सरमद ख़ान
ग़ज़ल 11
नज़्म 3
अशआर 7
दरख़्त टूटते पत्तों का दुख समझते हैं
उन्हें भी शामिल-ए-यारान-ए-ग़म किया जाए
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दरख़्त शब चराग़ और तीरगी
तुम्हारे बाद सब से दोस्ती हुई
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मुझे सुकूँ नहीं देती हैं अब तिरी यादें
अब इन दियों से बहुत तीरगी निकलती है
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तिरे बदन को छू रही थीं उँगलियाँ
हथेलियों में तेज़ रौशनी हुई
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मैं पूरे दिन की थकन घर में ले के आया हूँ
उदासियो मुझे फिर ताज़ा-दम किया जाए
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