ग़ालिब की सुख़न-फ़हमी (शायरी की समझ), याददाश्त और आलोचनात्मक समझ
मिर्ज़ा ग़ालिब की याददाश्त और सुख़न-फ़हमी बेमिसाल थी। वह बिना किसी निजी कुतुब-ख़ाने (पुस्तकालय) के, सिर्फ़ अपनी तेज़ याददाश्त और आलोचनात्मक सूझ-बूझ के बल-बूते पर इल्म और अदब (ज्ञान और साहित्य) के मोती बिखेरते थे।