ग़ालिब और बेदिल: वैचारिक समानता या महज़ शैली का इस्तेमाल?
ग़ालिब ने बेदिल को अपना रूहानी उस्ताद ज़रूर माना, लेकिन बेदिल के सूफ़ीयाना रहस्यवाद के विपरीत, ग़ालिब की शायरी पूरी तरह से तर्कशीलता और होशमंदी को दर्शाती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ग़ालिब ने बेदिल को अपना रूहानी उस्ताद ज़रूर माना, लेकिन बेदिल के सूफ़ीयाना रहस्यवाद के विपरीत, ग़ालिब की शायरी पूरी तरह से तर्कशीलता और होशमंदी को दर्शाती है।