पास था ज़र तो कोई ऐब न था
सब उयूब आए बे-ज़री के साथ
दौलत से कहाँ जुड़ते हैं टूटे हुए रिश्ते
शीशे को कभी गोंद से जोड़ा नहीं जाता
जब खुले नक़्द के औसाफ़ ब-फ़ैज़-ए-नक़्दी
कुछ रिसालों के एडीटर भी तरफ़-दार हुए
फ़िक्र माली की बढ़ने वाली है
पेड़ फलदार होने वाले हैं