ग़ालिब के लहजे का 'बाँकपन' और तंज़िया अंदाज़
ग़ालिब की मक़बूलियत के शुरुआती कारणों में उनका वो ख़ास 'बाँकपन' और तंज़िया लहजा शामिल था जिसके ज़रिए वो बहुत संजीदा विषयों को भी एक अनोखे और दिलकश अंदाज़ में बयान करते थे।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ग़ालिब की मक़बूलियत के शुरुआती कारणों में उनका वो ख़ास 'बाँकपन' और तंज़िया लहजा शामिल था जिसके ज़रिए वो बहुत संजीदा विषयों को भी एक अनोखे और दिलकश अंदाज़ में बयान करते थे।
ग़ज़ल की कामयाबी का दार-ओ-मदार उसकी ज़बान की रवानी, मिठास और हिंदी व फ़ारसी अल्फ़ाज़ के संतुलित इस्तेमाल पर है। मीर, ग़ालिब और इक़बाल के अंदाज़ का तुलनात्मक जायज़ा।