वली उज़लत
ग़ज़ल 60
अशआर 28
हम उस की ज़ुल्फ़ की ज़ंजीर में हुए हैं असीर
सजन के सर की बला आ पड़ी हमारे गले
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सख़्त पिस्ताँ तिरे चुभे दिल में
अपने हाथों से मैं ख़राब हुआ
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सिया है ज़ख़्म-ए-बुलबुल गुल ने ख़ार और बू-ए-गुलशन से
सूई तागा हमारे चाक-ए-दिल का है कहाँ देखें
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- ग़ज़ल देखिए
ऐ सालिक इंतिज़ार-ए-हज में क्या तू हक्का-बक्का है
बगूले सा तो कर ले तौफ़ दिल पहलू में मक्का है
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तिरी वहशत की सरसर से उड़ा जूँ पात आँधी का
मिरा दिल हाथ से खोया तो तेरे हाथ क्या आया
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