'ख़ुदा-ए-सुख़न' का अस्ल मतलब: मीर तक़ी मीर ही शायरी के ख़ुदा क्यों हैं?
मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
उन शेरों को जमा किया है जो मीर तक़ी मीर जैसे अज़ीम शायर को मौज़ू बनाते हैं। मीर के बाद के तक़रीबन तमाम बड़े शोरा ने मीर की उस्तादी और उनकी तख़्लीक़ी महारत का एतिराफ़ किया। आप इन शेरों से गुज़रते हुए देखेंगे कि किस तरह मीर अपने बाद के शोरा के ज़हन पर छाए रहे और किन किन तरीक़ों से अपने हम-पेशा लोगों से दाद वसूल करते रहे।
मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।