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अल्ताफ़ हुसैन हाली के लेख
मिर्ज़ा के अख़लाक़-ओ-आदात-ओ-ख़्यालात
मिर्ज़ा के अख़लाक़, आदतें और ख़यालात 1 / 4 मिर्ज़ा का स्वभाव बहुत मिलनसार था। जो भी शख़्स उनसे मिलने जाता था, वह उससे बहुत खुले दिल से मिलते थे। जो शख़्स एक दफ़ा उनसे मिल आता था, उसे हमेशा उनसे मिलने की चाहत रहती थी। दोस्तों को देखकर वह बाग़-बाग़ हो
कमाल-ए-शायरी के लिए ज़रूरी शराएत
शायरी में कमाल हासिल करने के लिए ज़रूरी शर्तें नीचे दी गई हैं। ये वो शर्तें और ख़ास बातें हैं जो शायर को ग़ैर-शायर से अलग करती हैं। इनमें से एक वही है यानी तख़य्युल (कल्पना) और दूसरी मुहाकात यानी प्रकृति की किताब के अध्ययन की आदत और शब्दों पर पकड़। सबसे
उर्दू का वाइज़ शाइर
आज से कोई 25 साल पहले की बात है। 'अल-हिलाल' कलकत्ता के क्षितिज से नया-नया निकला था और देश का सारा माहौल अबुल कलाम के साहित्य और लेखन की गूँज से गूँज रहा था, कि एक दिन उसके किसी लेख के अंत में यह शेर नज़र से गुज़रा: ताज़ीर-ए-जुर्म-ए-इश्क़ है बे-सरफ़ा
सर सय्यद अहमद ख़ाँ और उनके काम
यह वह सबसे पहला लेख है जो सर सैयद के कामों के समर्थन और हिमायत में मौलाना हाली ने लिखा। इससे मालूम होता है कि हज़रत मौलाना हाली सर सैयद के उस वक़्त से साथ थे जब उन्होंने विलायत (इंग्लैंड) से वापसी के बाद अभी अपना शैक्षिक और सुधार आंदोलन शुरू नहीं किया
बद-गुमानी
बदगुमानी इंसान की एक ऐसी बुरी आदत है जिससे अक्सर खुद बदगुमानी करने वाले को और उस शख्स को जिस पर वह बदगुमानी करता है, थोड़ा या बहुत नुकसान ज़रूर पहुँचता है। इसी वास्ते खुदा के कलाम में इरशाद होता है कि "या अय्युहल्लज़ीना आमनू इज्तनिबू कसीरम मिनज़-ज़न
हाली-ओ-शिब्ली की मु'आसिराना चशमक
विषय का नयापन चाहता था कि जहाँ तक हमारी आख़िरी महफ़िल का ताल्लुक़ है, इस लपेट में कोई छूटने न पाए, लेकिन अफ़सोस है कि सामग्री की कमी ने ज़्यादा फैलने का मौक़ा नहीं दिया और हालाँकि "चश्मक" (नोक-झोंक) का दायरा ख़ालिस हाली और शिबली की क़लम की शोख़ी से आगे