तख़य्युल (कल्पना) और कुव्वत-ए-मुमय्यज़ा (परखने की सलाहियत): संतुलन के बिना शायरी गुमराही है
तख़य्युल की ऊँची उड़ान को अक़्ल और कुव्वत-ए-मुमय्यज़ा (परखने की सलाहियत) की लगाम की ज़रूरत होती है, वरना बे-लगाम तख़य्युल शायर को बे-तुकी बातों और गुमराही की तरफ ले जाता है।