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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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क़ुव्वत-ए-हाफ़िज़ा पर स्कॉलर

ग़ालिब की सुख़न-फ़हमी (शायरी की समझ), याददाश्त और आलोचनात्मक समझ

मिर्ज़ा ग़ालिब की याददाश्त और सुख़न-फ़हमी बेमिसाल थी। वह बिना किसी निजी कुतुब-ख़ाने (पुस्तकालय) के, सिर्फ़ अपनी तेज़ याददाश्त और आलोचनात्मक सूझ-बूझ के बल-बूते पर इल्म और अदब (ज्ञान और साहित्य) के मोती बिखेरते थे।

बोलिए