'पढ़े-लिखे पाठक' का अफ़साना और नई शायरी की समझ
पढ़े-लिखे पाठक का कोई पक्का पैमाना तय नहीं किया जा सकता, इसलिए इसकी बुनियाद पर किसी नई या मुश्किल शायरी को बे-मानी (निरर्थक) ठहराना ग़लत है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पढ़े-लिखे पाठक का कोई पक्का पैमाना तय नहीं किया जा सकता, इसलिए इसकी बुनियाद पर किसी नई या मुश्किल शायरी को बे-मानी (निरर्थक) ठहराना ग़लत है।