इस्तिआरा (रूपक): कायनात से इश्क़ और अहंकार का इनकार
इस्तिआरे (रूपक) का इस्तेमाल महज़ (सिर्फ़) एक साहित्यिक तरीक़ा नहीं, बल्कि यह अहंकार के ख़ोल से निकल कर कायनात (सृष्टि) की रंगा-रंगी, विरोधाभासों और फैलाव को अपने अंदर जज़्ब (आत्मसात) करने का एक सूफ़ीयाना और आशिक़ाना अमल (प्रक्रिया) है।