शेरी भोपाली
ग़ज़ल 6
अशआर 8
ये बाज़ी मोहब्बत की बाज़ी है नादाँ
इसे जीतना है तो हारे चला जा
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मोहब्बत मअ'नी ओ अल्फ़ाज़ में लाई नहीं जाती
ये वो नाज़ुक हक़ीक़त है जो समझाई नहीं जाती
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बराबर ख़फ़ा हों बराबर मनाएँ
न तुम बाज़ आओ न हम बाज़ आएँ
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सुनने में आ रहे हैं मसर्रत के वाक़िआत
जम्हूरियत का हुस्न नुमायाँ है आज-कल
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अभी तो दिल में हल्की सी ख़लिश महसूस होती है
बहुत मुमकिन है कल इस का मोहब्बत नाम हो जाए
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