दास्तान क्या है?
दास्तान-तराज़ी (दास्तान लिखना) साहित्य की कलाओं में से एक है, सच है कि दिल बहलाने के लिए अच्छी कला है।
— ग़ालिब
एक था बादशाह, हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह, ख़ुदा का रसूल बादशाह, चिड़िया लाई मूंग का दाना, चिड़ा लाया चावल का दाना, दोनों ने मिल कर खिचड़ी पकाई। इन या इन जैसे शब्दों से उन कहानियों की शुरुआत होती है जिन्हें हम बचपन में बड़े शौक़ से सुनते हैं और जिनसे हमारी ज़िंदगी ज़्यादा रंगीन और ख़ुशगवार हो जाती है। इन्हीं कहानियों के इंतज़ार में हम दिन की घड़ियाँ जल्दी-जल्दी गुज़ारते हैं और शाम के आने से ख़ुश होते हैं। वह शाम जो नित नई कहानियाँ अपने साथ लाती है, वह शाम जो हमारी प्यास को बुझाती और हमारी उम्मीदों को पूरा करती है, इन कहानियों का साहित्यिक महत्त्व भले ही न के बराबर हो, लेकिन ये हमारी उभरती हुई ज़िंदगी की कुछ अहम ज़रूरतों को पूरा करती हैं और इसके विकास में मददगार होती हैं। बच्चा अपने को नई दुनिया में पाता है, उसे हर चीज़ नई और हैरतअंगेज़ मालूम होती है, जैसे इंसान अपने विकास के शुरुआती चरणों में हर चीज़ को नई, अजीब और रहस्यमयी पाता था। बच्चे के शारीरिक विकास के साथ उसके दिमाग़ की भी तरक़्क़ी और तरबियत (प्रशिक्षण) होती है और इस तरक़्क़ी और तरबियत में कहानियाँ एक अहम हिस्सा लेती हैं।
इंसान की दिमागी तरक़्क़ी का एक बड़ा कारण जिज्ञासा का तत्त्व है जो अलग-अलग रूपों में सक्रिय रहता है, जो हमें नई-नई चीज़ों की खोज और तलाश के लिए तैयार करता है, जो हमें हर चीज़ की असलियत और उसके कारणों से पर्दा उठाने पर मजबूर करता है और जो हमें दिमागी सुस्ती से बचाता है और किसी चीज़ को भी बिना जाँच-पड़ताल के स्वीकार नहीं करने देता है। बचपन में भी इस तत्त्व का विकास बहुत अहम है और यह विकास कहानियों के ज़रिए मुमकिन है। बच्चा नई-नई कहानियों, नई-नई बातों को सुनता है और सुनने के लिए बेचैन रहता है। उसके आस-पास की दुनिया एक तरफ़, तो यह ख़याली दुनिया दूसरी तरफ़ विशाल होती जाती है और इस तरह जिज्ञासा के शौक़ के साथ-साथ उसकी कल्पना के पौधे की भी सिंचाई होती रहती है और यह दिमागी ताक़त भी तरक़्क़ी पाती रहती है।
कल्पना का महत्त्व दिन के उजाले की तरह साफ़ है और कहानियाँ बच्चों की कल्पना के विकास का एक फ़ायदेमंद ज़रिया हैं। कहानियों में ऐसी दुनिया का ज़िक्र होता है जो बच्चे की जानी हुई चौबीस घंटों की दुनिया से बिल्कुल अलग है, ऐसे लोगों के हालात-ए-ज़िंदगी होते हैं जिनसे बच्चा वाक़िफ़ नहीं होता। ऐसी चीज़ों का बयान होता है जो अनदेखी, ग़ैर-मामूली और अक्सर अलौकिक (ग़ैर-कुदरती) होती हैं। कुल मिलाकर, इन कहानियों में ऐसा माहौल, ऐसी बारीक़ियाँ होती हैं जिनसे बच्चा निजी तौर पर वाक़िफ़ नहीं होता और न हो सकता है, इसलिए बच्चा अपनी कल्पना से काम लेने पर मजबूर हो जाता है और इस माहौल, इन बारीक़ियों को वह अपनी कल्पना की मदद से महसूस करता और समझता है। इसी कल्पना की मदद से वह ख़ुद इन कहानियों का हीरो बनता है और जहाँ तक उसकी कच्ची, नई, सीमित कल्पना से मुमकिन होता है, वह इस ख़याली दुनिया में साँस लेने की कोशिश करता है और ख़याली लोगों के ख़याली तजुर्बों से फ़ायदा उठाता है और इस तरह उसकी दिमागी ज़िंदगी ज़्यादा रंगीन और मज़ेदार हो जाती है।
उसके जज़्बात में भी तरक़्क़ी होती है और ख़ासकर हमदर्दी और दया के जज़्बात उभरते हैं और दूसरों की ख़ुशी से ख़ुश होना और दूसरों की तकलीफ़ और मुसीबत पर आँसू बहाना सिखाते हैं। कुल मिलाकर, यह कहानियों की ही देन है कि बच्चा अपनी कुछ ऐसी ताक़तों का विकास करता है जो आदमी को इंसान बनाती हैं और जिनके बिना उसकी ज़िंदगी अधूरी रह जाती।
सभ्य इंसान भी बच्चों और असभ्य (जंगली) लोगों की तरह क़िस्से-कहानियों का शौक़ीन होता है, यानी इंसान सभ्यता की सीढ़ियों पर पहुँच कर भी कहानियों को फ़ुज़ूल और बेकार नहीं समझता, बल्कि उनके रूप को बदलकर अपनी सभ्य ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करता है। बहरहाल, किसी बच्चे और असभ्य इंसान में यह समानता है कि दोनों कहानियों को पसंद करते हैं और उन्हें तर्क और परख के तराज़ू पर नहीं तौलते। किसी बच्चे या असभ्य इंसान का दिमाग़ तुलनात्मक रूप से कम विकसित होता है, ख़ासकर कल्पना के मुक़ाबले में तर्क कमज़ोर होता है, वह नई चीज़ों में दिलचस्पी तो लेता है, वह अनोखी बातों को शौक़ से तो सुनता है, लेकिन उन्हें बिना परखे मान भी लेता है। कहानियों की सच्चाई को वह आसानी से स्वीकार कर लेता है और उन्हें असलियत की रोशनी में नहीं देखता और न देख सकता है। आस-पास की घटनाएँ, जिस दुनिया में वह रहता है, वह उसे हैरतअंगेज़ चमत्कारों से भरी हुई नज़र आती है, इसलिए ये अनदेखी चीज़ें, ये अजीबोग़रीब क़िस्से उसे समझ से परे नहीं मालूम होते।
बहरहाल, जैसे वह कहानियों को असलियत और हक़ीक़त की रोशनी में नहीं देखता, उसी तरह वह उन्हें सौंदर्यशास्त्र और कला की कसौटी पर नहीं जाँचता, यानी जिस तरह बिना परखे वह इन कहानियों के विषयों को स्वीकार कर लेता है, उसी तरह वह उनके रूप में तालमेल की ख़ूबसूरती, क्रम और विकास की तार्किक दुरुस्ती से कोई वास्ता नहीं रखता। इसीलिए इन कहानियों में हक़ीक़त और कलात्मक ख़ूबसूरती आमतौर पर मौजूद नहीं होती। जब बच्चे का दिमाग़ तरक़्क़ी के चरण तय करता है, जब असभ्य इंसान सभ्यता की मंज़िलों से गुज़रता है, तो वह इन कहानियों में एक कमी महसूस करता है। उनसे उसकी नई ज़िंदगी की ज़रूरतें अब पूरी नहीं होतीं, वह उन्हें अब पहले वाले शौक़ से नहीं सुनता और उसकी मानसिक और दिमागी तरक़्क़ी उन्हें पीछे छोड़ने पर मजबूर करती है और वह दूसरी साहित्यिक विधाएँ ईजाद करता और अपनाता है जिनसे उसकी नई प्यास बुझती है।
मैंने अभी कहा है कि बच्चे और असभ्य इंसान, दोनों में कल्पना का विकास तर्क और समझ के विकास से ज़्यादा तेज़ होता है। उनकी कल्पना की उड़ान ऊँची और तेज़ तो होती है, लेकिन तर्क और समझ के अधीन नहीं होती, इसलिए इस उड़ान के नतीजे सभ्य दिमाग़ को ज़्यादा अहम नहीं मालूम होते। जब वह इन नतीजों पर नज़र डालता है तो उसे बिल्कुल तसल्ली नहीं होती और वह उन्हें समझ से परे, बेकार और हास्यास्पद समझता है। उसे उनमें एक ऐसी दुनिया नज़र आती है जो उस दुनिया से, जिसमें वह साँस लेता है, कोई मेल नहीं खाती। वह इस दुनिया में जानवरों को चलता-फिरता, बोलता-चालता, खाता-पीता देखता है। वे भी इंसान की तरह मुहब्बत, नफ़रत, ग़ुस्सा, दुख, हँसी, ख़ुशी, ग़रज़ अलग-अलग तरह के जज़्बात महसूस करते हैं। इसी तरह उसे इस दुनिया में नाक़ाबिल-ए-यक़ीन (अविश्वसनीय) घटनाएँ नज़र आती हैं। कभी वक़्त की रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाती है तो कभी एकदम रुक जाती है। बच्चा एक पल में जवान हो जाता है तो कभी जवान हमेशा जवान नज़र आता है। बरसों का रास्ता एक लम्हे में तय हो जाता है। अप्रत्याशित तरीक़े से बिछड़े हुए मिल जाते हैं और इसी अप्रत्याशित तरीक़े से फिर मिलकर बिछड़ जाते हैं।
अलौकिक (ग़ैर-कुदरती) हस्तियाँ इंसानी दुनिया में नज़र आती हैं, वे इंसानों के साथ चलती-फिरती हैं और उनके मामलों में मददगार या बाधक होती हैं। कहीं एक भयानक ख़ूँख़्वार देव रास्ते की रुकावट बनता है तो कहीं कोई हसीन परी आकर मदद करती है। इंसानी दुनिया और इस अलौकिक दुनिया की सीमाएँ मिली हुई हैं या उनके बीच एक चौड़ा रास्ता है जिस पर दोनों दुनिया के निवासी आसानी के साथ आ-जा सकते हैं। अलौकिक चीज़ों की कमी नहीं, अलौकिक घटनाएँ तो रोज़मर्रा का नियम हैं। सभ्य दिमाग़ इन अलौकिक चमत्कारों को देखकर हँसता है और उनका वजूद उसकी नज़र में इन कहानियों के कम क़ीमती होने का सुबूत है, लेकिन ग़ौर करने से इन चीज़ों के वजूद की वजह समझ में आ जाती है।
बात यह है कि इंसान की चेतना अपनी तरक़्क़ी की शुरुआती मंज़िलों में तहज़ीब और तरबियत से अनजान थी। वह जिस दुनिया में रहता था, वह उसे अजनबी और अपनी दुश्मन नज़र आती थी और वह हर चीज़ को अपने एहसासों और तजुर्बों की रोशनी में देखता था। मिसाल के तौर पर वह शिकार करता था और उसे मालूम था कि मौत उसके हाथ का करिश्मा है, इसी तरह उसे अपने किसी दोस्त या अपनी महबूबा की मौत के पीछे किसी शिकारी का हाथ नज़र आता और वह उस शिकारी देवता को पूजता और उसे दुआ और भेंट की मदद से वश में करना चाहता। वह जानवरों को इंसान की तरह चलता-फिरता देखता, इसलिए वह समझता कि जानवर भी उसी जैसी कोई हस्ती हैं और उनमें भी इंसानी ख़ूबियाँ मौजूद हैं। बच्चा इसी तरह सोचता है। वह भी समझता है कि जानवरों में भी बोलचाल, चेतना और जज़्बात होते हैं, इसलिए जब उसे चिड़ा-चिड़ी बोलते-बतियाते, खिचड़ी पकाते नज़र आते तो उसे कोई ताज्जुब न होता। इस दुनिया में उसे कितनी ही ऐसी चीज़ें नज़र आती हैं जो उसकी समझ से बाहर होती हैं, इसलिए उसे किसी अलौकिक (फ़ौक़-उल-फ़ितरत) घटना से बिल्कुल हैरत नहीं होती और वह उसे ऐसा नहीं मानता जिस पर यक़ीन न किया जा सके।
क़िस्से-कहानियाँ अपनी कलात्मक और साहित्यिक कमियों और सीमाओं के बावजूद ऐसी चीज़ें नहीं हैं कि उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। शुरुआती पुराने क़िस्से जो आमतौर पर किसी क़ौम में प्रचलित नज़र आते हैं, उनमें कई तरह की दिलचस्पियाँ होती हैं। उन्हें उस क़ौम की चेतना और कल्पना से सींचा जाता है। उनमें उस क़ौम की कल्पना की शुरुआती और उभरती हुई उड़ान का अक्स नज़र आता है। उनमें उस क़ौम की चेतना की पहली, मासूम तुतलाहट सुनाई देती है। इसी आईने में बहुत सी वे चीज़ें नज़र आती हैं जिनमें वह क़ौम शुरू में दिलचस्पी लेती थी और जो उसकी दिमागी और जज़्बाती ताक़तों के लिए ज़बरदस्त प्रेरणा का काम करती थीं। इसी आईने में वे सब बातें नज़र आती हैं, जिन पर उसे पूरा यक़ीन था और जिन्हें वह असलियत और हक़ीक़त का जामा पहनाती थी। इसी आईने में वे सब विचार भी मिलते हैं जो महज़ विचार नहीं थे, बल्कि उसकी नज़र में होने वाली घटनाओं से ज़्यादा मज़बूत और टिकाऊ थे, और इसी आईने में वे अलौकिक हस्तियाँ, घटनाएँ, चीज़ें, वे वहम और गुमान की तस्वीरें, वे मज़हबी अक़ीदे भी अपनी झलक दिखाते हैं जिन्हें वह सही समझती थी। ग़रज़ कि इन कहानियों से किसी क़ौम की शुरुआती सामूहिक और उसके लोगों की व्यक्तिगत कोशिशों की पहचान मुमकिन होती है। बहरहाल, ये चीज़ें ऐसी हैं जिनका साहित्य (अदब) से कोई ख़ास ताल्लुक़ नहीं है।
यह मानी हुई बात है कि कहानियों में साहित्यिक सौंदर्य और क़द्र-ओ-क़ीमत की साफ़ कमी होती है। सच तो यह है कि उन्हें साहित्यिक पैमाने से जाँचना ग़लती है। यह सही है कि उनमें ऐसे किरदार होते हैं जिन पर यक़ीन नहीं किया जा सकता, ऐसी घटनाओं का ज़िक्र होता है जिन्हें आम समझ कभी स्वीकार नहीं कर सकती और इन घटनाओं की तरतीब, बनावट और विकास में कलात्मक और तार्किक कमियाँ बेशुमार होती हैं। यह भी सही है कि साहित्य की दुनिया में उन्हें कभी वह मर्तबा हासिल नहीं हो सकता जो दूसरी साहित्यिक विधाओं (सिन्फ़ों) को हासिल है, लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि कोई बच्चा इन साहित्यिक कमियों को महसूस नहीं करता और वह इन कहानियों में साहित्यिक ख़ूबियों को नहीं ढूँढता। वह साहित्यिक और कलात्मक उसूलों और ख़ूबियों से वाक़िफ़ नहीं होता। वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि जो घटनाएँ हों वे अनोखी और दिलचस्प हों, कहानी में लगातार दिलचस्प घटनाएँ हों और इस सिलसिले की हर कड़ी में दिलकशी हो। अगर घटनाएँ दिलचस्प नहीं हैं, तो फिर कहानी में उसका दिल नहीं लगता और उसमें उसे कोई मज़ा नहीं मिलता।
जहाँ दिलचस्पी के सिलसिले में कमी हुई, जहाँ कोई कड़ी बेमज़ा हुई, तो उसका मन उचट जाता है। वह आगे-पीछे नहीं देखता, उसे कहानी की बाहरी सुंदरता से कोई मतलब नहीं होता, वह सिर्फ़ तुरंत और सामने मौजूद चीज़ों में ही मग्न हो सकता है, इसलिए वह चाहता है कि हर घटना दिलचस्प हो, सब कुछ हो लेकिन घटनाओं की दिलचस्पी में कमी न हो। उसकी ज़बान पर बराबर यही बात रहती है, फिर क्या हुआ... फिर क्या हुआ... यही एक पैमाना है जिससे वह वाक़िफ़ है। यही वह कसौटी है जिस पर वह हर कहानी की जाँच करता है। जो कहानी इस पैमाने पर खरी उतरती है उसे वह अच्छी और क़ाबिल-ए-क़द्र समझता है, और जो कहानी इस पैमाने पर खरी नहीं उतरती, उसे वह कम अहमियत देता है। और सच तो यह है कि यही एक पैमाना है जिससे कहानियों की अच्छाई-बुराई की जाँच ज़रूरी है और यह पैमाना महज़ बचकाना नहीं है। हर कलात्मक कारनामे में दिलचस्पी का होना ज़रूरी है। दिलचस्पी की कमी को साहित्य में सबसे बड़ा ऐब माना जाता है। हाँ, यह ज़रूर है कि साहित्य की आला विधाओं में हम उस तरह की दिलचस्पी नहीं ढूँढते जैसी एक बच्चा कहानियों में तलाश करता है।
दास्तान कहानी का लंबा, पेचीदा और भारी-भरकम रूप है। बच्चे का कच्चा दिमाग़ लंबाई और पेचीदगी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसे मुख़्तसर, साफ़ और सीधा क़िस्सा ही पसंद होता है। अगर यह लंबा हुआ तो फिर उसके अंत तक पहुँचते-पहुँचते वह उसकी शुरुआत को भूल जाता है। उसके ज़ेहन में यह सलाहियत नहीं होती कि पेचीदा गुत्थियों को सुलझाए। उसे तो हल्की-फुल्की, छोटी-मोटी बातें ही पसंद होती हैं। दास्तान उसे बोझिल मालूम होती है, लेकिन दास्तान अपनी लंबाई, पेचीदगी और बोझिलपन के बावजूद भी कहानी से बुनियादी तौर पर अलग नहीं है। यह भी दिल बहलाने का एक तरीक़ा है। इसमें भी हक़ीक़त और असलियत से कोई वास्ता नहीं होता। इसमें भी आला साहित्यिक और कलात्मक उसूलों का इस्तेमाल नहीं होता। इसका भी मर्तबा साहित्य की दुनिया में बहुत ऊँचा नहीं है। यहाँ भी जानवर बोलते-बतियाते, चलते-फिरते नज़र आते हैं। यहाँ भी ऐसे वाक़यात और नज़ारे मिलते हैं जिन पर यक़ीन नहीं किया जा सकता, और यहाँ भी अलौकिक हस्तियों के करिश्मों से पाला पड़ता है। ग़रज़ कि दास्तानों का माहौल कहानियों के माहौल से अलग नहीं होता और यह माहौल अजनबी और हैरतअंगेज़ होता है। इसमें और इंसानी दुनिया के माहौल में साफ़ फ़र्क़ नज़र आता है।
इंसान बचपन की मंज़िल से गुज़रता है लेकिन बचपन पूरी तरह गुज़र नहीं जाता। वह समझदारी की उम्र में क़दम रखने के बाद बचपन के एहसासों और बचपन की ख़्वाहिशों से पूरी तरह नाता नहीं तोड़ लेता। बचपन अपनी रंगीन और ताज़ा उम्मीदों, तमन्नाओं और उमंगों के साथ उसकी फ़ितरत में छिपा रहता है और मौक़ा मिलते ही पर्दे से बाहर निकल आता है, और कुछ वक़्त के लिए वह फिर उस गुज़री हुई दुनिया में जा बसता है जिससे ज़ाहिरी तौर पर अब उसे किसी क़िस्म का लगाव नहीं होता। बच्चा कहानी का शौक़ीन होता है और बड़ा होकर भी वह इस क़िस्म की चीज़ की तलाश में रहता है और दास्तानों में दिलचस्पी लेता है। वह दिन भर के काम से फ़ारिग़ होकर दिल बहलाने का ज़रिया ढूँढता है और यह ज़रिया दास्तान है। यह कोई ताज्जुब की बात नहीं कि दास्तानगोई (दास्तान सुनाना) इंसान का पुराना शौक़ रहा है और किसी न किसी रूप में तक़रीबन हर मुल्क और क़ौम में पाया जाता है। उर्दू में भी इस शौक़ का होना लाज़िमी था और दूसरी साहित्यिक विधाओं की तरह इसे भी ईरान से लिया गया।
इस शौक़ के लिए, ख़ास तौर पर किसी अहम शक्ल में, फ़ुर्सत शर्त है, इसलिए इसका उरूज लाज़िमी तौर पर उस वक़्त हुआ जब बादशाहों और अमीरों में ऐश-परस्ती आ गई थी, जब उनकी कामकाजी ज़िंदगी ढीली पड़ गई थी, जब उनकी ताक़त सुस्त हो गई थी, जब वे आलस और ऐश-ओ-आराम के आदी हो गए थे। इसलिए यह रोज़मर्रा की आदत बन गई थी कि सोने से पहले वे कोई दिलचस्प दास्तान सुनते और सुनते-सुनते सो जाते, यानी दास्तान मानो एक क़िस्म की नींद लाने वाली दवा थी जो उन्हें आसानी से नींद की दुनिया में पहुँचा देती थी, या यह कोई लोरी थी जो अपने धीमे, नर्म और मीठे तरन्नुम से उन्हें संगीत की हल्की-हल्की लहरों पर बहा ले जाती। ज़ाहिर है कि तेज़, गहरी और पेचीदा बातें जो दिमाग़ को चौंका दें, जो हमें सोच-विचार करने पर मजबूर करें, ऐसी बातें दास्तानों में मुमकिन न थीं। दास्तान कोई काम करने की प्रेरणा नहीं, बल्कि एक दिलचस्प शौक़ है। हर ज़माने में इंसान को इस क़िस्म के शौक़ और दिल बहलाने के साज़-ओ-सामान की ज़रूरत रही है और उसने अपनी बदलने वाली ज़रूरतों का ख़याल रखते हुए अलग-अलग ज़मानों और क़ौमों में अलग-अलग सामान ईजाद किए हैं। कबड्डी से लेकर साँड़ों की लड़ाई (bull baiting) तक सब खेल इसी क़िस्म की ज़रूरतों को पूरा करते हैं।
मौजूदा ज़माने में जासूसी के क़िस्सों से इसी क़िस्म का काम लिया जाता है जो कभी दास्तानों के लिए मख़सूस था। पश्चिम में इस क़िस्म के क़िस्सों का सैलाब है। छोटे-बड़े, ज़्यादा पढ़े-लिखे और कम पढ़े-लिखे, अदना-आला सभी इनके दीवाने हैं, एक तरफ़ मामूली क्लर्क तो दूसरी तरफ़ वज़ीर और अमीर, सभी इन क़िस्सों को शौक़ से पढ़ते हैं। आजकल सिनेमा-बाज़ी का शौक़ बटेर-बाज़ी का दूसरा रूप है। जब हम रोज़ाना काम से थक जाते हैं तो सिनेमा चले जाते हैं और वहाँ की दिलचस्पियों में अपनी जिस्मानी थकन, परेशानियों, उलझनों और मुश्किलों को कुछ देर के लिए भूल जाते हैं और मानो किसी दूसरी नींद लाने वाली दुनिया में पहुँच जाते हैं। किसी ज़माने में दास्तान-गोई भी इसी क़िस्म का शौक़ या फ़न था। इसकी कमियों और हदों की जानकारी थी और आज भी है। फिर भी बक़ौल ग़ालिब,
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है
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