ग़ज़ल का फ़न
ग़ज़ल के सिलसिले में पहले अपने दो शेर पढ़ने की इजाज़त चाहता हूँ,
ग़ज़ल में ज़ात भी है और कायनात भी है
हमारी बात भी है और तुम्हारी बात भी है
सुरूर इसके इशारे दास्तानों पर भी भारी हैं
ग़ज़ल में जौहर-ए-अरबाब-ए-फ़न की आज़माइश है
यानी ग़ज़ल में निजी अनुभवों का बयान तो है ही, इसके साथ कायनात (सृष्टि) भी ज़ात (स्वयं) के हवाले से मौजूद है। इसके अलावा ग़ज़ल का आर्ट इशारों का आर्ट है और ये इशारे बड़ी-बड़ी दास्तानों को अपने अंदर समोए हुए हैं।
ग़ज़ल की बेपनाह लोकप्रियता की वजह से कुछ लोग इस हक़ीक़त की अनदेखी करने लगे हैं कि ग़ज़ल सारी शायरी नहीं है और न ग़ज़ल को सारी शायरी की आबरू कहकर दिल ख़ुश कर लेना मुनासिब है। हाँ, यह ज़रूर है कि ग़ज़ल हमारी शायरी की एक अहम और क़द्र के लायक़ विधा (सिन्फ़) है और हर दौर में ज़िंदगी की सच्चाइयों का चित्रण अपने ख़ास अंदाज़ और शैली (उसलूब) में करती रही है। इसी शैली को तग़ज़्ज़ुल कहा गया है।
ग़ज़ल फ़न या आर्ट है भी या नहीं, इस पहलू पर भी बहस हुई है। हाली तो ग़ज़ल की विधा के ख़िलाफ़ हरगिज़ नहीं थे। वे ग़ज़ल में सुधार चाहते थे और यह सुधार ग़ज़ल के विषयों के दायरे में था। ग़ज़ल की बनावट और रूप (हैयत) पर उन्हें कोई एतराज़ नहीं था मगर ग़ज़ल के रूप और बनावट पर वहीदुद्दीन सलीम, अज़मतुल्लाह ख़ाँ, जोश मलीहाबादी और कलीमुद्दीन अहमद के एतराज़ बुनियादी हैं। इन लोगों का एतराज़ ग़ज़ल की रेज़ा-ख़याली (बिखरे हुए विचारों) और रेज़ा-कारी (टुकड़ों की कारीगरी) पर है। उनके नज़दीक हर कलाकृति में विषय की निरंतरता (तसल्सुल) ज़रूरी है और शुरुआत, मध्य और पूर्णता का एहसास भी। ग़ज़ल चूँकि स्वतंत्र शेरों का एक गुलदस्ता है और इसके फ़ॉर्म में भी जुड़ाव और निरंतरता की शर्त नहीं है, इसलिए इन हज़रात के नज़दीक ग़ज़ल बेवक्त की रागनी है या बक़ौल कलीमुद्दीन अहमद 'नीम-वहशियाना' (अर्ध-बर्बर) शायरी है।
अज़मतुल्लाह ख़ाँ ने तो यहाँ तक कह दिया था कि उर्दू शायरी की तरक़्क़ी सिर्फ़ इस सूरत में हो सकती है कि ग़ज़ल की गर्दन बेतकल्लुफ़ मार दी जाए। इसके जवाब में अबुल-लैश सिद्दीक़ी और दूसरे हज़रात ने ग़ज़ल के शेरों में निरंतरता तलाश करने की कोशिश की थी। इस सिलसिले में हामिद हसन क़ादरी का रवैया ज़्यादा ईमानदारी पर आधारित था। उन्होंने कहा था कि ग़ज़ल के शेरों में निरंतरता क़तई ज़रूरी नहीं है। ग़ज़ल में विचारों की एकता (वहदत-ए-ख़याल) का सवाल ही नहीं है, हाँ प्रभाव की एकता (वहदत-ए-तास्सूर) हो भी सकती है और नहीं भी। ग़ज़ल के समर्थकों ने कला के स्वाभाविक नज़रिए से प्रभावित होकर हाइकू से इसकी नज़दीकी खोजी, मगर हाइकू में दो अलग-अलग तस्वीरें आख़िरकार एक तीसरे नक़्श के ज़रिए से एक समग्र प्रभाव पेश करती हैं।
ग़ज़ल के सिलसिले में यह बात मान लेनी चाहिए कि पश्चिमी कला-दृष्टि के मुताबिक़ यह कलाकृति हो या न हो, पूर्वी कला-दृष्टि के मुताबिक़ यह भी कला का एक रूप है और इसमें बहर, क़ाफ़िए और रदीफ़ के ज़रिए से ज़ेहन की एक ख़ास धारा, मनःस्थितियों के एक ख़ास स्वर (आहंग), जज़्बात की एक ख़ास लय, और एक ख़ास माहौल का चित्रण किया जाता है। बहर एक बिसात अता करती है। क़ाफ़िया इस बिसात की सतह पर दोहराव और उम्मीद के उसूल को ध्यान में रखते हुए ज़ेहन को एक रोशनी और रूह को एक ताज़गी अता करता है और रदीफ़ हालत या ज़माने या शर्त के ज़रिए से इसे चुस्ती और निपुणता अता करती है। पहले इस पर ग़ौर कीजिए कि ग़ज़ल में मतला क्यों होता है, यानी शेर की दोनों पंक्तियों (मिसरों) में क़ाफ़िए का इस्तेमाल क्यों ज़रूरी है। मीर की मशहूर ग़ज़ल के मतले को ज़ेहन में रखिए,
उल्टी हो गईं सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
अगर ग़ज़ल मतले से शुरू न हो तो सुनने वाले या पढ़ने वाले के ज़ेहन की तैयारी उन दिशाओं में नहीं हो सकती जो ग़ज़ल की ख़ासियत हैं। इसलिए पुराने उस्तादों ने ग़ज़ल के लिए मतले की शर्त लगाई है, चाहे यह कमज़ोर ही क्यों न हो। दूसरी बात यह है कि हालाँकि बहुत से उस्ताद कवियों ने कई मतलों की ग़ज़ल कही है मगर यह क़तई ज़रूरी नहीं है, क्योंकि पहले मतले के बाद वह ध्वनि-व्यवस्था और वह संगीत जो ग़ज़ल के साथ ख़ास है, सुनने वाले या पढ़ने वाले के ज़ेहन में बस जाती है। इसके बाद दूसरे मिसरे का क़ाफ़िया इस धारा को आगे बढ़ाने के लिए काफ़ी है। वहीदुद्दीन सलीम और दूसरे आलोचकों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि ग़ज़ल का शायर क़ाफ़िए का ग़ुलाम होता है। वह ख़याल के मुताबिक़ क़ाफ़िया नहीं लाता बल्कि क़ाफ़िए के मुताबिक़ ख़याल लाता है। यह बात भी आंशिक सच्चाई रखती है।
बात यह है कि उस्तादों की ग़ज़ल ज़्यादा लंबी नहीं होती, फिर उर्दू में अरबी की तरह क़ाफ़िए काफ़ी तादाद में मिल जाते हैं, इसलिए अच्छा शायर हर क़ाफ़िया शेर में नहीं बाँधता बल्कि अपने ख़याल के मुताबिक़ क़ाफ़िए का चुनाव करता है। असीर लखनवी के बारे में कहा गया है कि वे हर क़ाफ़िया बाँधने की कोशिश करते थे और वजह यह देते थे कि शायद किसी वक़्त हवाले (सनद) की ज़रूरत पड़ जाए। यह शब्दकोश तैयार करने के लिए फ़ायदेमंद हो तो हो, शायरी के लिए क़तई ज़रूरी नहीं है। चुनाँचे क़ाफ़िया ग़ज़ल के फ़न में बहर के बाद केंद्रीय अहमियत रखता है मगर हर क़ाफ़िया बाँधना ग़ज़ल के आदाब के ख़िलाफ़ है।
जहाँ तक रदीफ़ का ताल्लुक़ है, रदीफ़ तीन या चार लफ़्ज़ों से ज़्यादा की नहीं होनी चाहिए। शाह नसीर की ग़ज़लों को इसीलिए ग़ज़ल के उसूलों में कोई अच्छी जगह नहीं दी गई। कुछ आधुनिक कवियों के यहाँ लंबी रदीफ़ें, मसलन मुनीर नियाज़ी के यहाँ तो मैंने देखा या जाँनिसार के यहाँ हम न कहते थे माहौल बनाने के लिहाज़ से स्वीकार्य हैं, मगर रदीफ़ को आधे या पौने मिसरे तक फैलाना नहीं चाहिए।
कहा जाता है कि रोशनी की रफ़्तार एकसमान भी होती है और छलाँग (जस्त) की सूरत में भी। ग़ज़ल इस दूसरी सूरत को अपनाती है। फ़िराक़ ने जब ग़ज़ल को चरम सीमाओं (इंतिहाओं) का सिलसिला कहा था तो इसी मायने में, और इससे यह बात भी निकलती है कि ग़ज़ल के सब शेर एक ही स्तर के या एकसमान बुलंद नहीं होते। अच्छी ग़ज़लों का चुनाव और चीज़ है और ग़ज़ल के चुने हुए शेरों का मामला दूसरा है। मीर जैसे 'ख़ुदा-ए-सुख़न' की ग़ज़लों में भी ऊँचे और साधारण (बुलंद-ओ-पस्त) शेर के नमूने मिलेंगे। इसकी मनोवैज्ञानिक व्याख्या यह की जा सकती है कि बिजली जो कुछ अंतराल से चमकती है, ज़्यादा प्रभावित करती है। भरती के शेर ग़ज़ल के फ़न में जायज़ हैं। उनसे होकर ही हाली के अल्फ़ाज़ में हैरत-नाक जल्वों पर नज़र पड़ती है।
ग़ज़ल बहरहाल ज़ख़्मी हिरन (ग़ज़ाल) की आह या आधे खिंचे हुए तीर (तीर-ए-नीम-कश) या महबूब से बात करने का नाम है, यानी यह इश्क़िया और गीतात्मक (ग़िनाई) शायरी है, लेकिन यह इश्क़ हक़ीक़ी (ईश्वरीय) भी हो सकता है और मजाज़ी (सांसारिक) भी। ख़ुदा से भी, महबूब से भी, किसी आस्था (अक़ीदे) या किसी विचारधारा (मसलक) से भी, यानी मसला नज़ारे का नहीं, नज़र का है। हुस्न का चित्रण अपने आप में अहम नहीं, आशिक़ के जज़्बे की गरमी, दर्द और तड़प (सोज़-ओ-गुदाज़), मनःस्थिति और कोमलता अहम है। ग़ज़ल में 'मामला-बंदी' (प्रेम-प्रसंगों के वर्णन) को अहमियत दी गई है और जुरअत और मोमिन की मामला-बंदी को सराहा भी गया है, मगर हमें मीर की यह बात याद रखनी चाहिए जो उन्होंने जुरअत से कही थी कि मियाँ! तुम शेर कहना क्या जानो। अपनी चूमा-चाटी कह लिया करो। ग़ज़ल में मामलात का खुला-खुला बयान उचित नहीं। यहाँ कामुकता (जिंस) एक शोला नहीं, कामुकता की आँच काफ़ी है और वह भी इशारों और प्रतीकों (रम्ज़-ओ-ईमा) के सहारे। इसलिए ग़ालिब का यह शेर ग़ज़ल का शेर है,
असद बंद-ए-क़बा-ए-यार है फ़िरदौस का ग़ुंचा
अगर वा हो तो दिखला दूँ कि इक आलम गुलिस्ताँ है
और यह शेर हालाँकि मशहूर है मगर ग़ज़ल का अच्छा शेर नहीं, इसीलिए लोग सिर्फ़ दूसरा मिसरा पढ़ते हैं,
आँखें दिखलाते हो, जोबन तो दिखाओ साहब
वह अलग बाँध के रखा है जो माल अच्छा है
ग़ज़ल हालाँकि लगातार शेरों का संग्रह नहीं, बल्कि अलग-अलग शेरों का गुलदस्ता है, मगर पुराने शायरों के यहाँ अक्सर क़ितआ-बंद (एक ही विषय पर लगातार) शेर मिलते हैं। मीर और ग़ालिब के यहाँ ऐसी क़ितआ-बंद ग़ज़लों की तादाद ख़ासी है। उस्ताद शायरों के यहाँ हालाँकि दो-ग़ज़ले बल्कि सह-ग़ज़ले (तीन ग़ज़लें एक साथ) भी मिलते हैं, मगर लंबी ग़ज़लें कम हैं। यह इस बात का सुबूत है कि लंबी ग़ज़ल को अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि उनमें क़ाफ़िया-पैमाई (सिर्फ़ क़ाफ़िया मिलाने की कोशिश) ज़्यादा हो जाती है। नए अर्थ पैदा करने की गुंजाइश कम ही निकल पाती है। एक आदर्श ग़ज़ल में मतले के साथ मक़्ता भी ज़रूरी है और यहाँ शायर को बड़ी आज़ादी होती है। इसमें शायर तअल्ली (अपनी तारीफ़) भी कर सकता है, अपने हालात भी बयान कर सकता है और कोई ख़ास वाक़या भी नज़्म कर सकता है। कुछ मिसालें देखिए:
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
ग़ालिब गर इस सफ़र में मुझे साथ ले चलें
हज का सवाब नज़्र करूँगा हुज़ूर की
कोई छींटा पड़े तो दाग़ कलकत्ते चले जाएँ
अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं
फ़ानी दकन में आ के यह उक़्दा खुला कि हम
हिंदुस्तान में रहते हैं हिंदुस्तान से दूर
रोज़ हो जाती है रोया में ज़ियारत हसरत
आस्तान-ए-शह-ए-रज़्ज़ाक़ है ज़िंदाँ के क़रीब
उर्दू ग़ज़ल पर फ़ारसी का असर बहुत गहरा है मगर यह फ़ारसी की नक़ल नहीं है। यह हिंदुस्तानी तहज़ीब का एक सतरंगी जलवा है। इसलिए इसमें लोकगीतों की परंपरा, हिंदुस्तान के मौसम, त्योहार, रस्म-ओ-रिवाज़, और सामाजिक व सांस्कृतिक ज़िंदगी के कितने ही नक़्श महफ़ूज़ हो गए हैं। ये शेर देखिए:
लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की
भेजना हैं एक कमसिन के लिए
अजब आलम है मौज-ए-बर्क़ के पहलू में बादल का
तिरी उल्टी हुई सी आस्तीं मालूम होती है
नंग-ए-महफ़िल मिरा ज़िंदा, मिरा मुर्दा भारी
कौन उठाता है मुझे, कौन बिठाता है मुझे
न सैद कमाँ में है, न सय्याद मकीं में
गोशे में क़फ़स के मुझे आराम बहुत है
ग़ज़ल में साहिल, तूफ़ान, भँवर, क़फ़स (पिंजरा), आशियाँ, रिंद (शराबी), मोहतसिब (निरीक्षक), सय्याद (शिकारी) जैसे तलाज़मात (प्रतीकों और सह-शब्दों) पर बहुत से एतराज़ किए गए हैं। ख़्वाजा मंज़ूर हुसैन ने अपनी किताब 'उर्दू ग़ज़ल का ख़ारिजी रूप बहरूप' में साफ़ किया है कि हमारी सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी के हर मोड़ और हर करवट की तस्वीर इन तलाज़मात में भी मिल जाती है। फ़ैज़ की ग़ज़ल में ज़्यादातर तलाज़मात, इशारे और रुमूज़ (प्रतीक) पुराने हैं मगर उनके नए अर्थ ज़ेहन फ़ौरन क़ुबूल कर लेता है। इससे यह बात साफ़ होती है कि दरअसल रुमूज़-ओ-ईमा (इशारे और प्रतीक) और अलामतें कभी पुरानी नहीं होतीं, हाँ उनके इस्तेमाल में कारीगरी या बनावट के बजाय जज़्बे या कैफ़ियत का असर होना चाहिए। हाली ने 'मुक़द्दमे' में यह सही मशवरा दिया था कि उस्तादों के कलाम पर नज़र होनी चाहिए और फ़ैज़ ने अपनी आलोचनाओं में जगह-जगह इस तरफ़ इशारा किया है कि उन्होंने सौदा और दूसरे उस्तादों से फ़न के कितने ही राज़ और तरीक़े सीखे।
ग़ज़ल का फ़न रवानी और मिठास चाहता है लेकिन इसके यह मानी नहीं कि शायर ज़ौक़ की तरह सिर्फ़ सोए हुए (पुराने) इस्तेआरों (रूपकों) या मुहावरों पर ही निर्भर रहे। 'नुस्ख़ा-ए-हमीदिया' के ग़ालिब ने इसीलिए ज़ौक़ की पंचायती (आम) शायरी से मुँह मोड़ा, और अपनी सोच की उड़ान के लिए फ़ारसी तरकीबों (शब्द-संयोजनों) का सहारा लिया, ताकि वह अपने आईने को माँजने और अर्थ की सूरत दिखाने के लिए 'दीवान-ए-ग़ालिब' तक पहुँच सकें। इक़बाल को भी यही करना पड़ा लेकिन अहम बात यह है कि ग़ालिब की तरह इक़बाल ने भी ग़ज़ल को अर्थ के ख़ज़ाने का तिलिस्म बनाया। इक़बाल ने हालाँकि यह कहा कि ग़ज़ल की न कोई ज़बान है न वह ज़बान से वाक़िफ़ हैं, मगर उन्होंने ग़ज़ल के सारे आदाब (नियम) बरते। हाँ, उनका यह इज़ाफ़ा (योगदान) क़ाबिल-ए-ज़िक्र है कि उनके यहाँ 'बाल-ए-जिब्रील' से ग़ैर-मुरद्दफ़ (बिना रदीफ़ वाली) ग़ज़लों की तादाद बढ़ती जाती है। यहाँ तक कि 'अरमग़ान-ए-हिजाज़' के उर्दू हिस्से में जो ग़ज़लें हैं, वे सब की सब ग़ैर-मुरद्दफ़ हैं।
ग़ज़ल उर्दू के सभी शायरों ने लिखी, मगर जिन्होंने सिर्फ़ ग़ज़ल लिखी उन्हें यक-फ़ना (एक ही विधा का माहिर) कहा गया। उर्दू ग़ज़ल में अहम नाम वली, मीर, मुसहफ़ी, आतिश, ग़ालिब, मोमिन, दाग़, इक़बाल, हसरत, फ़ानी, यगाना, असग़र, जिगर, फ़िराक़, फ़ैज़, नासिर काज़मी के हैं। इस फ़ेहरिस्त में और नाम भी जोड़े जा सकते हैं।
ग़ज़ल में तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद), फ़लसफ़ा (दर्शन), अख़लाक़ (नैतिकता), सियासत (राजनीति) सभी से काम लिया गया है। जो मशहूर सूफ़ी थे, उनके सूफ़ी कलाम में अक्सर ग़ज़ल की नज़ाकत नहीं होती, लेकिन आतिश और ग़ालिब बाक़ायदा सूफ़ी न थे मगर सूफ़ी कैफ़ियात का बयान उनके यहाँ शायरी इसलिए बन गया क्योंकि वे बड़े शायर थे। नासिख़ अख़लाक़ को नज़्म करते हैं। फ़न के उस्ताद हैं मगर ग़ज़ल के अच्छे शायर नहीं। हाली की जदीद (नई) ग़ज़लें उनकी क़दीम (पुरानी) ग़ज़लों से कमज़ोर हैं। फ़ैज़ की ग़ज़ल में सियासी मज़ामीन (विषयों) की भरमार है मगर उन्होंने ग़ज़ल के आदाब को बरता है इसलिए उनकी अहमियत मुसल्लम (तय) है। इक़बाल की वे ग़ज़लें जो 'बाल-ए-जिब्रील' और 'ज़र्ब-ए-कलीम' में मिलती हैं, अक्सर ग़ज़ल की ज़बान और ग़ज़ल के अंदाज़-ए-बयान के मुताबिक़ हैं मगर कहीं-कहीं फ़लसफ़ा ज़्यादा है और शेरियत कम। इक़बाल को अपना पयाम (संदेश) कुछ ज़्यादा ही अज़ीज़ था।
ग़ज़ल कहना निहायत आसान है और बहुत मुश्किल भी। मेरे नज़दीक मुशायरों की मुक़र्रर तरहों (तयशुदा ज़मीनों) से ग़ज़ल को फ़ायदा भी हुआ और नुक़सान भी। फ़ायदा तो यह हुआ कि क़ैद की हद में आज़ादी की हद बढ़ाने का रिवाज हुआ और नुक़सान यह कि ग़ज़लें सिर्फ़ ज़ाती वारदातों (निजी अनुभवों) तक सीमित न रहीं, बल्कि महफ़िल के आदाब और शैलियों की आईनादार भी हो गईं। इसलिए जदीद ग़ज़ल में तरहिया ग़ज़लों (दी गई ज़मीन पर कही गई ग़ज़लों) की कमी एक अच्छा रुझान है। हाँ, उस्तादों की ज़मीनों में ग़ज़लें बराबर कही जाती रहेंगी।
ग़ज़ल बहरहाल अपनी हैयत (रूप/शिल्प) की वजह से पहचानी जाती है। इसलिए आज़ाद ग़ज़ल जैसे तजुर्बों का कोई औचित्य नहीं। इसकी ज़बान में जो ख़ामोश तब्दीली हुई है, वह इस बात का सुबूत है कि वह हर दौर की हिस्सियत (संवेदना) और मिज़ाज की अक्कासी (चित्रण) कर सकती है मगर यह इशारे का आर्ट (कला) है। ग़ज़ल वह निगार-ख़ाना (चित्रशाला) है जो मिनिएचर पेंटिंग (लघु चित्रकला) से सजा है। आज हिंदुस्तान की दूसरी ज़बानों में ग़ज़ल की मक़बूलियत की वजह से यह समझना चाहिए कि ग़ज़ल में सब कुछ है। आज का दौर किसी मुनज़्ज़म (व्यवस्थित) फ़लसफ़े, किसी मुरत्तब (क्रमबद्ध) सोच के रियाज़ के बजाय फ़ौरी कैफ़ियात (तात्कालिक भावनाओं) के बयान को तरजीह देता है क्योंकि यह 'शऊर की रौ' (चेतना प्रवाह) का ज़्यादा आदी हो गया है। यह अपनी जगह दुरुस्त है मगर सराहत (स्पष्टता), वज़ाहत (व्याख्या), रब्त और तसल्सुल (जुड़ाव और निरंतरता) की अहमियत अपनी जगह है। इसलिए ग़ज़ल अपने तौर पर ज़िंदगी की वारदातों और कैफ़ियात को पेश करती रहेगी। इसकी ज़बान में ख़ामोश तब्दीली होती रहेगी मगर इसकी ईमाई सलाहियत (इशारों में बात कहने की क्षमता) और दरूँ-बीनी (अंतर्दृष्टि) की ख़सूसियत बाक़ी रहेगी। हाँ, इसका तग़ज़्ज़ुल (ग़ज़लपन) नज़्म पर भी असर करता रहेगा।
सोचने की बात है कि जदीद फ़ारसी में ग़ज़ल कोई अहमियत नहीं रखती। वहाँ माज़ी (अतीत) से रिश्ता कट गया, यह रिश्ता बाक़ी रहना चाहिए, मगर फ़न के सिर्फ़ इसी उसलूब (शैली) और इसी रूप को ख़ुलासा-ए-कायनात (ब्रह्मांड का सार) नहीं समझना चाहिए। 'शेवा-ए-बुताँ' (हसीनों के तौर-तरीक़ों) की तरह फ़न के भी बहुत से दरीचे (खिड़कियाँ) हैं। हाँ, ग़ज़ल का दरीचा अब भी हयात-ओ-कायनात (जीवन और ब्रह्मांड) के अनगिनत जलवे दिखा सकता है।
कुछ और बातों की तरफ़ इशारा ज़रूरी है। ग़ज़ल की ज़बान का ग़ज़ल के फ़न से गहरा ताल्लुक़ है। इस ज़बान में रवानी, मिठास, और बेसाख़्तगी (जो काफ़ी रियाज़ का नतीजा हो सकती है) ज़रूरी है। विषय के लिहाज़ से शब्दों का चुनाव होता है, लेकिन यह कहना सही न होगा कि ग़ज़ल में अजमी (फ़ारसी) लय की अहमियत हिंदी गीतों से ज़्यादा है, यानी अच्छी ग़ज़ल वह है जिसमें हिंदी शब्द ज़्यादा हों। फ़ारसी तराकीब (शब्द-संयोजनों) की गुंजाइश भी है, मगर उसी हद तक जिस हद तक मीर ने अपने कलाम में या ग़ालिब ने 'दीवान-ए-ग़ालिब' (न कि नुस्ख़ा-ए-हमीदिया वाले अशआर में) इस्तेमाल की हैं। इस मामले में इक़बाल के नवाचार को मानते हुए भी, उन्हें सनद (प्रमाण) नहीं समझना चाहिए। इसी तरह आरज़ू लखनवी की ग़ज़लें, ग़ज़ल का अच्छा नमूना हैं मगर फ़ारसी इज़ाफ़तों को छोड़ना या हिंदी शब्दों से परहेज़ करना दोनों अतिवाद की मिसालें हैं। यहाँ मीर के इस शेर पर ग़ौर कीजिए:
कुछ न देखा फिर बजुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब
शमा तक तो हमने देखा था कि परवाना गया
पहले मिसरे का तक़रीबन आधा हिस्सा 'बजुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब', दूसरे मिसरे की सादगी और रवानी की वजह से खटकता ही नहीं। मीर सोज़ ने फ़ारसी तराकीब से परहेज़ किया, मीर ने उन्हें सलीक़े से बरता, आरज़ू ने फ़ारसी तराकीब से किनारा किया। यगाना ने मौक़े के हिसाब से उनसे काम लिया। यही बात दोनों की शायरी का दर्जा तय करने में मददगार है।
उस्ताद शायरों के यहाँ दीवान की वर्णमाला के हिसाब से तरतीब शायराना लिहाज़ से कोई बहुत सराहनीय बात नहीं है, इसलिए आज के दौर में इसकी पाबंदी ज़रूरी नहीं समझी जाती। कलाम की तारीखी तरतीब से बहरहाल शायर के फ़न का विकास तो ज़ाहिर होता है। वे ग़ज़लें जिनके आख़िर में कोई स्वर आता है, एक गूँज पैदा करती हैं और ज़ेहन देर तक इन आवाज़ों के मज़े लेता है। ज़रूरी है कि ग़ज़ल गाई जा सके। यह हर हाल में एक गीतिकाव्य है, हालाँकि इस विधा में हर विषय पर ग़ज़ल के आदाब के मुताबिक़ अपने विचार प्रकट किए जा सकते हैं। इसका प्रतीकात्मक ढाँचा, इसकी अस्पष्टता, इसके कई पहलू होना, इसकी खूबियाँ हैं, ख़ामियाँ नहीं। सीमाब ने ग़लत नहीं कहा है:
कहानी मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है
जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है
- रचनाकार :आल-ए-अहमद सुरूर
- प्रकाशन : डायरेक्टर क़ौमी कौंसिल बरा-ए-फ़रोग़-ए-उर्दू ज़बान, नई दिल्ली
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