलसिले में जिस तरह के व्यक्तियों से पड़ा, वे सब के सब इसी दूसरे दायरे से संबंध रखते थे। ऐसा न होता तो अपने मुक़दमों के बारे में मंटो के स्पष्टीकरण इस हद तक आसान बल्कि सतही न होते। जिस तरह स्थापित सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं के अधीन देशों में सेंसरशिप के क़ानूनों के बुनियादी तत्व राजनीतिक होते हैं, उसी तरह मंटो को जिन व्यक्तियों और नियमों से निपटना पड़ा उनकी साहित्यिक अवधारणा की बुनियाद या तो नैतिकता की पारंपरिक अवधारणा पर क़ायम थी या फिर धर्म पर। धर्म तो ख़ैर एक संस्था है ही, नैतिक अवधारणाएं भी बाक़ायदा परंपरा बनने के बाद एक संस्था की ही हैसियत अपना लेती हैं, इसलिए इसमें पूर्वाग्रहों का आ जाना स्वाभाविक है। इसकी सबसे हास्यास्पद मिसाल ईसा मसीह से बानवे (92) वर्ष पहले का एक शिलालेख है जिसमें भाषण-कला की प्रचलित अवधारणा के विपरीत एक नई अवधारणा की स्थापना पर सेंसरशिप लगाए जाने का ज़िक्र है। व्यक्ति और आस्थाएं जब संस्थाएं बन जाते हैं तो उनसे किसी सार्थक असहमति के दरवाज़े ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो जाते हैं। मंटो की सारी मुश्किल यही थी।
मंटो को हम सिर्फ़ उन मायनों में अश्लील लेखक कह सकते हैं जिनकी गुंजाइश अकादमिक शब्दावली के विशेषज्ञों ने 'Pornography' शब्द के निर्माण में निकाली है। उनका बयान है कि 'Pornography' का मूल यूनानी भाषा का शब्द 'porne' है जिसका अर्थ तवायफ़ है। इसलिए तवायफ़ों के बारे में कुछ लिखना अश्लीलता है। मंटो ने तवायफ़ों के बारे में लिखा ही नहीं, उन्हें अपनी ज़िंदगी को एक रचनात्मक दिशा प्रदान करने वाले किरदारों की हैसियत से भी देखा है,
हम आशावादी हैं। दुनिया के अंधेरों में भी हम उजाले की लकीर देख लेते हैं। हम किसी को हिकारत (तिरस्कार) की नज़र से नहीं देखते, चक्लों में जब कोई टखियाई अपने कोठे पर से किसी राहगीर पर पान की पीक थूकती है, तो हम दूसरे तमाशाइयों की तरह न तो कभी उस राहगीर पर हँसते हैं और न कभी उस टखियाई को गालियाँ देते हैं। हम यह वाक़या देखकर रुक जाएँगे। हमारी निगाहें उस ग़लीज़ पेशेवर औरत के अधनंगे लिबास को चीरती हुई उसके स्याह गुनाहों भरे जिस्म के अंदर दाख़िल होकर उसके दिल तक पहुँच जाएँगी, उसको टटोलेंगी और टटोलते हुए हम ख़ुद कुछ अरसे के लिए तसव्वुर (कल्पना) में वही घिनौनी और बदबूदार रंडी बन जाएँगे, सिर्फ़ इसलिए कि हम इस वाक़ये की तस्वीर ही नहीं बल्कि इसके असली मुहर्रिक (प्रेरक) की वजह भी पेश कर सकें।
हम वकीलों के मुताल्लिक़ खुलेआम बातें कर सकते हैं। हम नाइयों, धोबियों, कुंजड़ों और भटियारों के मुताल्लिक़ बातचीत कर सकते हैं। हम चोरों, उचक्कों, ठगों और राहज़नों (लुटेरों) के क़िस्से सुना सकते हैं। हम जिन्नों और परियों की दास्तानें बैठ के गढ़ सकते हैं। हम यह कह सकते हैं कि जब आसमान की तरफ़ शैतान बढ़ने लगता है तो फ़रिश्ते तारे तोड़-तोड़ कर उसे मारते हैं। हम यह कह सकते हैं कि बैल अपने सींगों पर सारी दुनिया उठाए हुए है। हम दास्तान-ए-अमीर हमज़ा और क़िस्सा तोता-मैना तस्नीफ़ कर (लिख) सकते हैं। हम लंधौर पहलवान के गुर्ज़ (गदा) की तारीफ़ कर सकते हैं। हम अमर अय्यार की टोपी और ज़ंबील (झोले) की बातें कर सकते हैं। हम उन तोतों और मैनाओं के क़िस्से सुना सकते हैं जो हर ज़बान में बातें करते थे। हम जादूगरों के मंत्रों और उनके तोड़ की बातें कर सकते हैं।
हम अमल-ए-हमज़ाद और कीमियागरी के मुताल्लिक़, जो मन में आए कह सकते हैं। हम दाढ़ियों, पाजामों और सिर के बालों की लंबाई पर झगड़ सकते हैं। हम यह सोच सकते हैं कि सब्ज़ (हरे) रंग के कपड़े पर किस रंग और किस क़िस्म के बटन सजेंगे... हम वेश्या के मुताल्लिक़ क्यों नहीं सोच सकते। उसके पेशे के बारे में क्यों ग़ौर नहीं कर सकते। उन लोगों के मुताल्लिक़ क्यों कुछ नहीं कह सकते जो उसके पास जाते हैं?
और अब मंटो के एक जीवनीकार की किताब से ये चंद सतरें,
सामने लालटेन की रोशनी में, एक औरत नंगे फ़र्श पर बैठी रोटी खा रही थी। हमें देखकर वह उठ खड़ी हुई। उसकी उम्र बमुश्किल अठारह से उन्नीस बरस की होगी, लेकिन वह फ़ाक़ा-ज़दा (भूख की मारी) मालूम होती थी। उसका रंग गहरा साँवला था। उसकी आँखें उस बच्चे की तरह डरी हुई थीं जैसे कोई बुरी बात करते हुए किसी ने सिर से पकड़ लिया हो।
अरे भई, कोई माल-वाल भी है कि नहीं? अब्बास ने ठेठ तमाशबीनों के अंदाज़ में पूछा।
इस वक़्त तो मैं ही हूँ... उस औरत ने लुक़्मा (निवाला) निगलते हुए पूरबी लहज़े में जवाब दिया। उसने लालटेन फ़र्श से उठाई और उसे अपने चेहरे के बराबर ले आई जैसे अपना माल दिखाना चाहती है।
अच्छा तो फिर कभी आएँगे! अब्बास ने कहा। गाहक को सौदा पसंद नहीं आया था और वह कोई दूसरी दुकान देखने का इरादा कर चुका था। लड़की का चेहरा दफ़अतन (अचानक) और स्याह हो गया। मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे हरिकेन लालटेन धुआँ छोड़ती हुई यकायक भक से बुझ गई है और उस औरत के चेहरे पर, जो उसकी रोशनी में अपना सौदा बेचना चाहती थी, कालिख और लेप कर गई है। सीढ़ियाँ उतरते वक़्त मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे बाहर सड़क के, फ़तेहपुरी के, चाँदनी चौक के, सारी दिल्ली के दीये गुल हो गए हैं। हिंदुओं, पठानों, तुग़लक़ों, लोधियों, ख़िलजियों, ग़ुलामों, मुग़लों और अंग्रेज़ों की दिल्ली पर किसी बहुत बड़े हवाई हमले की तैयारियाँ हो रही हैं, जिससे बचने के लिए हम किसी अंधे कुएँ में उतरते जा रहे हैं।
मंटो ख़ामोश था। शायद उसे महसूस हो रहा था कि उसकी सौगंधी में अब जलने की हिम्मत भी नहीं रही। हतक (अपमान) का एहसास भी जाता रहा। सेठ 'ऊँह!' करके निकल गया है। (अबू सईद क़ुरैशी)
इन इक़्तिबासात (उद्धरणों) से यह हक़ीक़त सामने आती है कि तवायफ़ को मौज़ू (विषय) बनाना भी मंटो के लिए दरअसल एक अख़लाक़ी इंतेख़ाब (नैतिक चुनाव) की ही मजबूरी थी। फ़हश-निगारी (अश्लील लेखन) के अमल पर इससे बड़ा तंज़ (व्यंग्य) और क्या हो सकता है? यह सवाल मंटो के मोतरिज़ीन (आलोचकों) के लिए है। लेज़ली फ़ीडलर ने छुप-छुपाते बिकने वाली किताबों का ज़िक्र करते हुए यह ऐलान किया था कि अब फ़हाशी (अश्लीलता) की मौत हो चुकी है और हम अदबी फ़हाशी को एक संजीदा अमल की शक्ल में क़ुबूल करने के आदी होते जा रहे हैं। उर्दू अफ़साने की ज़मीन पर ये बीज मंटो ने बिखेरे थे, फ़सल अब तैयार हुई है।
मगर मंटो! वह फ़हश-निगार (अश्लील लेखक) कब था?
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