सय्यद ग़यासुद्दीन सलीम
ग़ज़ल 4
अशआर 3
हम रह-रवान-ए-शौक़ हैं मंज़िल की फ़िक्र क्या
ले जाएँ नक़्श-ए-पा तिरे हम को जहाँ कहीं
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करते नहीं किसी पे अयाँ हम कि ऐ 'सलीम'
दर्मान-ए-ज़िंदगी हो ये दर्द-ए-निहाँ कहीं
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राह-ए-वफ़ा में इस लिए फिरता हूँ सर-ब-कफ़
मिल जाए कब वो दुश्मन-ए-आराम-ए-जाँ कहीं
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