इक गुज़ारिश है मेहरबानों से
छोड़ दें आस्तीं निकल जाएँ
रह-ए-हयात में काँटों ने मेहरबाँ हो कर
बचा लिया है अज़ाब-ए-शगुफ़्तगी से मुझे
अब ज़रा सरगोशियों में बात हो
मेहरबाँ लहजे की आदत है हमें
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
इक गुज़ारिश है मेहरबानों से
छोड़ दें आस्तीं निकल जाएँ
रह-ए-हयात में काँटों ने मेहरबाँ हो कर
बचा लिया है अज़ाब-ए-शगुफ़्तगी से मुझे
अब ज़रा सरगोशियों में बात हो
मेहरबाँ लहजे की आदत है हमें