पाठक की रचनात्मक भागीदारी: क्या कोई कलाकृति पाठक के बिना पूरी हो सकती है?
कोई भी फ़न्नी-तख़्लीक़ (कलात्मक रचना) अपने पाठक या नाज़िर (दर्शक) के बग़ैर अधूरी है। पाठक महज़ तमाशाई नहीं होता, बल्कि वह अपने एहसासात से फ़न-पारे (कलाकृति) के ख़ाली शिगाफ़ों (दरारों) को भर कर उसे मुकम्मल करता है।