बद-गुमानी
बदगुमानी इंसान की एक ऐसी बुरी आदत है जिससे अक्सर खुद बदगुमानी करने वाले को और उस शख्स को जिस पर वह बदगुमानी करता है, थोड़ा या बहुत नुकसान ज़रूर पहुँचता है। इसी वास्ते खुदा के कलाम में इरशाद होता है कि या अय्युहल्लज़ीना आमनू इज्तनिबू कसीरम मिनज़-ज़न इन बाज़ज़-ज़न इस्न यानी ऐ ईमान वालो! बहुत बदगुमानियों से बचो, बेशक कुछ गुमान गुनाह हैं।
बदगुमानी करने की आदत अक्सर निकम्मी तालीम और खराब सोसाइटी से इंसान के दिल में पैदा होती है। मिसाल के तौर पर, एक सच्चा मुसलमान महज़ इंसाफ़ के नाते ईसाई पादरियों के अख़लाक़ (चरित्र) की तारीफ़ तुम्हारे सामने करता है। अब अगर तुम सदा से ऐसी सोहबतों (संगति) में रहे हो जहाँ गैर-मज़हब के आदमियों का नाम हमेशा हिकारत (नफ़रत) से लिया जाता है, तो तुमको यकीनन यह गुमान होगा कि यह शख्स ईसाई मज़हब की तरफ़ रुझान रखता है या छुपे तौर पर ईसाई है। या मिसाल के तौर पर, एक शिया शख्स अपने हम-मज़हबों से कहता है कि इमामों ने तबर्रा (बुरा-भला कहने) से मना किया है। अब अगर वे लोग हमेशा से खुद भी तबर्रा करते रहे हैं और अपने धर्मगुरुओं से भी सुनते रहे हैं, तो ज़रूर उसको शियों का विरोधी और सुन्नियों का तरफ़दार खयाल करेंगे।
अक्सर ऐसा होता ہے कि आदमी दूसरे शख्स को अपने जैसा समझकर उससे बदगुमान हो जाता है। मिसाल के तौर पर, एक शख्स अपने मुल्क या क़ौम की भलाई में निस्वार्थ कोशिश करता है, मगर उस मुल्क या उस क़ौम के वे आदमी जो खुदगर्ज़ी में डूबे हुए हैं, उसकी कोशिश को भी खुदगर्ज़ी ही समझते हैं। या मिसाल के तौर पर, एक शख्स यूरोप वालों को, जो कि उस समय के शासक हैं, सच्चा, ईमानदार और लेन-देन में खरा समझकर उनसे ज़्यादा मेल-जोल रखता है, मगर वे लोग उनसे इस हैसियत से नहीं मिलते, तो वे उसको भी अपनी तरह एक चापलूस, मतलबी और मौकापरस्त समझते हैं। कई बार अनजान होने और अज्ञानता से भी सख्त बदगुमानी पैदा होती है। मिसाल के तौर पर, एक शख्स अंग्रेज़ी तरीके पर खाने-पीने को इसलिए पसंद करता है कि उसके तजुर्बे में वह तरीका सेहत के वास्ते निहायत फायदेमंद साबित हुआ है, मगर जिन लोगों को इस तरीके का तजुर्बा नहीं हुआ, वे उस शख्स के बारे में तरह-तरह की बदगुमानियाँ करते हैं। या मिसाल के तौर पर, एक समझदार गवर्नमेंट जो अलग-अलग क़ौम और मज़हब की जनता पर हुक्मरान है, अपने स्कूलों में किसी खास मज़हब की तालीम को जारी नहीं रखती, मगर जो लोग इस गवर्नमेंट के बुद्धिमानी भरे उसूल से अनजान हैं, वे यह खयाल करते हैं कि गवर्नमेंट हमारे मज़हब को नेस्त-ओ-नाबूद (नष्ट) करना चाहती है।
कभी बदगुमानी का कारण यह होता है कि जिन लोगों के चरित्र और आदतें क़ौम के आम चरित्र और आदतों के विपरीत होते हैं, उनके बारे में बुरा गुमान पैदा होता है। मिसाल के तौर पर, एक क़ौम में हद से ज़्यादा बनावट, दिखावे, कृत्रिमता और ज़ाहिरदारी का रिवाज़ है। अब अगर कोई शख्स इस क़ौम में रूखा-फीका, बे-तकल्लुफ़, सादा-मिज़ाज और खरा पाया जाएगा, वह ज़रूर एक घमंडी, अहंकारी, बदमिज़ाज और अक्खड़ माना जाएगा। या मिसाल के तौर पर, एक खानदान के आदमी अक्सर खर्चीले, फ़िज़ूलखर्च, खेल-कूद में ज़िंदगी बसर करने वाले और दिखावे पर मरने वाले हैं। अब अगर उनमें कोई शख्स इस तरीके के खिलाफ़ पाया जाएगा, तो भले ही वह कैसा ही उदार, जवाँ-मर्द, लिहाज़ वाला और परिवार पालने वाला मगर बचत करने वाला और प्रबंधक हो, खानदान के तमाम आदमी उसको कंजूस, नीच स्वभाव वाला, कंटक और मक्खीचूस खयाल करेंगे।
कुछ लोग इस धोखे में कि हमारा ज़ेहन दूर-दूर पहुँचता है और हम लोगों के दिल की बात समझ लेते हैं, अक्सर बदगुमानियाँ किया करते हैं। मिसाल के तौर पर, एक शख्स गवर्नमेंट के किसी कानून या किसी पॉलिसी को जनता के हक़ में नुकसानदेह समझकर उस पर आज़ादाना एतराज़ या नुक्ताचीनी (आलोचना) करता है, मगर वे दिल की बात समझने वाले लोग यह कहते हैं कि चूँकि यह शख्स गवर्नमेंट को आज़ादी-पसंद जानता है, लिहाज़ा इस परदे में गवर्नमेंट पर अपनी योग्यता और बुद्धिमानी ज़ाहिर करनी चाहता है।
या मिसाल के तौर पर, एक शख्स मज़हब और विज्ञान में इसलिए तालमेल करता है कि जब क़ौम में विज्ञान फैल जाए, तो क़ौम के शिक्षित नौजवान मज़हब को अक्ल के खिलाफ़ समझकर उससे दूर न हटें, मगर वे लोग यह समझते हैं कि यह शख्स गवर्नमेंट के इशारे से या गवर्नमेंट को खुश करने के लिए लोगों को धर्महीन और नास्तिक बनाना चाहता है ताकि सल्तनत को मज़हबी विरोध और कट्टरपन का खटका न रहे। अक्सर बदगुमानी का कारण यह भी होता है कि किसी एक बुराई या एक गलती की वजह से, जो कि इंसानी फितरत का हिस्सा है, इंसान की तमाम खूबियों पर मिट्टी डाल दी जाती है और उसकी किसी बात पर अच्छा गुमान नहीं किया जाता। मिसाल के तौर पर, एक सच्चा, सत्यवादी और ईमानदार आदमी किसी मामले में गलती से कोई ऐसी बात कर बैठा जो सच्चाई के खिलाफ़ मालूम होती है, तो उसके बाद अब वह किसी मामले में सच्चा नहीं समझा जाता। या मिसाल के तौर पर, एक लायक़ और समझदार आदमी से कोई ऐसी चूक हो गई जो अक्ल के खिलाफ़ मालूम होती है, तो फिर उसकी राय पर भरोसा नहीं किया जाता।
कुछ लोग बात का संदर्भ और मौक़ा न समझने से भी बदगुमान हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर, एक शख्स सच्ची मुहब्बत और निष्कपट इश्क़ के जोश में हुज़ूर रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कभी सिर्फ़ मुहम्मद (स.), कभी सिर्फ़ अबुल कासिम, कभी आमिना का इकलौता बेटा और कभी बनी साद की बकरियाँ चराने वाला अपनी स्वाभाविक तहरीरों (लेखों) में लिख जाता है और सम्मान के पारंपरिक और प्रचलित अल्फ़ाज़ नहीं लिखता। वे लोग जो बयान की खूबसूरती और लेखन के आनंद की बारीकियों से वाक़िफ़ नहीं हैं और सम्मान को उन्हीं पारंपरिक और प्रचलित अल्फ़ाज़ तक सीमित मानते हैं, ज़रूर खयाल करेंगे कि इस शख्स के दिल में आँ हज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कुछ महानता नहीं है। या मिसाल के तौर पर, इस्लाम का एक हंसमुख रिफॉर्मर (सुधारक) दूसरे रिफॉर्मर को अपनी प्राइवेट तहरीर (निजी पत्र) में लिखता है कि मैंने यहाँ बहुतेरे जाल डाले मगर कोई पंछी जाल में न आया। तो भोले-भाले मुसलमान या कट्टर तपस्वी अगर वह खत देख पाएँगे तो उनको इस बात का पुख्ता यक़ीन हो जाएगा कि इन लोगों ने इस्लाम के खिलाफ़ साज़िश कर रखी है और ये मुसलमानों को धर्मभ्रष्ट करना चाहते हैं, मगर एक समझदार आदमी सिर्फ़ यह कहकर खामोश हो जाएगा कि ऐसा हँसी-मज़ाक रिफॉर्मर की शान से परे है।
मूर्खतापूर्ण अत्यधिक सावधानी भी अक्सर बदगुमानी का कारण होती है। मिसाल के तौर पर, एक समझदार गवर्नमेंट मुल्की मामलों की सफ़ाई के लिए पड़ोसी मुल्क में अपना मिशन भेजना चाहती है, मगर उस मुल्क के सत्ताधारी यह समझकर कि कहीं ऐसा न हो कि इस मिशन के आने से हमारी हुकूमत या सत्ता में कुछ फ़र्क आ जाए, मिशन को अपने मुल्क में नहीं आने देते। या मिसाल के तौर पर, एक हाई स्कूल या कॉलेज से अक्सर विद्यार्थी लायक़, नेक-चलन और विद्वान होकर निकलते हैं। मगर एक वहमी मिज़ाज रईस इस खयाल से कि कहीं ऐसा न हो कि अमीरी औलाद वहाँ जाकर अलग तबके के लड़कों की सोहबत में आवारा हो जाए, अपनी औलाद को वहाँ नहीं भेजता।
ये तमाम कारण बदगुमानी के जो लिखे गए, सरसरी नज़र में सब एक-दूसरे से अलग मालूम होते हैं, मगर गौर करने के बाद ज़ाहिर होता है कि ये सब एक आम कारण से पैदा होते हैं जिसको बदगुमानी का असल उसूल समझना चाहिए। जिस अभागी क़ौम का नैतिक ढाँचा बिगड़ जाता है और उसके तमाम वर्गों में झूठ और बेईमानी फैल जाती है, तो उस क़ौम के खास-ओ-आम को मजबूरन न सिर्फ़ अपनी क़ौम से बल्कि सारी दुनिया से बदगुमान होना पड़ता है।
जब लोग लगातार दोस्तों से बेवफ़ाई और भाई-बंधुओं से दगा और बेरुखी देखते हैं और ख़ुद भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करते हैं, तो उनको पूरी दुनिया में कोई सच्चा दोस्त नज़र नहीं आता। जब वे उलेमा (धर्मगुरुओं) की बेईमानी, पीर-फ़कीरों का छल-कपट, तपस्वियों का पाखंड और इबादत करने वालों की धोखाधड़ी (दिखाना कुछ और बेचना कुछ) देखते हैं, तो उनको सारी दुनिया छल-कपट से भरी हुई मालूम होती है और फ़रिश्ते पर भी उनको अच्छा गुमान (भरोसा) नहीं होता। वे न सिर्फ़ गैरों से बल्कि ख़ुद अपने आप से भी बदगुमान (शंकित) हो जाते हैं। जिस तरह वे सबको झूठा, मक्कार और ख़ुदगर्ज़ समझते हैं, उसी तरह वे यह भी जानते हैं कि लोग हमको झूठा, मक्कार और ख़ुदगर्ज़ समझते हैं। और इसीलिए वे कोई वादा बिना बहुत ज़ोर दिए ज़बान से नहीं निकालते, कोई क़िस्सा बिना सौगंध और क़सम के बयान नहीं करते और कोई बात बिना प्रमाण और गवाही के नहीं कहते, चाहे सुनने वाले की तरफ़ से इसकी माँग हो या न हो। मानो वे यह जताते हैं कि हमारी कोई बात एतबार के क़ाबिल नहीं है। उनको जगह-जगह ख़ुशामद और चापलूसी करनी पड़ती है, क्योंकि वे जानते हैं कि हमारी हमदर्दी और दोस्ती पर बिना ऐसी बातों के यक़ीन नहीं आ सकता।
तुमने अक्सर दिखावा और शेखी बघारने वालों को देखा होगा कि एक-आध झूठा-सच्चा गवाह उनके साथ हर वक़्त लगा रहता है। जब वे कोई वाक़या बयान करते हैं तो बात-बात पर उस गवाह का हवाला देते जाते हैं कि ये भी वहाँ मौजूद थे, इनसे पूछिए। मानो वे अपने को ऐसा झूठा समझते हैं कि उनकी कोई बात बिना गवाही के मानने लायक़ नहीं। तुमने कुछ लेखकों को देखा होगा कि वे हद से ज़्यादा ज़ाहिर और सर्वमान्य दावे पर भी जब किसी का कथन प्रमाण के तौर पर नक़ल करते हैं, तो उस लेखक का नाम, किताब का नाम, अध्याय और खंड का पता, पेज और लाइन की गिनती, छपने का साल, छपने की जगह, प्रेस का नाम और इसके सिवा और भी पते विस्तार से लिखते हैं। हालाँकि उन दावों को मानने में, जिनके समर्थन में वे ये विस्तृत प्रमाण लिखते हैं, किसी को भी कोई एतराज़ नहीं होता। मगर उनको अपनी बेएतबारी का ऐसा पक्का यक़ीन होता है कि अगर उनकी किताब ज़रूरी आकार से दस गुना ज़्यादा हो जाए, तो भी वे इस तफ़सील (विस्तार) से बाज़ नहीं आ सकते।
यह और ऐसी ही बेशुमार मिसालें इस बात की हैं कि जब किसी क़ौम के आम अख़लाक़ (नैतिकता) बिगड़ जाते हैं, तो उस क़ौम के लोग न सिर्फ़ औरों से बल्कि अपने आप से भी बदगुमान हो जाते हैं। हम अपने देश में और ख़ासकर अपनी क़ौम में बदगुमानी का हाल ऐसा ही देखते हैं। ग्राहक सच्चे दुकानदारों को भी सच्चा नहीं मानते, क्योंकि उन्होंने बड़े-बड़े बात के पक्के लोगों से धोखे खाए हैं। दुनियादार आपस में एक-दूसरे को धोखेबाज़ और बेईमान समझते हैं क्योंकि उन्होंने बड़े-बड़े दीनदारों (धर्मनिष्ठों) को ऐसा ही पाया है। अगर कोई ईमानदार कमेटी क़ौम की भलाई और सुधार के लिए खड़ी होती है, तो क़ौम की तरफ़ से मदद के बजाय उसका विरोध और रुकावट पैदा की जाती है, क्योंकि क़ौम के नेताओं की लगातार धोखेबाज़ियों ने किसी को एतबार और भरोसे के लायक़ नहीं छोड़ा। एक व्यक्ति की बदगुमानी से जो नुक़सानदेह नतीजे पैदा होते हैं, वे अक्सर एक या चंद आदमियों से ज़्यादा को नुक़सान नहीं पहुँचाते। लेकिन जब किसी देश या क़ौम के आम स्वभाव में बदगुमानी का बीज बोया जाता है, तो उससे पूरे देश या पूरी क़ौम को नुक़सान पहुँचता है। आम बदगुमानी से अक्सर ऐसा हुआ है कि फ़ौज अपने बादशाह के ख़िलाफ़ और जनता बाग़ी हो गई है, और इसके बुरे नतीजे फ़ौज और जनता दोनों को सालों तक भुगतने पड़े हैं।
अफ़सोस है और बहुत अफ़सोस है कि हमारी क़ौम में भी यही आम बदगुमानी फैली हुई है, जिसके कारण उसे तरह-तरह के नुक़सान उठाने पड़े हैं... और उठाने पड़ेंगे। शुरुआत में वे सरकार से बदगुमान थे और उनको यह ख़याल था कि सरकार हमको ईसाई बनाना चाहती है। पादरी लोग जो जगह-जगह ईसाई धर्म का प्रचार करते फिरते हैं, वे सरकार की तरफ़ से ही इस काम पर नियुक्त हैं और अंग्रेज़ी स्कूल भी इसीलिए क़ायम किए गए हैं कि हम लोग धीरे-धीरे अपने धर्म से बेख़बर होकर आख़िर में ईसाई धर्म अपना लें। इस बेहूदा और ग़लत ख़याल से जो बेशुमार नुक़सान उन्होंने उठाए हैं, उनका अंदाज़ा करना मुश्किल है। अगर यह पूछा जाए कि,
क्यों सरकारी दफ़्तर मुसलमानों से ख़ाली हैं?
क्यों व्यापार और उद्योग की सूची में मुसलमानों का नाम नहीं पाया जाता है?
क्यों उनकी ग़रीबी और कंगाली रोज़-ब-रोज़ बढ़ती जाती है?
क्यों उनके ख़ानदानों पर मुसीबत के बादल छाते चले जा रहे हैं?
क्यों उनकी औलाद में बुरी आदतें सबसे ज़्यादा पाई जाती हैं?
क्यों उनके रईस और अमीर नालायक़ और गँवार होते हैं?
तो शायद इन सब सवालों का जवाब यही होगा कि उनकी बदगुमानी से।
अब कुछ सालों से क़ौम की एक हमदर्द जमात ने क़ौम की शिक्षा और पालन-पोषण (तालीम और तरबियत) का सामान मुहैया करने पर कमर बाँधी है और अलीगढ़ में एक ऐसा क़ौमी मदरसा (राष्ट्रीय विद्यालय) क़ायम किया है जिसकी मिसाल एशिया के इतिहास में नहीं पाई जाती। उसने क़ौम की बदगुमानी दूर करने में भी जहाँ तक हो सके कोशिश की है और उनकी तसल्ली का कोई भी पहलू नज़रअंदाज़ नहीं किया, मगर क़ौम की बदगुमानी ज्यों की त्यों चली आ रही है। वे बराबर आँखों से देखते और कानों से सुनते हैं कि हर साल इस मदरसे में विद्यार्थियों की एक अच्छी-ख़ासी तादाद उम्मीद से ज़्यादा कामयाब होती है (हालाँकि इसकी स्थापना को कुछ ज़्यादा समय नहीं गुज़रा है)। वहाँ तालीम के साथ-साथ तरबियत (संस्कार/चरित्र निर्माण) का भी बहुत ज़्यादा इंतज़ाम किया जाता है। जिससे मुसलमानों की औलाद के वास्ते हमेशा के लिए अच्छे अख़लाक़ (नैतिकता) की जड़ क़ायम होती है। वहाँ विद्यार्थियों की सेहत की हिफ़ाज़त का ख़याल भी, जो कि बहुत ज़रूरी चीज़ है, हद से ज़्यादा रखा जाता है। उनको धार्मिक नियमों का भी पूरी सख़्ती के साथ पाबंद किया जाता है। उनको दुनियावी तालीम के साथ-साथ दीनी (धार्मिक) तालीम भी दी जाती है।
ग़रज़, तालीम और तरबियत का सामान वहाँ इस क़दर मुहैया है कि हिंदुस्तान में मुसलमानों की औलाद के लिए इससे बढ़कर हरगिज़ नहीं हो सकता। लेकिन इन सब बातों के बावजूद बहुत से लोग लापरवाही से, बहुत से लोग दुश्मनी से और सबसे ज़्यादा लोग बदगुमानी से इस फ़ायदे के चश्मे (स्रोत) से महरूम हैं। और इससे क़ौम की तरक़्क़ी की तरफ़ से ऐसी सख़्त मायूसी होती है जिसकी भरपाई नामुमकिन मालूम होती है। भूखे को खाना और प्यासे को पानी मयस्सर न आने (न मिलने) से भी सख़्त मायूसी होती है, लेकिन यह उस मायूसी से बहुत कम है कि खाना और पानी मौजूद हो लेकिन बीमार न खाना खा सके न पानी पी सके। ऐसा बीमार कुछ ही पलों का मेहमान होता है। न हकीम उसके काम आ सकता है न तीमारदार (देखभाल करने वाला) उसकी मदद कर सकता है। हम नहीं कहते कि हमारे मुसलमान भाई इस मामले में किसी के कहने-सुनने पर ध्यान दें, बल्कि उनको चाहिए कि इंसाफ़ और बिना किसी पक्षपात के 'मदरसतुल उलूम' का हाल देखें और समझें कि जो कुछ हम इसके बारे में कहते हैं वह सही है या ग़लत,
आफ़ताब आमद दलील-ए-आफ़ताब
गर दलीले बायदत ज़ोर ओ महताब
- रचनाकार :अल्ताफ़ हुसैन हाली
- प्रकाशन : जामिया प्रेस, दिल्ली
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